लखनऊ, एक अप्रैल इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सुनवाई के दौरान 22 साल बाद भी अपने को बाल आरोपी घोषित करने के लिए याचिका दायर की जा सकती है।
पीठ ने दहेज हत्या के 22 साल पुराने मामले में एक महिला को, जो वर्ष 2000 में अपनी भाभी की मौत के समय नाबालिग थी, अपने मामले को किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) में स्थानांतरित करने के लिए संबंधित अदालत के समक्ष याचिका दायर करने की अनुमति दी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह की एकल पीठ ने कथित तौर पर वर्ष 2000 में दहेज हत्या के मामले में मृतका की ननद की याचिका पर पारित किया। याचिका में महिला ने कहा है कि घटना के समय वह मात्र 13 वर्ष की थी। वर्ष 2000 में महिला की भाभी की मौत के मामले में बतौर आरोपी उसका भी नाम शामिल किया गया था।
फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह की पीठ ने कहा, “किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम की धारा सात (ए) के प्रावधानों को पढ़ने से विधायिका की मंशा बहुत स्पष्ट है, जो किसी भी स्तर पर अभियुक्त को घटना के समय किशोर होने का तर्क देने की अनुमति देती है।’’
इस अवलोकन के साथ, पीठ ने एक निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया और याची को अनुमति दी कि वह संबंधित अदालत में अपने को बाल आरोपी घोषित कर अपना मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेजने की अर्जी दाखिल करे जिस पर वह अदालत पैंतालीस दिन में आदेश पारित करेगी।
पीठ ने याचिकाकर्ता की याचिका पर फैसला सुनाते हुए आदेश पारित किया, जिसने आरोप लगाया था कि उसे वर्ष 2000 में दहेज हत्या के मामले में झूठा फंसाया गया था, जब वह केवल तेरह वर्ष की थी। इसके बाद उसने शादी कर ली और अपने पति के साथ रह रही है। अब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सीतापुर ने मामले में उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है।
जब उसने अपने मामले को जेजेबी में स्थानांतरित करने का अनुरोध करते हुए घटना के समय किशोर होने की याचिका दायर की, तो मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) ने सात दिसंबर, 2022 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि मांग 22 साल बाद उठाई गई है।
सीजेएम के आदेश को रद्द करते हुए पीठ ने कहा कि इस मामले में नाबालिग होने की दलील पेश करने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है।
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