न उत्तर कोरिया, ना रूस; हंगरी में ओरबान की जीत की रेसिपी अलग है
हंगरी के पीएम विक्टर ओरबान ने एक 'जादुई चाबी' के सहारे ऐसा सिस्टम बनाया है, जहां विपक्ष की राह बड़ी मुश्किल है.
हंगरी के पीएम विक्टर ओरबान ने एक 'जादुई चाबी' के सहारे ऐसा सिस्टम बनाया है, जहां विपक्ष की राह बड़ी मुश्किल है. यह सिस्टम है तो कानूनी, बस परेशानी यह है कि कानून की वह किताब ओरबान लिख रहे हैं. क्या है ओरबान की रिसेपी?साल 2012 में आई 'दी डिक्टेटर' फिल्म में जनरल अलादीन अपना एक ओलंपिक (वाडिया गेम्स) करवाता है और खुद 14 गोल्ड मेडल 'जीतता' है. फिल्म में एक दृश्य है, जहां अलादीन 100 मीटर की रेस दौड़ने निकला है. रेस शुरू नहीं हुई, सारे धावक शुरुआती पंक्ति पर खड़े हैं और इससे पहले कि अनाउंसर 'गेट सेट गो' पूरा बोल पाए, अलादीन ट्रैक पर दौड़ना शुरू कर देता है. बाकी खिलाड़ी तब दौड़ना शुरू करते हैं, जब कुछ दूर बढ़ आया अलादीन जेब से पिस्तौल निकालकर हवा में गोली दागता है.
हंगरी में ओरबान की हार और विपक्ष की जीत काफी नहीं, असल जीत दो-तिहाई बहुमत में
फिर अलादीन पीछे मुड़ता है, ट्रैक पर कुछ पास आए एक खिलाड़ी के पैर में गोली मारता है. रेसिंग ट्रैक के किनारे खड़े निगरानी करने वाले को गोली मारता है. बाकी धावकों को पिस्तौल दिखाकर डराता है. फिर, फिनिशिंग मार्क पर रिबन लेकर खड़े लोग खुद ही दौड़कर फिनिशिंग मार्क अलादीन के पास ले आते हैं. इस तरह, विजेता अलादीन 'नया विश्व कीर्तिमान' बना डालता है.
ये तो फिल्म थी. असल में ना तो कहीं वाडिया है, ना उसका तानाशाह अलादीन. मगर इन कथानकों और किरदारों की प्रेरणा इसी दुनिया में मौजूद है. मसलन, हंगरी में विक्टर ओरबान की सत्ता. ओरबान के हंगरी में चुनाव, अपने स्वभाव में जनरल अलादीन की उस रेस से मेल खाता है. कहने को सब संवैधानिक, सब कानूनी है, लेकिन असलियत में है इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी.
खुलेआम पक्षपाती तंत्र से ओरबान को अनुचित फायदा
अभी मार्च में उत्तर कोरिया से खबर आई कि किम जोंग उन 99.93 प्रतिशत मतों के साथ फिर से 'सुप्रीम पीपल्स असेंबली' जीत गए हैं. सोशल मीडिया पर मीम्स चले कि चलो, कम-से-कम 0.07 प्रतिशत असहमति की तो गुंजाइश बची हुई है देश में.
ओरबान का हंगरी उत्तर कोरिया नहीं है. ना ही व्लादिमीर पुतिन का रूस है, जिसपर इल्जाम है कि सत्ता को गंभीर चुनौती देने में सक्षम आलोचकों और विरोधियों को चुनावी प्रक्रिया में जगह नहीं मिलती. उनकी जगह कठपुतली उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं, ताकि स्वतंत्र चुनाव का आभास होता रहे. हंगरी में समय से चुनाव होते हैं, विपक्षी दल और नेता चुनाव भी लड़ते हैं. बस, दिक्कत यह है कि उन्हें 'लेवल प्लेइंग फील्ड' नहीं मिलता.
साल 2010 में जिस चुनाव के साथ ओरबान की सत्ता में वापसी हुई, उसे जानकार हंगरी का आखिरी 'आजाद और निष्पक्ष' मतदान मानते हैं. इलेक्शन में जीतकर ओरबान के हाथ एक जादुई चाबी लगी: दो-तिहाई बहुमत. इस प्रचंड बहुमत की मदद से ओरबान संवैधानिक संशोधन कर सकते थे. उन्हें इतनी ताकत मिल गई कि एक साल बीतते-बीतते वह नया संविधान ले आए.
