देश की खबरें | महिला ई-रिक्शा चालकों पर महामारी की मार, पर हौसला बरकरार
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 30 अगस्त जीविकोपार्जन के लिए ई-रिक्शा का पेशा चुनने वाली महिलाएं कोविड-19 महामारी की वजह से भले उसे नहीं चला पा रही हैं, और कमाई नहीं होने से उसका ऋण नहीं दे पा रही हैं लेकिन यह व्यवसाय अपनाकर जीवन की अपनी नैया को पार लगाने का निर्णय ले चुकीं इन औरतों का हौसला बरकरार है।

इन महिलाओं ने परंपरा का उल्लंघन करने को ठाना था और घर के चौखट के बाहर कदम रखकर उन्होंने ई-रिक्शा चलाना शुरू किया था। अब उनका कहना है कि यह महामारी क्या चीज है, उससे कहीं कोई बड़ी बात हुई तब शायद वे अपने कदम पीछे खीचेंगी।

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इन महिलाओं को प्रशिक्षण और ऋण दिलाने में सहयोग करने वाले हमसफर और एसएमवी ग्रीन सोल्युसंश जैसे संगठनों का कहना है कि उनमें से कोई भी अपना वाहन बेचने के लिए उनके पास नहीं आयी।

लखनऊ की सीमा खान ने कहा, ‘‘ मैं पैसे कमाने के लिए इन दिनों अस्थायी रूप से सभी तरह के छोटे-मोटे काम करने के लिए तैयार हूं लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता कि मैं अपना रिक्शा बेच दूं।’’ वह देशभर की उन महिलाओं में है जिन्होंने किसी तरह डाउन पेमेंट का जुगाड़कर अपने शहर में सहयोग केद्रों की मदद से ई-रिक्शा खरीदा और अब वे अपनी जीविका चला रही थीं और ईएमआई भर रही थीं।

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कुछ साल तक किराये पर ई-रिक्शा चलाने के बाद खान ने आठ महीने पहले अपना तिपहिया वाहन खरीदने का फैसला किया ताकि बिचौलिये के दखल से बच पाएं और कमाई अपनी हो।

लॉकडाउन के पहले तक उसकी आय इतनी थी कि घर का खर्चा आसानी से चल जाता था और रिक्शा की किस्त भी चुका लेती थी।

एक रिक्शा पर करीब 1,45,000 रूपये की लागत आती है। बैंकों से 14 प्रतिशत की ब्याज दर से ऋण लेने से चुकाने लायक राशि करीब 1,86,000 रूपये बन जाती है।

अन्य महिलाओं की तरह खान भी हर 14 दिनों पर 2,849 रूपये देती आ रही थी और महीने में 5,698 रूपये का भुगतान करना होता था। कोविड-19 महामारी से पहले ऐसा करना मुमकिन था लेकिन पिछले छह महीने में सब कुछ बदल गया।

खान ने पीटीआई- से कहा, ‘‘ यह खौफनाक है।’’

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