17 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व अवकाश की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि बच्चे के शुरुआती सालों में पिता की अनुपस्थिति को सामान्य नहीं माना जा सकता. बच्चे का पालन-पोषण माता और पिता दोनों की समान जिम्मेदारी है.उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद अब भारत में किसी भी उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला को 12 हफ्ते के मातृत्व अवकाश का अधिकार मिलेगा. इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व अवकाश पर भी अहम टिप्पणी की. जस्टिस जे.बी. पार्दीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि अब तक, बच्चे की देखभाल में पिता की भूमिका को काफी हद तक नजरअंदाज किया गया है. इसे बदलने की जरूरत है.
कोर्ट ने पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने की सलाह दी. अदालत हंसानंदिनी नंदुरी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. नंदुरी पेशे से एक कॉरपोरेट वकील हैं. उन्होंने दो बच्चों को गोद लिया और उन्हें मातृत्व अवकाश कानून में खामियां नजर आईं. इसी मामले पर उन्होंने एक जनहित याचिका दायर की थी.
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सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) के अनुसार, अब तक मां को 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश तभी मिल सकता था, यदि गोद लिए गए बच्चे की उम्र तीन महीने से कम हो. अदालत ने इसे असंवैधानिक माना. कोर्ट ने यह भी माना कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल गर्भावस्था नहीं बल्कि बच्चे की देखभाल, भावनात्मक जुड़ाव और शुरुआती विकास को सुनिश्चित करना है. इसी क्रम में पीठ ने पिता की भूमिका को भी बराबर अहमियत दी.
क्या है पितृत्व अवकाश पर मौजूदा कानून?
भारत में पितृत्व अवकाश की व्यवस्था अभी बहुत सीमित और कमजोर है. वर्तमान कानून के अनुसार, यह मुख्य रूप से 15 दिनों के लिए केवल सरकारी कर्मचारियों को मिलता है. वहीं, जन्म देने वाली मां को 26 हफ्ते का सवेतन अवकाश दिया जाता है. जिनके दो या उससे ज्यादा बच्चे हैं, उन्हें 12 हफ्ते का अवकाश मिलता है.
निजी या असंगठित क्षेत्र में पितृत्व अवकाश के लिए कोई एक समान कानून नहीं है और यह पूरी तरह कंपनियों की नीतियों पर निर्भर करता है. ऐसे में कर्मचारी को कैजुअल, मेडिकल या अन्य सवेतन छुट्टियों का इस्तेमाल करना पड़ता है.
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ब्रिटेन, स्वीडन और नॉर्वे जैसे कई देशों में माता-पिता को अपने नवजात शिशु की देखभाल के लिए लगभग एक साल तक का भुगतान सहित अवकाश दिया जाता है. स्वीडन में पिता को 480 दिन का पितृत्व अवकाश और सैलरी मिलती है. वहीं, फिनलैंड में पिता 160 दिन का अवकाश ले सकते हैं.
बस मां की जिम्मेदारी मानना सही नहीं है
बच्चे को अपने शुरुआती सालों में माता-पिता, दोनों से स्नेह और देखभाल मिलनी चाहिए. यह बच्चे के व्यक्तित्व और सोच को आकार देता है. 32 वर्षीय यशिका ठुकराल अपने पति के साथ नोएडा में रहती हैं. उन्होंने कुछ हफ्तों पहले बेटी को जन्म दिया है. वह कहती हैं कि पितृत्व अवकाश मिलने से पिता बच्चे की देखभाल में मदद कर सकेंगे, खासतौर पर रात के समय. इसके कारण वह भी अपने करियर पर ध्यान दे पाएंगी.
डीडब्ल्यू से बातचीत में अपना अनुभव साझा करते हुए यशिका ने बताया, "डिलिवरी के तुरंत बाद मां हार्मोनल असंतुलन के चलते कई शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजरती है. मैं डिप्रेशन, पेट फूलना, थकान और मूड स्विंग्स जैसी परेशानियों से जूझ रही हूं. ऐसे समय में पति का सहयोग जरूरी हो जाता है." यशिका कहती हैं कि मौजूदा व्यवस्था में महिलाओं को नौकरी के साथ बच्चे और घर, दोनों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है.
घर के कामों की दोहरी मार से बिगड़ रहा महिलाओं का स्वास्थ्य
कई पिता अपने नवजात बच्चे की देखभाल के लिए घर पर रहना और उसके साथ समय बिताना चाहते हैं. लेकिन समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक सोच उन्हें ऐसा करने से रोकती है. उन्हें यह डर भी रहता है कि लंबी छुट्टी लेने से उनकी नौकरी पर नकारात्मक असर पड़ेगा.
