कैंसर पर डब्ल्यूएचओ की नई चेतावनी: जानें क्या हैं बड़े खतरे

डब्ल्यूएचओ की एक नई स्टडी के मुताबिक, साल 2022 में कैंसर के 70 लाख से ज्यादा मामलों को रोका जा सकता था.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

डब्ल्यूएचओ की एक नई स्टडी के मुताबिक, साल 2022 में कैंसर के 70 लाख से ज्यादा मामलों को रोका जा सकता था. उस साल सामने आए कुल मामलों में से लगभग 40 फीसदी मामले उन जोखिमों से जुड़े थे जिन्हें हम बदल सकते हैं.इंटरनेशनल एजेंसी ऑन रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) में कैंसर सर्विलांस स्पेशलिस्ट इसाबेल सोर्जियोमाताराम ने कहा, "अब हमारे पास कैंसर होने से पहले उसे रोकने की जानकारी है.”

हाल ही में मीडिया से बात करते हुए सोर्जियोमाताराम और उनके सहयोगी आंद्रे इल्बावी ने 185 देशों में 36 तरह के कैंसर पर हुए एक अध्ययन के नतीजे को पेश किया. दोनों ने मिलकर इस स्टडी को लिखा है और फरवरी 2026 में ही मेडिकल जर्नल ‘नेचर मेडिसिन' में इसके नतीजे प्रकाशित किए गए.

इस अध्ययन की शुरुआत ऐसे आंकड़ों से होती है जो सोर्जियोमाताराम के शुरुआती दावे जितना ही चौंकाने वाला है. साल 2022 में कैंसर के 71 लाख नए मामले ऐसे थे जिन्हें रोका जा सकता था. इन्हें ‘मॉडिफिएबल रिस्क फैक्टर (एमआरएफ) कहा जाता है यानी बदलाव योग्य जोखिम कारक. जैसे, तंबाकू और शराब का सेवन या फिर कुछ खास तरह के इन्फेक्शन. इसका मतलब है कि 2022 में आए कुल 1.87 करोड़ मामलों में से 37.8 फीसदी मामले बदलाव योग्य जोखिम कारकों से जुड़े थे.

एमआरएफ पर शोध कोई बिल्कुल नई बात नहीं है. हम लंबे समय से जानते हैं कि मोटापा, अधिक वजन, वायु प्रदूषण और पर्यावरण के अन्य जहरीले तत्व कैंसर का कारण बन सकते हैं. लेकिन ‘कैंसर को शुरू होने से पहले रोकना' केवल व्यक्तिगत आदतों पर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच या उपलब्धता पर भी निर्भर करता है जो कि दुनिया में हर जगह एक समान नहीं है.

हालांकि, इस अध्ययन की बारीकियां हमें उन खतरों के बारे में गहराई से समझने में मदद करती हैं, जो विभिन्न इलाकों और महिलाओं या पुरुषों के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं.

लेखकों ने 30 ऐसे खतरों की जांच की जिनसे बचा जा सकता है. इनमें तंबाकू, शराब और प्रदूषण के अलावा काम के दौरान जहरीले पदार्थों, जैसे कि एस्बेस्टस के संपर्क में आने जैसे कारण शामिल थे. इनके अलावा सूची में ये चीजें भी थीं: हाई बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), कम शारीरिक गतिविधि, बिना धुएं वाला तंबाकू और सुपारी, ब्रेस्टफीडिंग के कुछ खास तरीके, और अल्ट्रावायलेट रेडिएशन (यूवीआर).

पहली बार बदलाव योग्य जोखिम कारकों (एमआरएफ) से जुड़े अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने संक्रामक एजेंटों को भी शामिल किया है, जैसे कि हेपेटाइटिस बी और ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी).

