देश की खबरें | न्यायालय ने बिहार विधानपरिषद के कार्यकारी सचिव की नियुक्ति से जुड़े उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप से किया इनकार

नयी दिल्ली, छह सितंबर उच्चतम न्यायालय ने बिहार विधानपरिषद के कार्यकारी सचिव की नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाने वाली याचिका खारिज करने संबंधी पटना उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से बुधवार को इनकार कर दिया।

उच्च न्यायालय ने 28 अप्रैल के अपने आदेश में यह उल्लेख किया था कि कार्यकारी सचिव नियुक्त किये गये व्यक्ति को पक्षकार बनाये बगैर, उनकी नियुक्ति की वैधता पर जनहित याचिका के रूप में रिट याचिका के जरिये सवाल उठाया गया है।

याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘आवश्यक और उचित पक्ष के शामिल न होने पर, यह अदालत रिट याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानेगी। यह अदालत इस पर भी गौर करेगी कि समाज में हाशिये पर मौजूद कमजोर वर्गों के अधिकारों से जुड़ा सार्वजनिक हित का कोई भी मुद्दा इस तत्काल कार्यवाही में नहीं उठाया गया है।’’

बुधवार को शीर्ष न्यायालय में सुनवाई के लिए आये उच्च न्यायालय के आदेश को याचिका के जरिये चुनौती दी गई।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की पीठ ने कहा कि यह केवल इस कारण से उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगा कि नियुक्त व्यक्ति की एक साल की संविदा अवधि लगभग समाप्त हो गई है।

पीठ ने कहा, ‘‘यह कहने की जरूरत नहीं है कि कार्यकाल में यदि कोई और विस्तार किया गया तो यह हमेशा ही याचिकाकर्ता के लिए एक उपयुक्त याचिका के साथ उच्च न्यायालय का रुख करने की राह तैयार कर देगा।’’

याचिकाकर्ता विवेक राज की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि उच्च न्यायालय ने केवल इस आधार पर याचिका खारिज कर दी कि जिस व्यक्ति की नियुक्ति को चुनौती दी गई है, उन्हें मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है।

उन्होंने इसके संविदा आधारित नियुक्ति होने की दलील देते हुए दावा किया कि नियुक्त व्यक्ति पद की पात्रता को पूरा नहीं करता है।

भूषण ने कहा, ‘‘हमारा यह अनुरोध है कि उन्हें पक्षकार बनाने के लिए हमें उच्च न्यायालय वापस जाने की अनुमति दी जाए।’’

पीठ ने कहा कि वह इस पर गौर करेगा कि विषय में क्या किया जा सकता है।

इसने कहा कि व्यक्ति को एक साल की अवधि के लिए पिछले साल सितंबर में नियुक्त किया गया था।

पीठ ने कहा, ‘‘हम केवल इस वजह से हस्तक्षेप नहीं कर सकते कि एक साल की संविदा अवधि लगभग खत्म हो गई है।’’

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