विशेषज्ञ ध्यान दिलाते हैं कि लैंगिक आधार पर बंटे पारंपरिक दायित्वों के कारण ऐसा कोई मां के लिए नहीं सोचता. यह सब देखकर बच्चे के मन में लैंगिक भूमिकाओं की धारणा बन सकती है. जैसे कि मां की जिम्मेदारी घर पर रहकर बच्चे की परवरिश करना है और पिता का काम बाहर जाकर कमाना.
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ऐसी शिकायतें भी सामने आती हैं कि अगर पुरुष 15 दिन से अधिक छुट्टी लेना भी चाहें, तो अक्सर दफ्तर में प्रबंधक इसमें रुचि नहीं दिखाते. वे मान लेते हैं कि बच्चे का ख्याल रखने के लिए मां घर पर मौजूद है. बच्चे की जिम्मेदारी की समूची अपेक्षा मां से की जाती है.
वर्कफोर्स से बाहर होती महिलाएं
महिलाओं के लिए श्रम व्यवस्था में हिस्सा लेने के मौके कम होते हैं और बाहर निकलने के कारण कई हैं. 'अशोका यूनिवर्सिटी' की एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में लगभग 73 प्रतिशत महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद अपनी नौकरी छोड़ देती हैं.
वहीं, दोबारा काम पर लौटने वाली महिलाओं में से लगभग 48 प्रतिशत चार महीने के भीतर ही रिजाइन कर देती हैं. गर्भावस्था, परिवार और कार्यस्थल पर पर्याप्त साथ न मिलना एवं बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल इसकी मुख्य वजहें बताई गई हैं.
रीतिका सूद एक पीआर फर्म में एचआर हैं. उनकी कंपनी में सात दिन का पितृत्व अवकाश दिया जाता है. वह मानती हैं कि माता और पिता दोनों को समान छुट्टियां मिलनी चाहिए. रीतिका बताती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद महिला की नौकरी या पदोन्नति प्रभावित होने की आशंकाएं सच हैं. वह इस सोच में बदलाव लाने और कार्यस्थल पर समानता व समावेश को बढ़ाने के लिए पितृत्व अवकाश को जरूरी मानती हैं.
डीडब्ल्यू से बातचीत में रीतिका ने कहा, "बच्चे के जन्म जैसे अहम मौके पर कर्मचारियों को दफ्तर से मदद मिले, तो उनका मनोबल और काम के प्रति जुड़ाव बढ़ता है. योजना बनाकर इसे आसानी से संभाला जा सकता है. कुछ समय के लिए पुरुषों को काम का समय बदलने, काम हैंडओवर करने, डेडलाइन बढ़ाने और वर्क फ्रॉम होम जैसी सुविधाएं दी जा सकती हैं."
ऐतिहासिक फैसला, पर अभी लंबा रास्ता तय करना है
याचिकाकर्ता हंसानंदिनी नंदुरी ने 2017 में दो बच्चों को गोद लिया था. उस समय उन्हें केवल छह हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिला. उन्हें कानून की खामियां महसूस हुईं और यह व्यवस्था अन्यायपूर्ण लगी. साल 2021 में उन्होंने एक जनहित याचिका दायर की.
अपनी याचिका में उन्होंने मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 की धारा 5(4) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की. याचिका में इस प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ बताया गया. इसपर सुनाए गए अदालत के फैसले के बाद अब गोद लेने वाली मांओं को 12 हफ्तों का मातृत्व अवकाश मिल सकेगा.
हंसानंदिनी ने इसे नीति से जुड़ा विषय बताया और कहा कि इसपर कानून बनाने वालों को विचार करना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि पितृत्व अवकाश पर अदालत की टिप्पणी एक महत्वपूर्ण कदम है, जो दिखाता है कि कोर्ट ने इस मुद्दे पर गहराई से विचार किया है.
हंसानंदिनी नंदुरी कहती हैं, "मातृत्व अवकाश लंबे समय से मौजूद है. फिर भी इसे सही तरीके से लागू नहीं किया जाता. कई मामलों में महिलाओं की सैलरी, पहला बच्चा होने के बाद से ही कम कर दी जाती है. यह समस्या समाज में भीतर तक बैठी हुई है. माता और पिता बच्चे के पालन-पोषण में समान रूप से भागीदारी निभाएं. यही संतुलन आगे चलकर नौकरियों में दिखने वाली लैंगिक असमानता को भी कम कर सकता है. हालांकि, इस सोच को बदलने में कई पीढ़ियां लगेंगी. पर ऐसे फैसले हमें रुककर सोचने पर मजबूर करते हैं."













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