जयपुर, 19 जनवरी ‘भारत को लेकर यदि आपकी कल्पना एक हिंदुत्व की है, तो यह असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है, क्योंकि यह अनिवार्य रूप से जनता की इच्छा नहीं है, बल्कि यह सत्ता पर काबिज लोगों की इच्छा है।’ यह विचार मुकुलिका बनर्जी ने बृहस्पतिवार से शुरू हुए जयपुर साहित्य सम्मेलन में व्यक्त किये।
यहां ‘लोकतंत्र: ताना-बाना’ से जुड़े सत्र के दौरान अपने संबोधन में उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदुत्व की एक विचारधारा के प्रति स्वघोषित प्रतिबद्धता की व्यापकता के साथ पिछले नौ वर्षों में कई संस्थागत विकृतियां विकसित हुई हैं और यह कोई राज की बात नहीं है।
लंदन निवासी लेखिका और स्तंभकार ने कहा कि इस विचारधारा को पिछले दरवाजे से नहीं लाया जा रहा है, यह सत्ताधारी दल की आधिकारिक विचारधारा है, यह आरएसएस की आधिकारिक विचारधारा है। उन्होंने कहा कि असल में यह भारत के बारे में एक विचार है, जो मौजूदा भारतीय संविधान के अनुसार असंवैधानिक होगा।
बनर्जी ने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि आप लोकतंत्र हैं, बल्कि आप को लोकतांत्रिक बनना होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में हिंदू राष्ट्र की बात नहीं लिखी गई है, इसीलिए भारत के बारे में हिंदू राष्ट्र की कल्पना करना असंवैधानिक है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी-नीत भाजपा सरकार में भारतीय चुनाव प्रणाली ने तीन बड़ी विकृतियां विकसित की हैं, पहला यह कि भारतीय निर्वाचन आयोग निष्पक्ष रहने में नाकाम रहा, दूसरी समस्या चुनाव खर्च को लेकर है और तीसरी बात यह है कि गुप्त मतदान अब इतिहास बन चुका है।
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में दक्षिण एशियाई अध्ययन संस्थान और दक्षिण एशियाई अध्ययन कार्यक्रम में वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता रंजय सेन और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी यामिनी अय्यर भी पैनल की हिस्सा थीं। पैनल का संचालन वाशिंगटन-डीसी निवासी और द इकोनॉमिक टाइम्स की स्तंभकार सीमा सरोही ने किया।
सेन ने संसद में मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व की जरूरत की तरफ इंगित करते हुए दावा किया कि भारतीय संसद में केवल 4.5 फीसदी सांसद मुस्लिम हैं, जबकि इस समुदाय का देश की आबादी में करीब 15 फीसदी हिस्सा है।
सेन ने कहा कि सत्ताधारी पार्टी में एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है, जिस पर विचार करने की जरूरत है। सेना ने कहा, ‘‘पश्चिम बंगाल में सौमित्र खान नाम के एक सांसद हैं, लेकिन वह भी मुस्लिम नहीं हैं। यहां ‘खान’ एक उपाधि की तरह है।’’
जयपुर साहित्य सम्मेलन के 16वें सत्र का समापन 23 जनवरी को होगा।
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