नयी दिल्ली, चार दिसंबर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने राष्ट्रीय राजधानी में ‘‘लगातार वायु प्रदूषण संकट’’ पर केंद्र से जवाब मांगा है।
एनजीटी उस मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने उस खबर पर स्वतः संज्ञान लिया था, जो वायु प्रदूषण के कारणों के बारे में एक अध्ययन पर आधारित थी।
एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने 27 नवंबर को पारित आदेश में कहा, ‘‘खबर के अनुसार, ऊर्जा एवं स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (सीआरईए) के एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि क्षेत्र में ताप विद्युत संयंत्र पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की तुलना में 16 गुना अधिक वायु प्रदूषण उत्सर्जित करने के लिए जिम्मेदार हैं।’’
पीठ में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य ए. सेंथिल वेल भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि वर्तमान में दिल्ली ‘‘लगातार वायु प्रदूषण संकट का सामना कर रही है, वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) (हाल में) खतरनाक स्तर 488 तक पहुंच गया है।’’
इसने कहा कि खबर में कहा गया है कि एनसीआर में कोयले से चलने वाले ताप विद्युत संयंत्रों से सालाना 281 किलोटन सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) उत्सर्जित होता है, जबकि इसकी तुलना में पराली जलाने से, जिसे अक्सर प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है, लगभग 89 लाख टन पराली जलाने से 17.8 किलोटन एसओ2 उत्सर्जित होता है।
हरित निकाय ने यह भी कहा कि खबर के अनुसार, दिल्ली में मौसम की स्थिति प्रदूषण संकट को बढ़ा रही है।
अधिकरण ने कहा, ‘‘यह मामला वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन का संकेत देता है। खबर में पर्यावरण मानदंडों के अनुपालन से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं।’’
इसमें केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति और हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पंजाब के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के सदस्य सचिवों को पक्षकार या प्रतिवादी बनाया गया।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के निदेशक को भी प्रतिवादी के रूप में शामिल किया गया।
अधिकरण ने कहा, ‘‘प्रतिवादियों को अगली सुनवाई की तारीख (19 मार्च) से कम से कम एक सप्ताह पहले हलफनामे के माध्यम से अपना जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया जाता है।’’
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