नयी दिल्ली, 11 मार्च किसान अगर धान के बजाय बाजरा, मक्का और ज्वार जैसे वैकल्पिक अनाज की खेती करें तो जलवायु परिवर्तन की वजह से उत्पादन में आने वाली कमी को 11 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है और इससे किसानों की आय में भी वृद्धि हो सकती है। यह दावा एक नवीनतम अध्ययन में किया गया है।
भारत में किसान आर्थिक रूप से लाभदायक होने के कारण धान की फसल उगाना पसंद करते हैं। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश देश में धान उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले शीर्ष राज्यों में से हैं।
हैदराबाद स्थित इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के अनुसंधानकर्ताओं सहित शोधकर्ताओं के एक दल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और वर्षा में होने वाले बदलाव धान उत्पादन को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे भविष्य में गर्मी बढ़ने से खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि किसी विशेष फसल की कितने रकबे में बुआई करनी है, इसका निर्णय किसान बाजार में फसल की कीमत में उतार-चढ़ाव आधार पर करते हैं, जिससे उनकी आय और लाभ पर संभावित रूप से असर पड़ता है।
अनुसंधान पत्र लेखकों ने ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ पत्रिका में लिखा है, ‘‘फसल क्षेत्र का अनुकूलित आवंटन जलवायु-प्रेरित उत्पादन हानि को 11 प्रतिशत तक कम कर सकता है या फसल क्षेत्र को बनाए रखते हुए किसानों के शुद्ध लाभ में 11 प्रतिशत तक सुधार कर सकता है।’’
उन्होंने लिखा, ‘‘धान के लिए निर्धारित फसल क्षेत्रों को कम करके तथा वैकल्पिक अनाजों के लिए आवंटित क्षेत्रों को बढ़ाकर ऐसे सुधार संभव होंगे।’’
अनुसंधान पत्र लेखकों ने कहा कि संभावित आय वृद्धि के निष्कर्ष किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान कर सकते हैं तथा उन्हें धान के स्थान पर जलवायु-अनुकूल फसलों की ओर स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
अनुसंधान पत्र के लेखक और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के एसोसिएट प्रोफेसर और कार्यकारी निदेशक अश्विनी छत्रे ने कहा, ‘‘यह अध्ययन नीति निर्माताओं के लिए किसानों के निर्णयों को प्रभावित करने वाले आर्थिक कारकों पर विचार करने तथा जलवायु-अनुकूल फसलों की खेती को बढ़ावा देने वाली नीतियों को लागू करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।’’
अनुसंधान के निष्कर्षों पर पहुंचने के लिए अनुसंधानकर्ताओं की टीम ने मानसून (खरीफ) मौसम के दौरान बोई जाने वाली पांच फसलों रागी, मक्का, बाजरा, धान और ज्वार का अध्ययन किया।
उपज, कटाई क्षेत्र और फसल मूल्य पर आंकड़े अर्द्ध शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी), हैदराबाद से लिए गए।
अनुसंधान पत्र के लेखकों ने कहा कि निष्कर्षों ने वर्तमान मूल्य निर्धारण संरचनाओं पर ध्यान देने के महत्व को भी रेखांकित किया- जो वर्तमान में धान की खेती के पक्ष में पक्षपाती हैं।
प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज नामक पत्रिका में 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक धान की खेती वाले 40 प्रतिशत क्षेत्र के स्थान पर अन्य फसलें उगाने से उत्तर भारत में 2000 से अब तक कम हुए 60-100 घन किलोमीटर भूजल को पुनः प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
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