विदेश की खबरें | यदि महिलाएं ऊर्जा प्रणालियों में बदलाव की योजना बनातीं, तो क्या बदलाव आता ?

मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया), 26 नवंबर (360इंफो) दुनिया के अधिकतर हिस्सों में लोगों के लिए ‘ऊर्जा तक पहुंच’ का मतलब अब भी लकड़ी की गठरियों को अपने सिर पर लादकर घर लाना है, ताकि खाना बन सके। करीब 75 करोड़ लोगों की अब भी बिजली तक पहुंच नहीं है और ऊर्जा के बिना खाना बनाने एवं सफाई करने के कारण काम का बोझ अकसर महिलाओं पर ही पड़ता है।

यह परिदृश्य ग्लासगो में आयोजित हुए सीओपी-26 में जलवायु और ऊर्जा नीति पर हाल में बहस करने वाले सूट पहने नेताओं से एकदम अलग है और इन नेताओं में भी अधिकतर पुरुष शामिल थे। इस सम्मेलन में जलवायु नीति पर विचार-विमर्श में लैंगिक समानता को भी एकीकृत करने पर चर्चा की गई।

कोविड-19 संकट ने 2021 में खासकर अफ्रीका में तीन करोड़ से अधिक लोगों के लिए मूलभूत बिजली को पहुंच से बाहर कर दिया, लेकिन इसी वैश्विक महामारी ने दुनिया को एक अवसर दिया। एक समय ऐसा था, जब ऊर्जा प्रणालियां मुख्य रूप से पुरुष इंजीनियर बनाते थे, लेकिन अब नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाकर ‘ऊर्जा प्रणाली में बदलाव’ किया जा रहा है, तो ऐसे में ऊर्जा पैदा करने, वितरित करने और इसे खर्च करने के तरीके को बदला जा सकता है।

अब मौका है जब महिलाओं के रोजगार और आजीविका को प्राथमिकता देकर और देखभाल के काम के बोझ के कारण 'समय के अभाव’ की उनकी समस्या को कम करके ऊर्जा प्रणालियों में धीमी गति से हो रहे बदलाव को तेज किया जा सकता है। ‘निर्माण को फिर से बेहतर’ बनाने का अर्थ अलग तरीके से निर्माण भी होना चाहिए।

विकासशील दक्षिण एशिया में, सामुदायिक ऊर्जा प्रणालियां प्रौद्योगिकी और सामाजिक-आर्थिक विचारों के संयोजन से संचालित होती हैं और यदि उचित नीतिगत माहौल मिले, तो गरीब, महिलाएं और वंचित समूह भी शुरुआत से ही अक्षय ऊर्जा उद्योगों में भागीदारी निभा सकते हैं। इसमें समाज के सभी वर्गों को नयी प्रौद्योगिकियां अपनाने के लिए सक्षम बनाने के मकसद से वित्तीय मदद और प्रोत्साहन दिया जाना शामिल है।

मालदीव के बाहरी द्वीपों में बिजली उत्पादन के तरीके को बदल दिया गया है। वहां पुरानी डीजल प्रणाली की जगह सौर-पीवी-बैटरी हाइब्रिड सामुदायिक ऊर्जा प्रणालियों का इस्तेमाल हो रहा है। ये प्रणालियां 160 द्वीपों में अपनाई जा रही हैं। इससे कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन एवं वायु प्रदूषण कम हुआ और आयातित डीजल का इस्तेमाल कम होने से बिजली की लागत में कमी आई।

हम जब न केवल तकनीकी दक्षता, बल्कि लोगों के लिए प्रणालियां बनाने के बारे में भी सोचते हैं, तो तकनीकी मानक भी एक भूमिका निभा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर महिला सशक्तीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए सतत विकास लक्ष्यों पर काम करना। इसके लिए महिलाओं को प्रौद्योगिकी बनाने, इसे विकसित करने और इसका इस्तेमाल करने की प्रक्रिया में शामिल करने की आवश्यकता है।

घर के कामों में लगने वाले समय को कम करके और आय वाली गतिविधियों या रोजगार में लगने वाला समय बढ़ाकर महिलाओं की आमदनी बढ़ाई जा सकती है, जिससे लैंगिक समानता को प्रणाली बनाने के स्पष्ट लक्ष्य के तौर पर एकीकृत किया जा सकता है।

विकासशील समुदायों को ऐसी प्रणालियों की आवश्यकता है, जो नल में पंप के जरिए आने वाले जल, बिजली से चलने वाले उपकरणों और रेफ्रिजरेटर जैसी सुविधाओं को मुहैया कराने के लिए ‘बिजली के बल्ब’ से आगे बढ़ें।

ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रमों के दौरान ऊर्जा उद्योग की योजनाओं एवं मॉडल में लैंगिक समानता एवं महिला सशक्तीकरण को उद्देश्य के रूप में शामिल किया जा सकता है।

‘स्टेम’ (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) उद्योगों में महिलाओं के लिए रोजगार बढ़ाकर ऊर्जा प्रणालियां तैयार करने में लैंगिक समानता को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

कोविड-19 संकट ने लोगों को स्वयं को परिस्थिति के अनुरूप ढालने का महत्व समझाया है और इसने बताया कि ऊर्जा प्रणालियां किस प्रकार स्वास्थ्य, परिवहन और डिजिटल बुनियादी ढांचे से जुड़ी हुई हैं। जिस तरह अब नयी प्रणालियों को बनाते समय कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है, उसी प्रकार नयी ऊर्जा प्रणालियां बनाते समय सामाजिक विचार-विमर्श भी एक कारक होना चाहिए।

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