देश की खबरें | आबकारी नीति: धनशोधन मामले में उच्च न्यायालय ने सिसोदिया को जमानत देने से इनकार किया

नयी दिल्ली, तीन जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने आबकारी नीति से जुड़े कथित घोटाले से संबंधित धनशोधन के एक मामले में गिरफ्तार आम आदमी पार्टी (आप) के नेता मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका सोमवार को खारिज कर दी और कहा कि उन पर लगे आरोप “काफी गंभीर” हैं।

सिसोदिया को मामले के संबंध में नौ मार्च को गिरफ्तार किया गया था।

अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस मामले को “अलग दृष्टिकोण” के साथ देखा जाना चाहिए क्योंकि इसमें सार्वजनिक धन के भारी नुकसान से जुड़ी गहरी साजिश का आरोप लगाया गया है।

न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा ने सिसोदिया को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि पूर्व उपमुख्यमंत्री धनशोधन रोधी कानून के तहत जमानत के लिए “ट्रिपल टेस्ट” पास करने में समर्थ नहीं रहे हैं, जिसमें अदालत को यह विचार करना होता है कि क्या किसी आरोपी के न्याय के शिकंजे से भागने, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है।

अदालत ने सिसोदिया के अलावा उद्योगपति अभिषेक बोइनपल्ली, बिनॉय बाबू और विजय नायर की याचिकाएं भी खारिज कर दीं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दर्ज धनशोधन के मामले में ये सभी सह-आरोपी हैं।

उच्च न्यायालय ने सिसोदिया की जमानत याचिका पर 56 पृष्ठ के फैसले में कहा, “वर्तमान मामला एक कथित साजिश से उत्पन्न हुआ है, जिसमें सरकार ने कुछ व्यक्तियों से अग्रिम रूप से प्राप्त रिश्वत की वसूली करने और शराब के व्यापार से अवैध तरीके से धन अर्जित करने के लिए गलत इरादे से आबकारी नीति तैयार की थी।’’

अदालत ने कहा, "रिकॉर्ड में मौजूद गवाह और सबूत दिखाते हैं कि कुछ बाहरी लोग नीति का प्रारूप बनाने और निर्माण के चरण में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे।"

फैसले में कहा गया कि गवाहों के बयान स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि कुछ "बाहरी" तत्व आबकारी नीति की अवधारणा, निर्माण और मसौदा तैयार करने के समय से ही काम कर रहे थे।

उच्च न्यायालय ने कहा कि आबकारी नीति के समर्थन में ई-मेल तैयार करने का आरोप भी "संदेह पैदा करता है कि सबकुछ पारदर्शी और वास्तविक तरीके से नहीं किया जा रहा था।”

पीठ ने कहा, “यह अदालत इस स्तर पर गवाहों के संभावित मूल्य पर विचार नहीं कर सकती और न ही उन तथ्यों की सावधानीपूर्वक जांच कर सकती। नीति के निर्माण और प्रारूप में तीसरे पक्ष की भागीदारी निश्चित रूप से (आपराधिक इरादे) की ओर इशारा करती है।”

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि उन्होंने विशेष अदालत के आदेश का अध्ययन किया है, जिसने पहले उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी और उसे फैसले में कोई त्रुटि या अवैधता नहीं मिली।

फैसले में कहा गया, ''याचिकाकर्ता (सिसोदिया) जमानत के हकदार नहीं हैं, लिहाजा याचिका खारिज की जाती है।''

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि विशेष अदालत ने रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री के आधार पर सोच-विचार कर तर्कसंगत आदेश पारित किया था।

दिल्ली सरकार ने 17 नवंबर 2021 को नीति लागू की थी, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच सितंबर 2022 के अंत में इसे वापस ले लिया गया।

सिसोदिया को घोटाले में कथित भूमिका के लिए सबसे पहले 26 फरवरी को केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने गिरफ्तार किया था और वह तब से हिरासत में हैं। उच्च न्यायालय सीबीआई के मामले में 30 मई को उन्हें जमानत देने से इनकार कर चुका है।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)