प्रयागराज, 12 जुलाई कृत्रिम गर्भाधान के जरिए दुधारू पशुओं का नस्ल सुधारने और ग्रामीणों की आय बढ़ाने के काम में लगे बीएआईएफ डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन ने बुंदेलखंड के सभी सात जिलों में पिछले एक वर्ष में गाय और भैंस के 68,000 कृत्रिम गर्भाधान किए और इसके अपेक्षित परिणाम आने लगे हैं। बीएआईएफ के मुख्य कार्यक्रम कार्यकारी (उत्तर प्रदेश) डॉक्टर रविराज एस जाधव ने ‘पीटीआई-’ को बताया कि पिछले एक वर्ष में बुंदेलखंड में गाय और भैंस के 68,000 कृत्रिम गर्भाधान किए गए जिसमें 28,000-29,000 पशुओं में गर्भाधान सफल रहा। वर्गीकृत बीज (सॉर्टेड सीमेन्स) से किए गए गर्भाधान में पशुओं से 90 प्रतिशत मादा बच्चे पैदा होने की संभावना रहती है।
उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड में गायों में देसी नस्ल साहीवाल और थारपारकर के बैलों और विदेशी नस्ल में जर्सी से कृत्रिम गर्भाधान किया गया, वहीं भैंसों में मुर्रा भैंसा के वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान कराया गया। इसके नतीजे आने शुरू हो गए हैं जिसमें अभी तक जन्मे 210 बच्चों में 93 प्रतिशत मादा हैं।
जाधव ने बताया कि पूरे उत्तर प्रदेश में बीएआईएफ के 1300 केंद्र परिचालन में हैं जहां किसानों को कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा मुहैया कराई जा रही है। बुंदेलखंड में सरकारी योजना के तहत गायों और भैंसों के कृत्रिम गर्भाधान के लिए किसानों से महज 100 रुपये प्रति गर्भाधान शुल्क लिया गया।
उन्होंने बताया कि बीएआईएफ का अगला लक्ष्य बकरियों का कृत्रिम गर्भाधान है क्योंकि गांवों में बड़ी संख्या में गरीब लोग बकरियां पालते हैं। हालांकि ज्यादातर बकरियों की नस्ल उच्च कोटि की नहीं है। अगले छह महीने में बकरियों का कृत्रिम गर्भाधान शुरू करने की योजना है।
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जाधव ने बताया कि बीएआईएफ उत्तर प्रदेश के हमीरपुर और शाहजहांपुर जिलों से बकरियों के कृत्रिम गर्भाधान की शुरुआत करेगा जिसके बाद अन्य जिलों को इस कार्यक्रम के दायरे में लाया जाएगा। वर्तमान में महाराष्ट्र और राजस्थान में बकरियों का कृत्रिम गर्भाधान किया जा रहा है। यह कार्यक्रम मार्च में ही शुरू होना था, लेकिन लॉकडाउन के चलते यह टल गया।
उन्होंने बताया कि एक बकरे से 30-35 बकरियों का कृत्रिम गर्भाधान किया जा सकता है और प्रति बकरी कृत्रिम गर्भाधान का शुल्क 150 रुपये से 200 रुपये के बीच लिया जाता है। वर्तमान में बकरियां अपने झुंड में ही किसी बकरे से गर्भ धारण कर लेती हैं। जबकि कृत्रिम गर्भाधान में बरबेरी और सिरोही जैसे उच्च नस्ल के बकरे के वीर्य का उपयोग किया जाएगा।
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