देश की खबरें | मणिपुर हिंसा में जानमाल का नुकसान होने से न्यायालय चिंतित; पुनर्वास के लिए कदम उठाने के निर्देश

नयी दिल्ली, आठ मई मणिपुर में जानमाल का भारी नुकसान होने पर चिंता जताते हुए उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्र और पूर्वोत्तर के इस राज्य को वहां जातीय हिंसा से प्रभावित हुए लोगों को राहत सहायता मुहैया करने तथा उनके पुनर्वास के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा।

साथ ही, न्यायालय ने उपासना स्थलों की सुरक्षा करने का भी निर्देश दिया, जिनमें से कई को हिंसा के दौरान निशाना बनाया गया है।

स्थिति से निपटने के लिए उठाये गये कदमों को गिनाते हुए केंद्र ने प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ से कहा कि बीते दो दिनों में मणिपुर में कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है और स्थिति क्रमिक रूप से सामान्य होती जा रही है।

मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों और इंफाल घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मेइती समुदाय के लोगों के बीच हिंसक झड़पों में अब तक 50 से अधिक लोग मारे गये हैं। मेइती समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की उसकी मांग को लेकर यह हिंसा भड़की थी। 23,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला गया और उन्होंने सैन्य छावनियों तथा राहत शिविरों में शरण ले रखी है।

पीठ ने हिंसा के बाद की स्थिति को मानवीय समस्या करार देते हुए कहा कि राहत शिविरों में उपयुक्त इंतजाम किये जाएं और वहां शरण लेने वाले लोगों को भोजन, राशन तथा चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं।

पीठ में न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला भी शामिल हैं।

शीर्ष न्यायालय ने कहा, ‘‘हम लोगों के जान गंवाने, संपत्ति को नुकसान पहुंचने को लेकर बहुत चिंतित हैं...।’’ पीठ ने अपनी चिंता जताते हुए कहा कि उसे कार्रवाई के लिए इसे सरकार के जिम्मे छोड़ देना चाहिए...। न्यायालय ने कहा कि स्थिति से निपटने के लिए सरकार जो कुछ कर रही है उसमें संदेह करने का कोई कारण नहीं है।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए सभी आवश्यक कदम उठाये जाएं और उपासना स्थलों की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास किये जाएं।

केंद्र और राज्य की ओर से न्यायालय में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हिंसा से निपटने के लिए उठाये गये कदमों से पीठ को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि सेना/असम राइफल्स की 105 टुकड़ियों के अलावा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की 52 कंपनियां हिंसा प्रभावित इलाकों में तैनात की गई हैं।

उन्होंने न्यायालय को बताया कि अशांत इलाकों में ‘फ्लैग मार्च’ किया जा रहा और शांति कायम करने के लिए बैठकें की गई हैं।

मेहता ने बताया कि राज्य सरकार ने पुलिस के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी को सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया है और केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गये एक अन्य शीर्ष अधिकारी को मणिपुर में मुख्य सचिव के तौर पर सेवा देने के लिए रविवार को वापस बुलाया गया।

उन्होंने कहा कि स्थिति की लगातार निगरानी की जा रही है और इसके लिए हेलीकॉप्टर तथा ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

मेहता ने कहा कि विस्थापितों के लिए राहत शिविर संचालित किये जा रहे हैं और सुरक्षा बल फंसे हुए लोगों की आवाजाही में सहायता कर रहे हैं।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि बीते दो दिनों में कोई हिंसा नहीं हुई और क्रमिक रूप से स्थिति सामान्य होती जा रही है। रविवार और आज सोमवार को कुछ घंटों के लिए कर्फ्यू में ढील दी गई।

मेहता ने कहा, ‘‘हर चीज को शांत होने दीजिए। मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि व्यापक हित में इस विषय को एक हफ्ते या 10 दिन बाद के लिए निर्धारित कर दिया जाए और हम देखेंगे कि क्या होता है।’’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील द्वारा जताई गई कुछ चिंताओं के सिलसिले में मेहता ने कहा कि उनका संज्ञान लिया जाएगा और अधिकारी आवश्यक कदम उठाएंगे।

हालांकि, शीर्ष न्यायालय ने मेहता की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए मणिपुर हिंसा से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई 17 मई के लिए निर्धारित कर दी और केंद्र तथा राज्य को उस वक्त तक अद्यतन स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान पीठ ने सवाल किया कि कितने राहत शिविर स्थापित किये गये हैं और वहां कितने लोगों को रखा गया है। पीठ ने कहा, ‘‘हम जानना चाहते हैं कि इन राहत शिविरों में किस तरह के इंतजाम किये गये हैं क्योंकि ये मानवीय मुद्दे हैं। ये राहत शिविर कौन संचालित कर रहे हैं? क्या वह सीएपीएफ है या ये सेना के राहत शिविर हैं?’’

पीठ ने कहा कि एक अन्य पहलू विस्थापित लोगों के बारे में है। न्यायालय ने सवाल किया कि क्या सरकार इन लोगों को क्रमिक रूप से वापस लाने की कोशिश कर रही है।

न्यायालय मणिपुर की स्थिति संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इनमें, सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक डिंगंगलुंग गंगमेई द्वारा दायर याचिका भी शामिल है, जिसमें मेइती समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिये जाने के मुद्दे पर उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई है।

गंगमेई ‘हिल्स एरिया कमेटी’ के अध्यक्ष भी हैं।

याचिकाओं में एक आदिवासी संगठन द्वारा दायर एक जनहित याचिका भी शामिल है, जिसमें हिंसा की विशेष जांच टीम से जांच कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

सुनवाई के दौरान, एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजालविस ने राज्य के कुछ खास हिस्सों से लोगों की सुरक्षित निकासी का मुद्दा भी उठाया।

चुराचांदपुर जिले में मेइती समुदाय के लोगों और जनजातीय लोगों के बीच बीते बुधवार को झड़पें शुरू हुई थीं।

उल्लेखनीय है कि जनजातीय लोग 27 मार्च को मणिपुर उच्च न्यायालय के आदेश के बाद मेइती समुदाय को आरक्षण दिये जाने का विरोध कर रहे हैं। उच्च न्यायालय ने समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के लिए राज्य सरकार को चार हफ्तों के अंदर केंद्र को एक सिफारिश भेजने का निर्देश दिया था।

मणिपुर की आबादी में मेइती समुदाय की हिस्सेदारी करीब 53 प्रतिशत है और वे मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहते हैं। आदिवासियों-नगा और कुकी- की हिस्सेदारी आबादी में करीब 40 प्रतिशत है तथा वे मुख्य रूप से पर्वतीय जिलों में रहते हैं।

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