नयी दिल्ली, चार जुलाई उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) के नामित अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) उमेश कुमार का शपथ ग्रहण समारोह मंगलवार को स्थगित कर दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह राष्ट्रीय राजधानी में बिजली नियामक प्राधिकरण के प्रमुख सहित अन्य नियुक्तियों को नियंत्रित करने वाले केंद्र के हालिया अध्यादेश के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता की जांच करेगी।
उच्चतम न्यायालय ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुमार के शपथ ग्रहण समारोह को स्थगित करने से संबंधित दिल्ली सरकार के बयान को भी रिकॉर्ड में लिया, जिनकी नियुक्ति शहर की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार और केंद्र के बीच विवाद का एक और मुद्दा बन गया है।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुमार इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं।
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि वह 11 जुलाई को न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुमार को ‘गैर-विवादास्पद’ तरीके से डीईआरसी के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने की केंद्र की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करना चाहती है, इसलिए उनका शपथ ग्रहण कार्यक्रम स्थगित किया जाए।
शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किए गए आदेश में कहा गया है, “याचिकाकर्ता (दिल्ली सरकार) की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 21 जून 2023 को जारी अधिसूचना के तहत इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को शपथ दिलाने की योजना अभी स्थगित की जानी चाहिए।”
न्यायालय ने डीईआरसी के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर 21 जून को जारी की गई अधिसूचना को चुनौती देनी वाली दिल्ली सरकार की याचिका पर केंद्र और उपराज्यपाल वी के सक्सेना के कार्यालय को नोटिस भी जारी किया।
जब केंद्र के वकील ने पूर्व न्यायाधीश के शपथ ग्रहण को टालने के फैसले पर आपत्ति जताई, तो पीठ ने कहा कि वह गृह मंत्रालय की अधिसूचना पर रोक लगाने के पक्ष में है।
पीठ ने कहा कि मामले में ‘विशुद्ध रूप से विधि का प्रश्न’ शामिल है। उसने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से सहयोग मांगते हुए याचिका पर सुनवाई के लिए 11 जुलाई की तारीख तय की।
पीठ ने कहा, “नोटिस जारी करें। चूंकि, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) (अध्यादेश) 2023 की धारा-45 डी की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है, इसलिए भारत के अटॉर्नी जनरल को एक औपचारिक नोटिस भी जारी किया जाए।”
उसने आदेश दिया, “मामले की तात्कालिकता को ध्यान में रखते हुए सुनवाई और अंतिम निपटारे के लिए 11 जुलाई की तारीख सूचीबद्ध की जाती है। चूंकि, विशुद्ध रूप से विधि का प्रश्न उठाया गया है, इसलिए पक्षकारों को संक्षिप्त लिखित दलीलें दाखिल करने की आजादी दी गई है। यदि कोई जवाबी हलफनामा दायर किया जाना है, तो याचिकाकर्ता को 10 जुलाई 2023 तक उसकी एक प्रति दी जाए।”
डीईआरसी अध्यक्ष की नियुक्ति दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच टकराव का नया मुद्दा बन गई है। दिल्ली सरकार ने मामले में शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल करते हुए कहा है कि उपराज्यपाल कार्यालय को मंत्रिपरिषद के सहयोग और सलाह पर काम करना होता है, जो उन्होंने नहीं किया है।
उपराज्यपाल की ओर से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को डीईआरसी के नामित अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) उमेश कुमार को मंगलवार सुबह 10 बजे तक शपथ दिलाने का निर्देश देने के बावजूद उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई।
दिल्ली की बिजली मंत्री आतिशी, कुमार को पद की शपथ दिलाने वाली थीं, लेकिन अचानक उन्हें कुछ ‘स्वास्थ्य संबंधी’ समस्याएं होने के कारण कार्यक्रम छह जुलाई तक के लिए टाल दिया गया।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सेवाओं पर नियंत्रण से जुड़ा केंद्र का अध्यादेश नियुक्तियों के मामले में उपराज्यपाल को निर्वाचित सरकार से अधिक शक्तियां प्रदान करता है।
सुनवाई की शुरुआत में, सिंघवी ने केंद्र द्वारा न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुमार को डीईआरसी अध्यक्ष नियुक्त करने की अधिसूचना पर रोक लगाने की मांग की।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि उपराज्यपाल की एकतरफा कार्रवाई सेवाओं पर नियंत्रण के संबंध में शीर्ष अदालत के हालिया फैसले की भावना के खिलाफ है।
उन्होंने याचिकाकर्ता के हवाले से कहा, “एक राजनीतिक कार्यकारी के रूप में, मैं दिल्ली के सबसे गरीब लोगों को 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली देता हूं। यह दिल्ली की सबसे लोकप्रिय योजना है। अब वे इसे रोकने के लिए अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को नियुक्त करना चाहते हैं।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुमार की नियुक्ति 19 मई को शीर्ष अदालत के निर्देश के अनुसार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति लेने के बाद की गई थी।
इस पर पीठ ने पूछा कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति किसने ली। जवाब में मेहता ने कहा कि उपराज्यपाल ने।
उन्होंने कहा, “कृपया इस बात पर मुहर न लगाएं, क्योंकि वे 23 जून से ही इसे टाल रहे हैं। दिल्ली सरकार किसी न किसी कारण से इसे टालती रही है।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “तब बेहतर होगा कि हम उस अधिसूचना पर रोक लगा दें, जैसा कि हम करना चाहते थे। लेकिन हमने सोचा कि हम इससे गैर-विवादित तरीके से निपटेंगे।”
उपराज्यपाल कार्यालय की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने कहा कि दिल्ली सरकार द्वारा अनुशंसित सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव कुमार श्रीवास्तव ने व्यक्तिगत कठिनाइयों का हवाला देते हुए (डीईआरसी अध्यक्ष का) पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
डीईआरसी के पूर्व प्रमुख न्यायमूर्ति शबीहुल हसनैन के नौ जनवरी 2023 को पद छोड़ने के बाद से यह पद खाली है।
बाद में, दिल्ली सरकार ने उपराज्यपाल के समक्ष न्यायमूर्ति श्रीवास्तव को इस पद पर नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा।
शीर्ष अदालत ने 19 मई को कहा कि उपराज्यपाल को मंत्रिपरिषद के सहयोग और सलाह पर कार्य करना होगा और आदेश दिया कि डीईआरसी के अध्यक्ष की नियुक्ति दो सप्ताह के भीतर की जाए।
दिल्ली सरकार ने 21 जून को राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) संगीत राज लोढ़ा का नाम इस पद के लिए भेजा। केंद्र सरकार ने उसी शाम इस पद के लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुमार का नाम अधिसूचित कर दिया, जिसके बाद ‘आप’ सरकार ने शीर्ष अदालत का रुख किया।
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