देश की खबरें | आईआईटी खड़गपुर ने कोरोना वायरस के प्रसार का पूर्वानुमान लगाने के लिए मॉडल तैयार किया

कोलकाता, 22 जून पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) ने एक मॉडल विकसित किया है, जिससे भविष्य में कोविड-19 के संक्रमण की परिपाटी का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और उसके आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं, उद्योग और यहां तक कि अकमादमिक फैसले लिए जा सकते हैं।

संस्थान की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अध्ययन में यह भी संकेत मिला कि सितंबर के अंत तक देश में कोविड-19 संक्रमितों की संख्या बढ़ती रहेगी।

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कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अभिजीत दास ने यह तार्किक मॉडल तैयार किया है, जिसमें दैनिक आधार पर आ रहे संक्रमण के आंकड़ों के आधार पर पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

दास ने कहा कि माडल से खुलासा हुआ कि देश में महामारी के चरम पर पहुंचने में अभी समय है।

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उन्होंने कहा, ‘‘ इस साल सितंबर के आखिर तक कोविड-19 की महामारी से मुक्ति मिलती नहीं दिख रही हैं’’

दास ने कहा, ‘‘ यह जानकारी हमें सहज नहीं करती, लेकिन वास्तविकता को स्वीकार करना होगा और इस महामारी से जुड़े सभी मामलों से निपटने के लिए उचित योजना बनानी होगी।’’

मॉडल में पूरे देश के और सबसे अधिक आठ राज्यों- महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश का पूर्वानुमान लगाने के लिए डाटा का इस्तेमाल किया गया है।

मॉडल को विकसित करने के बारे में प्रोफेसर दास ने कहा ‘‘ हमने केवल सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध संक्रमण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। इसमें चिकित्सा रिकॉर्ड और संक्रमित के संपर्क में आने वाले लोगों के आंकड़ों का इस्तेमाल नहीं किया गया।

उन्होंने कहा, ‘‘ इसके बावजूद संक्रमण दर पुराने आंकड़ों के आधार पर सटीक बैठती है और भविष्य की योजना में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।’’

दास ने कहा कि हालांकि, समय के साथ पूर्वानुमान तेजी से बदलता है।

उन्होंने कहा कि इसके कई संभावित कारक हैं, जैसे लॉकडाउन के विभिन्न चरणों में लोगों की आवाजाही, श्रमिकों का बड़े पैमाने पर पलायन, जांच की सुविधा में बदलाव और कोरोना वायरस का क्रमिक विकास।

दास ने कहा कि यह किसी भी रणनीतिक मॉडल या मौजूदा पूर्वानुमान मॉडल के नियंत्रण से बाहर है।

आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार तिवारी ने कहा कि यह मॉडल प्रायोगिक है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में संस्थान के अकादमिक सत्र और नीतिगत मामलों की योजना बनाने में मददगार साबित हो सकता है।

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