नयी दिल्ली, आठ अप्रैल दिल्ली उच्च न्यायालय ने बलात्कार पीड़िता की ओर से दिये गये ‘अनापत्ति प्रमाण-पत्र’ (एनओसी) के बावजूद कथित दुष्कर्म के मामले में दायर प्राथमिकी निरस्त करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि बलात्कार समाज के खिलाफ अपराध है तथा इससे संबंधित आरोपों को न तो लापरवाह तरीके से निपटा जा सकता है, न ही समझौते के आधार पर इसका निर्णय किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर ने कहा, यह तथ्य कि शिकायतकर्ता मुकर गयी है, दुष्कर्म के अपराध से मुक्त नहीं कर सकता, क्योंकि यह अपराध जघन्य है तथा पीड़िता के व्यक्तित्व और उसके मनोबल को तबाह कर देता है।
अदालत ने अपने हालिया आदेश में कहा है, ‘‘..लेकिन केवल समझौता करने से आरोपों का निराकरण नहीं कहा जा सकता या यह नहीं कहा जा सकता कि कथित अपराध के संबंध में प्रतिवादी संख्या -दो (शिकायतकर्ता) द्वारा लगाये गये आरोपों की गम्भीरता समाप्त हो जाएगी। बलात्कार का अपराध किसी व्यक्तिगत के खिलाफ अपराध नहीं है, बल्कि यह समाज के खिलाफ अपराध है।’’
अदालत ने प्राथमिकी निरस्त करने संबंधी अभियुक्त की याचिका खारिज करते हुए कहा, ‘‘महेन्द्र पार्क पुलिस स्टेशन में बलात्कार के आरोपों के तहत दर्ज प्राथमिकी (संख्या 1199/2021) के तहत होने वाली आपराधिक कार्यवाही शिकायतकर्ता की अनापत्ति के बावजूद दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत इस अदालत में निहित शक्तियों के अंतर्गत निरस्त नहीं की जा सकती।’’
इस मामले में याचिकाकर्ता सितम्बर 2021 में शिकायतकर्ता के घर आया था और बाद में कथित दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के वकीलों ने दलील दी थी कि शिकायतकर्ता प्राथमिकी पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाना चाहती है और दोनों के बीच आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाये थे।
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