नयी दिल्ली, 10 अगस्त अशांत क्षेत्रीय ताकतों के कारण बिहार, राष्ट्रीय राजनीति में होने वाले संरचनात्मक बदलावों के केंद्र में हमेशा से रहा है।
राजनीतिक उथल-पुथल भरे मंगलवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सहयोगी भाजपा से नाता तोड़ महागठबंधन से नाता जोड़ लिया। इसके साथ ही बिहार और इसकी जटिल राजनीति पर एक बार फिर से चर्चा शुरू हो गयी।
सत्तर के दशक में छात्रों के नेतृत्व में ऐतिहासिक बिहार आंदोलन से लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव द्वारा समस्तीपुर में लाल कृष्ण आडवाणी की अयोध्या रथ यात्रा को रोकने तक की घटनाओं के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय राजनीति में उथल-पुथल हुयी और अप्रत्याशित तौर पर सत्तारूढ़ दल सरकार से बाहर हो गये या अनपेक्षित एवं अस्थायी गठबंधनों का उदय हुआ।
जानेमाने समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किये गये और जेपी आंदोलन के नाम से मशहूर हुए बिहार आंदोलन का पटना से दिल्ली तक व्यापक प्रभाव हुआ। बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में उनके उग्र भाषणों की गूंज राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान तक पहुंची।
सत्तर के अशांत दशक के दौरान जेपी के बिहार आंदोलन के कारण देश में अंततः 1975 से 1977 तक आपातकाल लगाया गया। उन्होंने बिहार में कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्रों को भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में खुद को झोंकने के लिए प्रेरित किया। इस संघर्ष को भारतीय राजनीति के व्यापक मंथन के तौर पर देखा गया।
तेजतर्रार नेता जेपी के नेतृत्व में बिहार में हुए आंदोलन ने संपूर्ण क्रांति का रूप ले लिया और राज्य में तत्कालीन गफूर सरकार के इस्तीफे की प्रारंभिक मांग अंततः इंदिरा गांधी सरकार को बर्खास्त करने की एक बड़ी मांग में बदल गई।
आपातकाल समाप्त होने और आम चुनाव के बाद, कांग्रेस सत्ताच्युत हो गई और जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार का गठन हुआ, जिसका मुखिया (प्रधानमंत्री) मोरारजी देसाई को बनाया गया।
जेपी आंदोलन का कई लोगों पर इतना व्यक्तिगत और भावनात्मक प्रभाव पड़ा कि नीतीश कुमार, लालू यादव, सुशील कुमार मोदी और शरद यादव, जो सभी उस समय छात्र राजनीति में तल्लीन थे, अक्सर खुद को ‘जेपी आंदोलन का उत्पाद’ बताते हैं।
इस छात्र आंदोलन से उभरे लालू यादव और नीतीश कुमार एक समय काफी करीबी दोस्त हुआ करते थे, लेकिन अपने राजनीतिक करियर में कभी वह दोस्त से दुश्मन बन गये, तो फिर मौका देखकर दुश्मन से दोस्त। दोनों के बीच बनते बिगड़ते रिश्तों ने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति, दोनों को प्रभावित किया।
जनता पार्टी से टूटकर दो दल बन चुके राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (यू) किसी भी सरकार गठन के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
वर्ष 2017 में महागठबंधन से बाहर आने वाले नीतीश कुमार जैसे ही फिर से महागठबंधन में लौटे हैं, कई लोगों ने यह भी अनुमान लगाना शुरू कर दिया है कि क्या इस कदम का 2024 के लोकसभा चुनावों पर कोई असर पड़ेगा।
पटना में कई छात्र नेताओं ने ‘पीटीआई-’ से बातचीत के दौरान के दौरान इस बात को लेकर सहमति व्यक्त की कि ‘इस प्रकार का मौजदा राजनीतिक संकट बिहार के लिए नया नहीं है’ और ‘इस अस्थिरता’ ने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति दोनों को प्रभावित किया है।
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