देश की खबरें | ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग के प्राचीन होने का पता लगाने के आदेश के खिलाफ अर्जी पर होगी सुनवाई

नयी दिल्ली, 18 मई इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देनी वाली मुस्लिम पक्ष की याचिका पर सुनवाई करने के लिए उच्चतम न्यायालय बृहस्पतिवार को सहमत हो गया, जिसमें वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में कथित तौर पर मिले शिवलिंग के प्राचीन होने का पता लगाने के लिए ‘कार्बन डेटिंग’ सहित वैज्ञानिक जांच कराने का आदेश दिया गया था।

प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला की पीठ ने ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी की दलीलों का संज्ञान लिया तथा याचिका को शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।

अहमदी ने कहा, “इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर अपील लंबित है।”

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 मई को, अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर, ज्ञानवापी मस्जिद में मिली उस संरचना के प्राचीन होने का पता लगाने का आदेश दिया था, जिसके शिवलिंग होने का दावा किया जा रहा है।

उच्च न्यायालय ने वाराणसी जिला अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके तहत मई 2022 में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में किए गए सर्वे के दौरान मिली संरचना की ‘कार्बन डेटिंग’ सहित अन्य वैज्ञानिक जांच कराने की अपील संबंधी याचिका खारिज कर दी गई थी।

उल्लेखनीय है कि ‘कार्बन डेटिंग’, अत्यधिक प्राचीन वस्‍तुओं की आयु जानने की विधि है, जिसमें उन वस्‍तुओं में मौजूद कार्बन की मात्रा को मापा जाता है।

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद वाराणसी की एक स्थानीय अदालत 16 मई को, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा पूरे ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे कराने के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई को राजी हो गई थी।

हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की याचिका को स्वीकार करते हुए जिला अदालत के न्यायाधीश ए के विश्वेष ने ज्ञानवापी मस्जिद समिति से 19 मई तक इस पर जवाब दाखिल करने को कहा था। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 मई की तारीख तय की थी।

इससे पहले, उच्च न्यायालय ने 12 मई को वाराणसी के जिला न्यायाधीश को शिवलिंग की वैज्ञानिक जांच कराने के हिंदू पक्ष के अनुरोध पर कानून के अनुसार आगे बढ़ने का निर्देश दिया था।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि वैज्ञानिक सर्वे की प्रक्रिया में उस संरचना को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए, जिसके बारे में हिंदुओं का दावा है कि वह एक शिवलिंग है।

हालांकि, मस्जिद समिति का कहना है कि यह ‘वजू खाना’ के फव्वारे का हिस्सा है, जहां नमाज अदा करने से पहले लोग हाथ, पैर और मुंह धोते हैं।

उच्च न्यायालय ने वाराणसी की अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली लक्ष्मी देवी सहित तीन अन्य लोगों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया था।

संरचना की प्राचीनता का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक जांच का आदेश देने से पहले उच्च न्यायालय ने कानपुर और रुड़की स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और लखनऊ के बीरबल साहनी संस्थान सहित विभिन्न संस्थानों से रिपोर्ट मांगी थी।

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि उक्त संरचना की प्रत्यक्ष ‘कार्बन डेटिंग’ संभव नहीं है और इसके प्राचीन होने का पता लगाने के लिए तत्वों की ‘प्रॉक्सी कार्बन डेटिंग’ की जा सकती है, जिसके लिए शिवलिंग के आसपास मौजूद सामग्री की विस्तृत जांच किए जाने की जरूरत है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि सतह के नीचे मौजूद कुछ जैविक तत्वों की ‘कार्बन डेटिंग’ से भी संरचना की आयु का पता लगाया जा सकता है, लेकिन इस बाबत यह स्थापित करने की जरूरत है कि ये तत्व उक्त संरचना से संबद्ध हैं।

पारुल अविनाश

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