नयी दिल्ली, छह फरवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि निर्वाचन आयोग के पास यह समीक्षा करने का कोई पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र नहीं है कि कोई राजनीतिक दल अपने संविधान का पालन कर रहा है या नहीं।
न्यायमूर्ति ज्योति सिंह ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, निर्वाचन आयोग को अपने संवैधानिक प्रावधानों के तहत पार्टी के आंतरिक चुनावों की जांच करने के लिए कोई पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र प्रदान नहीं करता है।
अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 29ए के तहत, निर्वाचन आयोग का कार्य मुख्य रूप से किसी संघ(एसोसिएशन) या नागरिकों के संगठन को राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदनों पर विचार करने तथा यह सुनिश्चित करने तक सीमित है कि बाद में उससे जुड़े किसी भी परिवर्तन की सूचना सटीक रिकॉर्ड के लिए दी जाए।
अदालत के 30 जनवरी के आदेश में कहा गया है,‘‘लेकिन जब कोई राजनीतिक दल पंजीकृत हो जाता है, तो धारा 29ए निर्वाचन आयोग को यह समीक्षा करने के लिए कोई पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र प्रदान नहीं करती है कि पार्टी अपने संविधान का पालन कर रही है या नहीं...।’’
धारा 29ए सघों और संगठनों के निर्वाचन आयोग में राजनीतिक दलों के रूप में पंजीकरण से संबंधित है।
उच्च न्यायालय बहुजन मुक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष परवेंद्र प्रताप सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
सिंह ने आयोग से पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक बुलाने के लिए नोटिस जारी करने तथा पार्टी के संविधान में दिये गए दिशानिर्देशों के अनुसार सदस्यों को उपयुक्त नोटिस देने के बाद पार्टी पदाधिकारी का चुनाव कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
अदालत ने कहा, ‘‘बहुजन मुक्ति पार्टी एक पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है और (आंतरिक) चुनाव आदि से संबंधित इसके आंतरिक मामलों के संबंध में पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने के लिए निर्वाचन आयोग को कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता।’’
उच्च न्यायालय ने अपनी खंडपीठ के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों के आंतरिक विवादों का हल नहीं कर सकता।
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