नयी दिल्ली, 15 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय आम आदमी पार्टी (आप) नेता राघव चड्ढा के राज्यसभा से अनिश्चितकालीन निलंबन को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सोमवार को सुनवाई करेगा।
संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन 11 अगस्त को चड्ढा को ‘‘नियमों के घोर उल्लंघन और अवमाननापूर्ण आचरण’’ के चलते विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट आने तक निलंबित कर दिया गया।
‘आप’ नेता ने वकील शादान फरासत के माध्यम से दायर अपनी याचिका में कहा है कि अनिश्चितकाल के लिए निलंबित किया जाना शक्ति का दुरुपयोग हो सकता है और यह अतिरेक है।
याचिका में कहा गया है, ‘‘निलंबन की शक्ति का उपयोग केवल ढाल के रूप में किया जा सकता है, तलवार के रूप में नहीं, यानी यह दंडात्मक नहीं हो सकती।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘यह निलंबन राज्यों की परिषद (राज्यसभा) में प्रक्रिया और कार्य संचालन की नियमावली के नियम 256 का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसमें सत्र के शेष समय से अधिक अवधि के लिए किसी भी सदस्य के निलंबन को स्पष्ट रूप से निषेध किया गया है।’’
याचिका में कहा गया है कि चालू सत्र की शेष अवधि से परे निलंबन न केवल एक बेहद अतार्किक कदम होगा, बल्कि मूलभूत लोकतांत्रिक मूल्यों का भी उल्लंघन होगा, यह संबंधित सदस्य को अनावश्यक रूप से वंचित करेगा और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके निर्वाचन क्षेत्र से सदन में कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा।
याचिका में कहा गया है कि निलंबन का प्रभाव बर्खास्तगी जैसा नहीं हो सकता, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 101(4) के अनुसार, विशेष रूप से सत्र की अवधि से परे अनिश्चितकालीन निलंबन का प्रभाव वास्तव में 60 दिन की अवधि के बाद एक रिक्त स्थान पैदा कर देता है।
राज्यसभा में नेता सदन पीयूष गोयल ने 11 अगस्त को चड्ढा के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, जिसे ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। चड्ढा पर आरोप है कि उन्होंने राज्यसभा में ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक, 2023’ के लिए प्रस्तावित प्रवर समिति में कुछ सदस्यों के नाम उनकी अनुमति के बिना शामिल किया था।
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