नयी दिल्ली, 11 नवंबर अजरबैजान के बाकू में सोमवार को शुरू हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में विकासशील और विकसित देशों के बीच अगले 12 दिनों की कार्यसूची में विषयों को चुनने के लिए तीखी बहस हुई।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलनों में कार्यसूची को लेकर विवाद आम है, लेकिन यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने और उससे लड़ने में मदद करने के लिए नए जलवायु वित्तपोषण लक्ष्य पर सहमत होने के लिए देशों के पास सीमित समय है। जलवायु वित्तपोषण इस वर्ष का प्रमुख मुद्दा है।
सम्मेलन की शुरुआत इस वर्ष के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन के मेजबान अजरबैजान द्वारा सभी देशों से लंबित मुद्दों को तत्काल हल करने और एक नए जलवायु वित्त लक्ष्य पर सहमत होने का आह्वान करने के साथ हुई। संयुक्त राष्ट्र जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने कहा कि यह प्रत्येक राष्ट्र के हित में है।
इसके बाद कार्यवाही स्थगित कर दी गई ताकि प्रतिनिधि एजेंडे पर बातचीत कर सकें।
सम्मेलन का शुरुआती पूर्ण अधिवेशन भारतीय समयानुसार शाम सात बजे तक दोबारा शुरू नहीं हो सका था क्योंकि विकसित और विकासशील देशों के बीच इस बात को लेकर गतिरोध है कि क्या ‘एकतरफा व्यापार उपाय’ किए जाएं, जैसे कि यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम), जो कि सीओपी29 की कार्यसूची का एक बिंदु है।
चीन ने बीएएसआईसी (ब्राजील,दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन) समूह के देशों की ओर से पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र जलवायु निकाय को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जिसमें अनुरोध किया गया था कि इस वर्ष के सीओपी में एकतरफा व्यापार उपायों के मुद्दे को संज्ञान में लिया जाए।
सीबीएएम यूरोपीय संघ द्वारा भारत और चीन जैसे देशों से आयातित ऊर्जा और लोहा, इस्पात, सीमेंट, उर्वरक और एल्युमीनियम जैसे उत्पादों पर प्रस्तावित कर है। यह कर इन वस्तुओं के उत्पादन के दौरान उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन पर आधारित है।
यूरोपीय संघ ने पहले दलील दी थी कि यह तंत्र घरेलू स्तर पर निर्मित वस्तुओं के लिए समान अवसर उपलब्ध कराएगा जिन्हें कठोर पर्यावरणीय मानकों का पालन करना होता है एवं आयात से होने वाले उत्सर्जन को रोकने में मदद मिलेगी।
हालांकि, अन्य देशों, विशेषकर विकासशील देशों ने इसका विरोध करते हुए दलील दी कि इस तरह के कर से उनकी अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान हो सकता है तथा यूरोपीय संघ के साथ व्यापार महंगा हो सकता है। इन देशों ने दलील दी कि संयुक्त राष्ट्र जलवायु नियमों के तहत, किसी भी देश को दूसरों पर उत्सर्जन में कमी की रणनीति नहीं थोपनी चाहिए।
एक अन्य विवादास्पद मुद्दा जलवायु वित्त पोषण पर ध्यान केंद्रित करना बनाम सभी वैश्विक परिणामों पर चर्चा करना है।
भारत और चीन सहित समान विचार वाले विकासशील देश, अफ्रीकी समूह चाहते हैं कि सीओपी29 जलवायु वित्त पोषण को प्राथमिकता दे जबकि अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ सहित विकसित देश शमन और जीवाश्म ईंधन से दूर होने सहित सभी परिणामों पर चर्चा करना चाहते हैं।
‘थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क’ की मीना रमण के मुताबिक इस वार्ता में वित्त पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए, लेकिन विकसित देश विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने और उससे निपटने में सहायता के लिए वित्त पोषण पर प्राथमिक ध्यान केन्द्रित करने का विरोध कर रहे हैं।
रमण ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘वे (विकसित देश)कह रहे हैं कि वार्ता में (सीओपी28 के) सभी वैश्विक समीक्षा परिणामों को शामिल किया जाना चाहिए, तथा शमन पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ वे जलवायु वित्तपोषण के अहम मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं।’’
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