नयी दिल्ली, 10 अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को वैकल्पिक वन विकसित करने के लिए प्रशासन से 750 हेक्टेयर भूमि आवंटित करने को कहा। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने कहा कि भावी पीढ़ियों और राष्ट्रीय राजधानी के हित में योजनाबद्ध विकास के लिए इसकी आवश्यकता है।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने दिल्ली सरकार के वन विभाग से कहा कि मौजूदा वन क्षेत्र का अपना जीवनकाल है और एक वैकल्पिक ‘‘समर्पित वन’’ विकसित करने में 10-15 वर्षों का समय लग जाएगा।
न्यायाधीश ने पूर्व में वन संरक्षक को शहर के हरित भाग को बढ़ाने के मुद्दे को ‘‘युद्धस्तर’’ पर उठाने के लिए कहा था।
न्यायाधीश ने कहा कि एक और जंगल विकसित करने के लिए 0.23 एकड़ भूमि आवंटित करने का अधिकारियों का प्रस्ताव एक ‘‘मजाक’’ है।
अदालत ने कहा, ‘‘यह सरकार का इरादा नहीं हो सकता है। आज, हमारे पास एक प्राकृतिक जंगल है। (लेकिन) इसका अपना जीवनकाल है। यह हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को अच्छी गुणवत्ता वाली हवा दें। ..0.23 एकड़ एक मजाक है।’’
इसने कहा, ‘‘मुझे दिल्ली में 750 हेक्टेयर जमीन दीजिए। मैं संतुष्ट हो जाऊंगा। दिल्ली में 750 हेक्टेयर जमीन कोई समस्या नहीं है। यह भी दिल्ली का नियोजित विकास है। हर जगह केवल पक्का निर्माण नहीं हो सकता।’’
अदालत ने वन विभाग के विशेष सचिव को जमीन की पहचान करने का निर्देश देते हुए कहा, ‘‘हमें एक समर्पित जंगल की जरूरत है। आप मुझे 750 हेक्टेयर जमीन दीजिए, हम इसे जंगल के रूप में विकसित करेंगे।’’
अधिकारी ने इस मामले पर भू-स्वामित्व वाली एजेंसियों के साथ चर्चा करने का जिक्र करते हुए अदालत से समय मांगा है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उस स्थान पर स्थानीय प्रजाति के पेड़ लगाए जाएंगे और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) द्वारा उसका रखरखाव किया जाएगा।
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