नयी दिल्ली, 13 जनवरी उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उस जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया जिसमें केंद्र को विधि आयोग को ''वैधानिक निकाय'' घोषित करने और आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिंह की पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की इस दलील का संज्ञान लिया कि 22वां विधि आयोग पहले ही गठित किया जा चुका है।
पीठ ने कहा, "कानून का यह स्थापित प्रस्ताव है कि कानून बनाने के लिए संसद को परमादेश जारी नहीं किया जा सकता। यह विशेष रूप से विधायी क्षेत्र से संबंधित है। हम याचिका पर विचार करने से इनकार करते हैं।"
शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की इस दलील पर भी गौर किया कि वह विधि आयोग के समक्ष इस मुद्दे को उठाएंगे।
विधि और न्याय मंत्रालय ने दिसंबर 2021 में जनहित याचिका के जवाब में कहा था कि विधि आयोग को वैधानिक निकाय बनाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
मंत्रालय ने कहा था कि उपाध्याय द्वारा दायर याचिका विचार करने योग्य नहीं है।
जनहित याचिका में गृह, विधि और न्याय मंत्रालयों के साथ विधि आयोग को भी पक्षकार बनाया गया था। इसमें कहा गया कि कार्रवाई का कारण 31 अगस्त, 2018 को उत्पन्न हुआ और 21वें विधि आयोग का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी जारी है लेकिन केंद्र ने न तो अपने अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल बढ़ाया है और न ही 22वां विधि आयोग अधिसूचित किया है।
उपाध्याय ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर याचिका में कहा, ‘‘हालांकि 19 फरवरी, 2020 को केंद्र ने 22वें विधि आयोग के गठन को मंजूरी दे दी, लेकिन उसने आज तक अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं की है।’’
बाईसवें विधि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को नियुक्त करने के लिए केंद्र को निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका में शीर्ष अदालत से खुद ही आवश्यक कार्रवाई करने का आग्रह किया गया था।
याचिका में कहा गया, ‘‘वैकल्पिक रूप से, संविधान के संरक्षक और मौलिक अधिकारों के रक्षक होने के नाते, न्यायालय भारत के 22वें विधि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को नियुक्त करने के लिए अपनी पूर्ण संवैधानिक शक्ति का उपयोग करने की कृपा कर सकता है और यह घोषणा कर सकता है कि भारत का विधि आयोग एक वैधानिक निकाय है।’’
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