देश की खबरें | न्यायालय का पंजाब व उप्र में कार्यवाहक डीजीपी की नियुक्ति के खिलाफ अवमानना याचिका पर विचार से इनकार

नयी दिल्ली, सात अगस्त उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को पंजाब और उत्तर प्रदेश में कार्यवाहक पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति करके शीर्ष अदालत के निर्देशों का कथित उल्लंघन करने को लेकर राज्य सरकारों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।

प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि अवमानना याचिका के बजाय, कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को चुनौती देते हुए एक नई याचिका दायर की जानी चाहिए थी।

पीठ ने अवमानना याचिका दायर करने वाले वकील ब्रजेश सिंह से कहा, “निस्तारित मामले में अवमानना ​​याचिका दायर करने की यह कौन सी प्रथा है? कृपया नई याचिका दायर करें...जब मामले का फैसला हुआ तो आप पक्षकार नहीं थे।’’

सिंह ने कहा कि पंजाब और उत्तर प्रदेश (उप्र) दोनों ने शीर्ष अदालत के निर्देशों की पूरी तरह अवहेलना करते हुए नियमित राज्य पुलिस प्रमुखों के बजाय कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त किए हैं।

उन्होंने कहा, “दोनों राज्यों में, कार्यवाहक डीजीपी एक वर्ष से अधिक समय से पद पर हैं। यहां यह बताना गौरतलब है कि पंजाब के मामले में मौजूदा डीजीपी एक साल से ज्यादा समय से पद पर बने हुए हैं और उत्तर प्रदेश में एक साल में तीन कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त किए गए हैं।”

सिंह ने कहा कि राज्यों ने प्रकाश सिंह मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का पालन नहीं करके अवमानना की है।

वकील ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के अध्यक्ष को भी याचिका में एक पक्ष बनाया है।

गौरव यादव और विजय कुमार वर्तमान में क्रमशः पंजाब और उप्र के डीजीपी के रूप में कार्यरत हैं।

प्रकाश सिंह मामले में 2006 के शीर्ष अदालत के फैसले में कहा गया था कि राज्य के नियमित डीजीपी को “राज्य सरकार द्वारा विभाग के तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से पुलिस बल का नेतृत्व करने के लिए उनकी सेवा अवधि, बहुत अच्छे रिकॉर्ड और अनुभव की सीमा के आधार पर चुना जाएगा, जिन्हें यूपीएससी द्वारा उस रैंक पर पदोन्नति के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

फैसले में यह कहा गया था कि एक बार जब किसी व्यक्ति को डीजीपी के पद के लिए चुना जाता है, तो सेवानिवृत्ति की तारीख के बावजूद उनका न्यूनतम कार्यकाल कम से कम दो वर्ष होना चाहिए।

अदालत ने कहा था कि राज्य सरकार द्वारा राज्य सुरक्षा आयोग के परामर्श से कार्य करते हुए, अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) नियमों के तहत उनके खिलाफ की गई किसी भी कार्रवाई के परिणामस्वरूप या किसी आपराधिक अपराध या भ्रष्टाचार के मामले में अदालत में उनकी सजा के बाद हालांकि डीजीपी को उसकी जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा सकता है।

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