नयी दिल्ली, सात जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को उस जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा जिसमें उससे यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश इस कोविड-19 महामारी के दौरान दिव्यांगों को भी प्रधानमंत्री गरीब अन्न कल्याण योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्रदान करें।
मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी किया और एक एनजीओ की इस अर्जी पर उसका रूख जानना चाहा। एनजीओ ने दलील दी कि जब विभिन्न खाद्य सुरक्षा उपाय लागू किये जा रहे हैं तब दिव्यांगजनों की अनदेखी की जा रही है क्योंकि उनमें से ज्यादातर के पास राशनकार्ड नहीं हैं।
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उपभोक्ता मंत्रालय एवं सामाजिक न्याय मंत्रालय की ओर से पेश होते हुए अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल चेतन शर्मा और केंद्र सरकार के स्थायी वकील विजय गोयल ने आरंभ में ही अदालत से कहा कि एनजीओ संसद के कानून को योजना समझ रहा है।
इस दलील का एनजीओ के वकील संतोष कुमार रूंगटा ने विरोध किया और पीठ से कहा कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को अंत्योदय योजना के तहत खाद्यान्न के लिए पात्र लोगों एवं अन्य प्राथमिकता वाले परिवारों की पहचान करनी होती है।
एनजीओ ने कहा कि विकलांग अधिनियम, 1995 में सभी गरीबी उन्मूलन योजनाओं में सभी दिव्यांगों के लिए तीन फीसदी आरक्षण प्रदान किया गया है जिसे दिव्यांग अधिकार अधिनियम, 2016 में बढ़ाकर पांच फीसदी कर दिया गया। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अंत्योदय अन्न योजना और प्रधानमंत्री गरीब अन्न कल्याण योजना जैसी योजनाओं में खाद्यान्न के लाभार्थियों में पांच फीसदी दिव्यांग हों।
नेशनल फेडरेशन ऑफ ब्लाइंड नामक इस एनजीओ का यह भी कहना था कि चूंकि ज्यादातर दिव्यांग, परिवारों द्वारा उपेक्षा किये जाने पर संस्थानों में रहते हैं और उनके पास पता का कोई सबूत नहीं होता, इसलिये वे राशनकार्ड नहीं हासिल कर पाते हैं।
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