नयी दिल्ली, 29 जुलाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा है कि भारतीयों ने कभी भी मुगलों को अपने से श्रेष्ठ नहीं माना, लेकिन औपनिवेशिक शासन ने उनमें गुलाम मानसिकता पैदा कर दी, जो आजादी के बाद भी जारी रही।
होसबाले ने यहां राज्यसभा के पूर्व सदस्य बलबीर पुंज की किताब ‘नैरेटिव का मायाजाल’ के शुक्रवार की शाम विमोचन के मौके पर कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान तय विमर्श को उनके ‘अभिकर्ताओं (एजेंट)’ द्वारा स्वतंत्रता के बाद आगे बढ़ाया गया।
विमोचन कार्यक्रम में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और वकील एवं स्तंभकार जे. साई. दीपक भी मौजूद थे।
विमर्शों के बारे में होसबाले ने कहा कि जब मुगलों ने देश पर आक्रमण किया तो लोगों ने उनका डटकर सामना किया।
संघ के सरकार्यवाह ने कहा, ‘‘मुगलों ने जब देश पर आक्रमण किया था तब देश के लोगों ने जमकर सामना किया था। हमने कभी नहीं सोचा कि मुगल हमसे श्रेष्ठ हैं... इस देश के लोगों ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि जिन बर्बर लोगों ने हम पर हमला किया, वे हमसे श्रेष्ठ थे।’’
उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान एक ऐसी कहानी गढ़ी गई जिससे लोगों को यह विश्वास हो गया कि वे गुलाम हैं और ‘‘गोरे लोगों पर बोझ’’ हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘डेढ़ सौ साल के औपनिवेशिक शासन में, जो लोग खुद को शिक्षित कहते थे, उन्होंने यह मानना शुरू कर दिया कि हम अविकसित हैं, हमने दुनिया को कुछ नहीं दिया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘आजादी के बाद इसे बदलना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय उनके ‘एजेंट’ ने शिक्षा जगत, विश्वविद्यालयों, अंतरराष्ट्रीय मीडिया, थिंक टैंक, न्यायपालिका के माध्यम से एक विमर्श तय किया, वे हर जगह मौजूद थे।’’
उन्होंने कहा कि हिंदुओं, भारत, इसकी संस्कृति और इससे जुड़ी हर चीज के बारे में घृणा पैदा करने के कई प्रयास किए गए। उन्होंने कहा, ‘‘इस देश के तथाकथित शिक्षित लोगों और मीडिया ने इस विमर्श को स्वीकार कर लिया है। यूरोप-केंद्रित विचार हमारे जीवन, हमारी शिक्षा प्रणाली और समाज के प्रति हमारे दृष्टिकोण में हैं। जब तक हम औपनिवेशिक मानसिकता को नहीं छोड़ेंगे, यह विमर्श नहीं बदलेगा।’’
आरिफ मोहम्मद खान ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस के स्पष्ट संदर्भ में, परिवर्तन लाने का प्रयास करने वाले सामाजिक संगठनों की सराहना की। हालांकि उन्होंने इसका नाम नहीं लिया।
खान ने एकल विद्यालयों की सराहना की और उन संगठनों की भी सराहना की, जो सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए जमीन पर काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं जानबूझकर किसी संगठन का नाम नहीं ले रहा हूं... मैं नागपुर गया था, मुझे विश्वविद्यालय ने आमंत्रित किया था, मैं अन्य लोगों से भी मिला, मैंने उनसे कहा कि आप बहुत काम कर रहे हैं, लेकिन जो चीज मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है वह एकल विद्यालय है।’’
एकल विद्यालय फाउंडेशन की स्थापना 1986 में गुमला जिले (अब झारखंड में) में की गई थी।
पुंज ने उम्मीद जताई कि उनकी किताब ‘‘औपनिवेशिक विमर्शों’’ को तोड़ने में मदद करेगी।
हिंदी में लिखी गई और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक कई विमर्शों और भारतीय राजनीति तथा समाज पर उनके प्रभाव की पड़ताल करती है।
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