देश की खबरें | लोकतंत्र में सहमति-असहमति स्वाभाविक लेकिन नियोजित तरीके से सदन में व्यवधान नहीं डाला जाए : बिरला

नयी दिल्ली, 22 दिसंबर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को कहा कि लोकतंत्र में सहमति और असहमति स्वाभाविक हैं लेकिन नियोजित तरीके से सदन में व्यवधान डालना ठीक नहीं है।

संसद के शीतकालीन सत्र के बुधवार को अनिश्चित काल के लिये स्थगित होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संवाददाताओं से बातचीत में यह बात कही।

बिरला ने कार्यवाही के दौरान शोर-शराबे से संबंधित एक सवाल के जवाब में कहा, ‘‘आप (विपक्ष) असहमति दर्ज कराएं लेकिन सदन नहीं चले, यह ठीक नहीं है।’’

उन्होंने कहा कि पीठासीन सभापतियों के सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी थी कि प्रश्नकाल स्थगित नहीं होना चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसद में सहमति-असहमति हो, लेकिन यह चर्चा एवं संवाद के जरिये होना चाहिए।

बिरला ने कहा, ‘‘मेरे लिये सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही बराबर हैं। मैंने सभी को अपनी बात रखने का पर्याप्त समय दिया है।’’

उन्होंने कहा कि सदस्यों के विरोध दर्ज कराने के लिये अगर पहले आसन के समीप आने का कोई चलन रहा भी है, तब भी यह उचित नहीं है। ऐसी परंपरा नहीं होनी चाहिए।

बिरला ने कहा कि सदन में चर्चा नियमों एवं प्रक्रियाओं के तहत होती है, इसलिये कोई भी विषय नियमों के तहत आयेगा, तो चर्चा होगी।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सहमति और असहमति स्वाभाविक हैं लेकिन नियोजित तरीके से सदन में व्यवधान डालना ठीक नहीं है।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इस सत्र में 70 प्रतिशत विधेयकों को संसदीय समितियों के समक्ष भेजा गया।

उन्होंने कहा कि हमने हमेशा इस बात का प्रयास किया है कि संसदीय समितियों में वर्तमान परिस्थितियों में कामकाज में व्यापक बदलाव आए और इस बारे में आदर्श आचार संहिता बने।

बिरला ने कहा, ‘‘यह सत्र 29 नवंबर से शुरू हुआ और इस दौरान कुल 18 बैठकें हुईं जो 83 घंटे 12 मिनट तक चलीं।’’

उन्होंने बताया कि सत्र के आरंभ में सदन के तीन सदस्यों ने 29 और 30 नवंबर को शपथ ली। बिरला ने कहा कि इस सत्र में महत्वपूर्ण वित्तीय और विधायी कार्य निपटाये गए और इस दौरान 12 सरकारी विधेयक पेश किये गए और 9 विधेयक पारित हुए।

बिरला ने कहा कि इस दौरान सदन का कार्य निष्पादन 82 प्रतिशत रहा और व्यवधान के कारण 18 घंटे 48 मिनट का समय व्यर्थ गया।

उन्होंने कहा, ‘‘सभा का कार्य निष्पादन आशा के अनुरूप नहीं रह पाया।’’

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