मुंबई, 10 नवंबर बंबई उच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने उद्योगपति विजयपत सिंघानिया की आत्मकथा ‘‘एन इनकंप्लीट लाइफ’’ की बिक्री, प्रसार और वितरण पर रोक लगाने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश को बुधवार को रद्द कर दिया।
रेमंड समूह के पूर्व अध्यक्ष 83 वर्षीय सिंघानिया पुस्तक को लेकर अपने अलग हुए बेटे गौतम सिंघानिया और रेमंड कंपनी के साथ कानूनी लड़ाई में उलझे हुए हैं। पिछले हफ्ते उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस पी तावड़े ने पुस्तक की बिक्री, वितरण और प्रसार पर रोक लगाने का आदेश पारित किया था।
न्यायमूर्ति एस जे कठावाला और न्यायमूर्ति अभय आहूजा की खंडपीठ ने बुधवार को आदेश को रद्द कर दिया।
वर्ष 2019 में, रेमंड लिमिटेड और उसके अध्यक्ष गौतम सिंघानिया ने ठाणे सत्र अदालत और मुंबई में एक दीवानी अदालत में मुकदमा दायर किया था, जिसमें पुस्तक के प्रकाशन पर रोक की मांग करते हुए दावा किया गया था कि इसकी सामग्री मानहानिकारक है।
अप्रैल 2019 में ठाणे अदालत ने पुस्तक के जारी करने पर रोक लगा दी। कंपनी ने पिछले हफ्ते उच्च न्यायालय का रुख किया और दावा किया कि विजयपत सिंघानिया ने निचली अदालत के रोक के बावजूद 31 अक्टूबर को 232 पन्नों की किताब को ‘‘गुप्त रूप से’’ जारी किया। कंपनी ने वर्तमान प्रकाशक मैकमिलन पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड को पुस्तक के आगे वितरण, बिक्री या उपलब्ध कराने से रोकने का निर्देश देने का अनुरोध किया।
रेमंड के वकील कार्तिक नायर, ऋषभ कुमार और कृष कालरा ने दावा किया कि विजयपत सिंघानिया और प्रकाशकों ने ठाणे अदालत के अप्रैल 2019 के आदेश का उल्लंघन किया है।
आशीष अविनाश
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