कुछ इलाकों में रोके जा सकने वाले, एचपीवी से जुड़े कैंसर के मामले ‘अभी भी ज्यादा' हैं

दुनिया भर में महिलाओं में रोके जा सकने वाले कैंसर में सबसे बड़ा हिस्सा एचपीवी से होने वाले कैंसर का है. यह तब है जब हमारे पास बेहद प्रभावी एचपीवी वैक्सीन मौजूद है, जो सर्वाइकल कैंसर से बचाने में काफी हद तक सक्षम है. लेकिन जैसा कि डॉ. इल्बावी ने डीडब्ल्यू के सवालों के जवाब में कहा, "वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट एक कड़वी सच्चाई है.”

सोर्जियोमाताराम ने कहा, "ज्यादा आय वाले देशों में सर्वाइकल कैंसर लगभग खत्म हो गया है. ऑस्ट्रेलिया उनमें से एक है. यहां फिलहाल एक लाख में से 5 लोगों में कैंसर का यह मामला देखने को मिलता है.”

उन्होंने आगे कहा, "लेकिन जब हम लैटिन अमेरिका और उप-सहारा अफ्रीका की बात करते हैं, तो वहां यह समस्या अब भी बनी हुई है. एचपीवी से जुड़ा कैंसर, खासकर सर्वाइकल कैंसर के मामले अब भी वहां बहुत ज्यादा देखने को मिलते हैं.”

एआई बताएगा सेहत से जुड़े जोखिम, नींद के पैटर्न से होगी जांच

उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिका में, ग्लोबल कैंसर ऑब्ज़र्वेटरी ने 2022 में सर्वाइकल कैंसर के 63,000 से ज्यादा मामले और सर्वाइकल कैंसर की वजह से 30,000 से ज्यादा मौतें दर्ज कीं. यह सबसे हाल का डेटा है.

ब्राजील के साओ पाउलो में एसी कारमार्गो कैंसर सेंटर की एक जानी-मानी कैंसर एपिडेमियोलॉजिस्ट मारिया पाउला कुराडो ने डीडब्ल्यू को बताया कि लैटिन अमेरिका में सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौतों की दर बहुत अधिक है. इसका मुख्य कारण यह है कि वहां की महिलाओं को एचपीवी टीकाकरण और शुरुआती इलाज के जरिए रोकथाम की सुविधा कम मिलती है.

कुराडो ने बताया, "सर्वाइकल कैंसर कितना खतरनाक हो सकता है, इस बारे में जानकारी की कमी के कारण भी कुछ लोग वैक्सीन लगवाने में हिचकिचाते हैं.” कुराडो डब्ल्यूएचओ/आईएआरसी के अध्ययन में शामिल नहीं थीं और उन्होंने ईमेल के जरिए यह टिप्पणी की.

वह आगे बताती हैं, "लेकिन दक्षिणी ब्राजील के कुछ इलाकों में, कुछ परिवारों को लगता है कि अगर उन्हें एचपीवी वैक्सीन लग जाती है, तो वे जल्दी सेक्सुअल एक्टिविटी शुरू कर सकते हैं. जबकि, कुछ लोगों को वैक्सीन लगाना पसंद नहीं है.”

मारिया पाउला कुराडो के अनुसार, ब्राजील के कुछ क्षेत्रों में वर्तमान टीकाकरण दर 67 फीसदी के करीब है. हालांकि, यह स्थिति अब बदल रही है क्योंकि इस वैक्सीन को हाल ही में व्यापक रूप से अपनाया गया है. उन्होंने जोर देकर कहा कि कैंसर को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए टीकाकरण की यह दर कम से कम 80 फीसदी होनी चाहिए.

महिलाओं और पुरुषों में रोके जा सकने वाले कैंसर के बारे में नई जानकारी

संक्रमण फैलाने वाले कारकों, जैसे कि वायरस को इस रिसर्च में शामिल करने से महिलाओं में होने वाले कैंसर के बारे में कई नई बातें पता चली हैं. साथ ही, यह भी साफ हुआ है कि महिलाओं और पुरुषों के मामले में कैंसर के खतरे कितने अलग होते हैं. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस नई जानकारी से कैंसर से बचाव के तरीकों को और बेहतर बनाया जा सकेगा.

अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं में रोके जा सकने वाले कैंसर का सबसे बड़ा कारण संक्रमण है, जिसकी वजह से कुल 27 लाख मामले (29.7 फीसदी) सामने आए. इसके विपरीत, पुरुषों में सबसे बड़ा कारण तंबाकू और धूम्रपान जैसी आदतें रहीं, जो कुल 43 लाख मामलों (45.4 फीसदी) के लिए जिम्मेदार थीं.

ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को पांच साल पहले पकड़ने वाला नया एआई मॉडल

अगर हम फेफड़ों के कैंसर के आंकड़ों को गहराई से समझें, जो कि ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल और प्रोस्टेट कैंसर के बाद सबसे ज्यादा होने वाली बीमारी है, तो एक दिलचस्प बात सामने आती है. पुरुषों और महिलाओं दोनों में इसके मुख्य कारण लगभग एक जैसे ही हैं, लेकिन उनका असर दोनों पर अलग-अलग तरह से होता है. दोनों में, तंबाकू, वायु प्रदूषण और काम के दौरान धुएं के संपर्क में आने की स्थिति को लगभग बराबर मात्रा में फेफड़ों के कैंसर के मामलों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. हालांकि, जहां पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर के 13,26,453 मामले थे. वहीं, महिलाओं में यह संख्या काफी कम 4,77,869 थी.

रोके जा सकने वाले कैंसर के लिए सही समय पर कदम उठाने की जरूरत

ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी का अनुमान है कि साल 2045 तक कैंसर के मामलों में 50 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है. शोधकर्ताओं ने अपने पेपर में लिखा है कि कैंसर का यह बढ़ता बोझ हमें चेतावनी दे रहा है कि अब बचाव की रणनीतियों पर तुरंत काम करना जरूरी है. उनका कहना है कि अगर हम सही समय पर और सही तरीके से कदम उठाएं, तो इनमें से बहुत से मामलों को रोका जा सकता है.

इस अध्ययन में कैंसर के उन 62.2 फीसदी मामलों के बारे में बहुत कम जानकारी दी गई है, जिन्हें रोके जा सकने वाले जोखिमों (एमआरएफ) की श्रेणी में नहीं रखा जा सका.

कुराडो ने कहा, "हमारी आबादी बूढ़ी हो रही है. इस वजह से अब ऐसे दुर्लभ कैंसर सामने आ रहे हैं जिनके न तो जांच के कोई मानक तय हैं, न ही इलाज के. साथ ही, इनके खतरे की वजहें भी अभी तक अनजान हैं.”

भारत में धूम्रपान नहीं करने वाले भी लंग कैंसर की चपेट में

सुजेट डेलालोज, फ्रेंच रिसर्च हॉस्पिटल ‘गुस्ताव रूसी' में ब्रेस्ट कैंसर और कैंसर रोकथाम की स्पेशलिस्ट के साथ-साथ यूरोपियन सोसाइटी फॉर मेडिकल ऑन्कोलॉजी की बोर्ड मेंबर हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि यह अध्ययन कैंसर की रोकथाम के लिए एक डेटा-आधारित वैश्विक दृष्टिकोण तैयार करने में मील का पत्थर साबित होगा. उन्होंने इसे एक ऐसा महत्वपूर्ण योगदान बताया जो भविष्य में कैंसर से लड़ने की नीतियों को दिशा देने का काम करेगा.

डेलालोज इस अध्ययन में शामिल नहीं थीं. उन्होंने कहा, "भले ही इस अध्ययन से पता चलता है कि कैंसर काफी हद तक हमारे इलाके, समाज, गरीबी-अमीरी और संस्कृति पर निर्भर करता है, लेकिन फिर भी व्यक्तिगत स्तर पर उठाए गए कदम इसके गंभीर असर को कम करने के लिए बहुत जरूरी हैं.”

शोधकर्ताओं ने खुद कहा कि भविष्य में कैंसर से बचाव के उपायों में महिलाओं और पुरुषों पर होने वाले अलग-अलग असर पर ध्यान देना होगा. साथ ही, देशों और इलाकों में अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक स्थितियों के हिसाब से भी कदम उठाने होंगे.”

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