नयी दिल्ली, 31 मार्च दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि एचआईवी से पीड़ित लोगों को रोजगार में ‘उचित अवसर’ प्रदान करना अधिकारियों का कानूनी दायित्व है।
अदालत ने अर्धसैनिक बलों में तीन ऐसे लोगों को पदोन्नति और नियुक्ति देने से इनकार करने के फैसले को भी खारिज कर दिया, जो एचआईवी से संक्रमित पाए गए थे।
वर्तमान मामले में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में कांस्टेबल के पद पर तैनात दो याचिकाकर्ताओं को पदोन्नति देने से मना कर दिया गया, जबकि तीसरे याचिकाकर्ता, बीएसएफ में प्रोबेशन अवधि पर कार्यरत कांस्टेबल को 2023 में नियुक्ति देने से मना कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें केवल एचआईवी संक्रमित होने के आधार पर पदोन्नति और नियुक्ति से वंचित किया गया था, जो ह्यूमन इम्यूनोडिफीसिअन्सी वायरस एंड एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंसी सिंड्रोम (रोकथाम और नियंत्रण), अधिनियम (एचआईवी अधिनियम) का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति नवीन चावला की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए कहा कि एचआईवी अधिनियम एचआईवी संक्रमित लोगों को रोजगार के मामलों में भेदभाव से बचाता है, खासकर उस स्थिति में जब नियोक्ता ऐसे व्यक्ति को उचित अवसर प्रदान न करने के लिए प्रशासनिक या वित्तीय कठिनाई को ‘प्रमाणित’ करने में सक्षम न हो।
पीठ में न्यायमूर्ति शालिंदर कौर भी शामिल थीं।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को गलत तरीके से पदोन्नति देने से इनकार किया गया और उन्हें पदोन्नति देने से इसलिए मना नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे एचआईवी संक्रमित रोगियों की ‘शेप-1’ श्रेणी में नहीं आते।
पीठ ने कहा कि इस तरह से इनकार करने से एचआईवी अधिनियम के तहत उन्हें दी गई सुरक्षा खत्म हो जाएगी और अदालत ने संबंधित अधिकारियों को उनकी (याचिकाकर्ताओं को) पदोन्नति के मुद्दे की समीक्षा करने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने ठीक इसी प्रकार फैसला सुनाया कि केवल एचआईवी संक्रमित होने के आधार पर प्रोबेशन अवधि पर कार्यरत तीसरे कर्मचारी की सेवा समाप्त करना भी भेदभाव होगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि तीसरे याचिकाकर्ता को सेवा से हटाने/बनाए रखने के संबंध में नए सिरे से निर्णय लिया जाए।
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