मुंबई, 23 जून बंबई उच्च न्यायालय ने सीकेपी सहकारी बैंक का परिचालन लाइसेंस रद्द करने के भारतीय रिजर्व बैंक के आदेश पर कोई अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि केंद्रीय बैंक के आदेश में कोई भी त्रुटि नहीं है।
न्यायमूर्ति नितिन जामदार और एस. पी. तावड़े की खंडपीठ ने पिछले हफ्ते अपने आदेश में कहा कि रिजर्व बैंक ने जमाकर्ताओं और अन्य हितधारकों के हितों की रक्षा करने के लिए यह निर्णय किया है।
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अदालत ठाणे निवासी विश्वास उतागी की याचिका पर सुनवायी कर रही थी। याचिकाकर्ता ने रिजर्व बैंक के सहकारी बैंक का लाइसेंस रद्द करने के 24 अप्रैल 2020 के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
उतागी ने सीकेपी सहकारी बैंक 500 शेयरधारकों, खाता धारकों, जमाकर्ताओं, कर्मचारियों और अन्य हितधारकों की ओर से यह याचिका दायर की थी।
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उनका आरोप था कि रिजर्व बैंक का आदेश बैंक के प्रबंधक बोर्ड के सदस्यों की असफलता पर पर्दा डालने की कोशिश है। मई 2012 के बाद से बैंक के परिचालन के लिए इन सदस्यों को राज्य सरकार ने नामित किया था।
उतागी का यह भी आरोप था कि केंद्रीय बैंक ने बैंक के जमाकर्ताओं और अन्य हितधारकों के हितों की अनदेखी की है।
खंडपीठ ने कहा कि बैंक का लाइसेंस रद्द करने से पहले रिजर्व बैंक ने उसे कई चेतावनियां दी थीं जो कई अनियमिताओं को उजागर करती हैं। देश में बैंकिंग प्रणाली के हित में रिजर्व बैंक के पास बैंकों पर नजर रखने की शक्ति है। बैंकिंग विनियमन अधिनियम के तहत केंद्रीय बैंक को कई शक्तियां प्रदत्त हैं।
अदालत ने कहा कि सीकेपी बैंक की वित्तीय हालत समय के साथ बिगड़ रही थी। केंद्रीय बैंक ने पाया कि बैंक का कामकाज जमाकर्ताओं और लोगों के हितों के लिए हानिकारक होता जा रहा है। इसी के मद्देनजर केंद्रीय बैंक ने सीकेपी सहकारी बैंक का लाइसेंस रद्द करने का निर्णय किया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि रिजर्व बैंक का निर्णय जमाकर्ताओं के लाभ को ध्यान में रखते हुए किया गया है। उसने प्रदत्त शक्तियों के तहत अनिवार्य कदम उठाया है। इसलिए इस आदेश पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगायी जा सकती।
अदालत ने कहा कि अदालतों के सामान्य तरीके से खुलने पर इस याचिका पर सुनवाई की जाएगी।
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