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अब और ज्यादा जंगली मांस खा रहे हैं मध्य अफ्रीकी देश

साइंस पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित एक नए शोध के मुताबिक, मध्य अफ्रीका में जंगली मांस की सालाना खपत 11 लाख टन के पार पहुंच गई है.

अब और ज्यादा जंगली मांस खा रहे हैं मध्य अफ्रीकी देश
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

साइंस पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित एक नए शोध के मुताबिक, मध्य अफ्रीका में जंगली मांस की सालाना खपत 11 लाख टन के पार पहुंच गई है. शहरों की बढ़ती आबादी और रुतबे की चाह वन्यजीवों और स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत बन सकती है.वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित एक शोध में पता चला है कि मध्य अफ्रीकी देशों में जंगली मांस की खपत काफी बढ़ी है. इस रिसर्च के मुताबिक, जंगली मांस की मांग में आई इस भारी तेजी की मुख्य वजह शहरों में रहने वाली आबादी है. आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2000 में मध्य अफ्रीका में जंगली मांस की सालाना खपत करीब 7.3 लाख टन थी, जो साल 2022 तक बढ़कर 11 लाख टन पर पहुंच गई है.

यह शोध ऐसा विश्लेषण पेश करता है, जो वक्त और जगह के साथ यहां हुए बदलावों को मापता है. खपत में हुई इस बेतहाशा बढ़ोतरी ने न सिर्फ जंगली जानवरों के वजूद पर खतरा पैदा किया है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भविष्य की खाद्य सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है. यह सर्वे कैमरून, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, डेमोक्रैटिक रिपब्लिक कॉन्गो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन और रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो में किया गया है.

बढ़ती शहरी आबादी की जरूरतें

मौजूदा दौर में, मध्य अफ्रीका की करीब 51 प्रतिशत आबादी शहरों में बस चुकी है. यहां जंगली खान-पान के साधन तो कम हैं ही, लेकिन पालतू जानवरों और मांस के विकल्पों से जुड़ी आधुनिक व्यवस्था भी अब तक अक्सर पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है. इसलिए शहरी इलाकों तक जंगली मांस की सप्लाई ग्रामीण इलाकों से होती है. यह कारोबार ज्यादातर बिना किसी सरकारी नियमों के चल रहा है, जो अब गांव और शहर के बहुत से लोगों के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया बन चुका है.

खाद्य सुरक्षा और संरक्षण के बीच संतुलन

ग्रामीण इलाकों में रहने वाली बड़ी आबादी के लिए जंगली जानवरों का मांस उनके भोजन का एक अनिवार्य हिस्सा है, जो उनके शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन का 20 प्रतिशत हिस्सा पूरा करता है. ग्रामीण जंगली मांस को पालतू जानवरों या बाहर से आने वाले मांस के मुकाबले ज्यादा सेहतमंद मानते हैं और यह लोगों के लिए रुतबे की निशानी भी बन चुका है. मगर जिस रफ्तार से पूरे इलाके में इसका कारोबार बढ़ रहा है, उसे देखते हुए यह खपत आने वाले वक्त में सस्टेनेबल नहीं रह पाएगी.

शोध के मुख्य लेखक और माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल विहेवियर व यूनिवर्सिटी ऑफ कॉन्स्टान्ज के वैज्ञानिक मत्तिया बेसोने कहते हैं, "जंगली मांस की खपत मध्य अफ्रीका के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने का एक अहम हिस्सा है." वे बताते हैं, "इस इलाके के देशों के लिए जंगली मांस की सस्टेनेबल खपत सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए, और वे ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क और संयुक्त राष्ट्र के विकास लक्ष्यों को हासिल कर सकें."

ग्रामीण समुदायों को जरूरी पोषण मिलता रहे, इसके लिए इस शोध का सुझाव है कि शहरों में जंगली मांस की मांग कम की जाए और इसकी जगह मुर्गी पालन जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए.

22 साल तक डेटा जमा किया गया

ये नतीजे अब तक के सबसे बड़े आंकड़ों पर आधारित हैं, जिसमें मध्य अफ्रीका के 252 क्षेत्रों के 12,000 से ज्यादा घरों का जायजा लिया गया है. इसके लिए साल 2000 से डेटा जमा करना शुरू किया गया था. हालांकि, अभी भी कई जानकारियां जुटानी बाकी हैं, और लेखक बेहतर निगरानी व नतीजों की पुष्टि के लिए इस पूरे क्षेत्र में और अधिक जमीनी शोध की जरूरत बताते हैं.

इस शोध को दुनिया के कई नामी संस्थानों ने मिलकर अंजाम दिया है, जिनमें अंतरराष्ट्रीय वानिकी अनुसंधान केंद्र, केंट यूनिवर्सिटी, स्टर्लिंग यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ कॉन्स्टान्ज, माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल विहेवियर और गैबॉन का ट्रॉपिकल ईकोलॉजी रिसर्च संस्थान शामिल हैं.

(The above story first appeared on LatestLY on May 03, 2026 02:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).