लखनऊ, 23 दिसंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने शहरी स्थानीय निकाय चुनाव मुद्दे पर शनिवार को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने पिछले एक पखवाड़े से चुनाव की अधिसूचना जारी करने पर रोक लगा रखी है। पीठ ने कहा कि वह 27 दिसंबर को अपना फैसला सुनाएगी।
न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सौरभ लवनिया की पीठ ने वैभव पांडेय एवं अन्य द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर यह आदेश पारित किया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एलपी मिश्रा ने कहा कि शहरी स्थानीय निकायों में ओबीसी को दिया जाने वाला आरक्षण, सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में दिए जाने वाले आरक्षण से भिन्न है।
उन्होंने कहा कि ओबीसी चुनाव को आरक्षण राजनीतिक है ना कि सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक। इसलिए उच्चतम न्यायालय ने सुरेश महाजन के मामले में स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी को राजनीतिक आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए ट्रिपल टेस्ट फार्मूला पेश किया।
इन याचिकाओं का विरोध करते हुए अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता अमिताभ राय ने कहा कि राज्य सरकार पहले ही एक सर्वेक्षण करा चुकी है और घर घर जाकर नमूने एकत्रित किए गए।
राय ने कहा कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए तैयार आरक्षण, रैपिड सर्वे में एकत्रित आंकड़ों के आधार पर उपलब्ध कराया गया है। राज्य सरकार ने म्युनिसिपलिटी एक्ट के प्रावधानों का भी पालन किया जिसमें स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के लिए प्रावधान है।
उन्होंने यह दलील भी दी कि याचिकाकर्ताओं ने म्युनिसिपलिटी एक्ट के प्रावधानों को चुनौती नहीं दी है, इसलिए ये याचिकाएं पोषणीय नहीं हैं।
राय के तर्कों पर प्रतिक्रिया देते हुए पीठ ने उनसे पूछा कि भले ही यह मान लिया जाए कि राज्य सरकार ने एक विस्तृत सर्वे कराया है, क्या सरकार द्वारा तैयार इस सर्वे रिपोर्ट में ओबीसी को कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया गया।
अपर महाधिवक्ता वीके शाही भी अदालत में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने बहस नहीं की। इससे अदालत में मौजूद लोगों के बीच राज्य सरकार के इरादे को लेकर अटकलें लगाई गईं कि क्या सरकार खुद इन चुनावों को जल्द नहीं कराना चाहती।
इस बीच, पीठ ने फैसला सुनाए जाने तक अधिसूचना जारी करने पर लगी रोक बढ़ा दी।
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