ओरबान को जिताने में जुटे ट्रंप, हंगरी चुनाव में अमेरिका की इतनी दिलचस्पी क्यों?
चुनावी सुधार के नाम पर नया इलेक्टोरल कानून भी लाया गया. और बस यहीं से खेल के नियम बदलते गए. हंगरी की संसद में बस एक सदन है, नेशनल असेंबली. हर चार साल पर इसी के लिए संसदीय चुनाव होते हैं. इसमें पहले 386 सीटें हुआ करती थीं. ओरबान के लाए नए संविधान ने इसे घटाकर 199 कर दिया. चुनाव में दो तरह से सीटें भरी जाती हैं. एक, सिंगल मेंबर कॉन्स्टिट्यूएंसी के जरिए और दूसरा, पार्टियों की आनुपातिक लिस्ट.
सिंगल मेंबर कॉन्स्टिट्यूएंसी मतलब, एक निर्वाचन क्षेत्र से एक उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचेगा. फिर किसके उम्मीदवारों का कैसा प्रदर्शन रहा, उसके आनुपातिक आधार पर पार्टी लिस्ट में सीटें तय होंगी. कथित चुनावी सुधारों में सिंगल मेंबर कॉन्स्टिट्यूएंसी की हिस्सेदारी बढ़ा दी गई. कुल 199 सीटों में 106 निर्वाचित और 93 पार्टियों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व के हिसाब से तय होती हैं.
क्या है जेरीमैन्ड्रिंग, जो चुनावी बढ़त लेने में ओरबान की मदद करता है
परिसीमन भी हुआ, जिसकी प्रक्रिया निहायत अपारदर्शी थी. हंगरी में जिस तरीके से निर्वाचन क्षेत्र का आकार तय हुआ, उसके लिए एक खास शब्द प्रचलित है: जेरीमैन्ड्रिंग. इसका मतलब होता है निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं में जानबूझकर ऐसा फेरबदल करना कि एक राजनीतिक पार्टी (आमतौर पर सत्तारूढ़) या समूह को प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले अनुचित फायदा या बढ़त मिल जाए. 2011 में ओरबान जो 'CCIII/2011' कानून लाए, उसमें ऐसे निर्वाचन क्षेत्र बनाए जिनके आकार में बहुत अंतर था.
जिन इलाकों में विपक्षी धड़े के लिए मजबूत समर्थन था, उनका आकार बड़ा था. वहीं, फिडेस के समर्थन वाले इलाकों में आकार छोटा था. यानी, एक सीट पाने के लिए विपक्षी उम्मीदवार/पार्टी को ज्यादा वोट चाहिए. और ज्यादा वोट पाकर भी, उनकी सीटें कम होंगी. वहीं, सत्तारूढ़ पार्टी का कम वोट पाकर भी काम चलेगा और सीट मिल जाएगी. ये परिसीमन एक बार सीमित नहीं रहा. ओरबान के दो-तिहाई बहुमत के साथ निर्वाचन क्षेत्रों के आकार में अंतर बढ़ता गया.
सरकार नियंत्रित मीडिया का क्या असर?
हर चुनाव से पहले ओरबान खासकर अपने समर्थक वर्ग को खूब प्रलोभन और चुनावी तोहफे भी देते हैं. मीडिया पर सरकार का कड़ा नियंत्रण है, जो सुनिश्चित करती है कि विपक्ष को कोई एयरटाइम ना मिले. एक बड़ी आबादी ऐसी है, जो चुनाव और चुनावी विषयों पर मीडिया के माध्यम से बस वही जान पाती है जो सत्तारूढ़ पार्टी उन्हें बताना चाहती हैं. खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में.
इन इलाकों में ओरबान को खासा समर्थन भी मिलता है. सरकार नियंत्रित मीडिया बस सरकार का ही संदेश वोटरों तक पहुंचाता है. विपक्षी नेताओं के बयानों को तोड़-मरोड़कर दिखाना और उनके खिलाफ दुष्प्रचार करना भी इसका एक काम है.
ओएससीई ऑफिस फॉर डेमोक्रैटिक इंस्टिट्यूशंस एंड ह्युमन राइट्स (ओडीआईएचआर) निष्पक्ष लोकतांत्रिक तरीकों को बढ़ावा देने वाला एक प्रतिष्ठित संगठन है. यह यूरोप में चुनावों की निगरानी करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इलेक्शन आजाद और निष्पक्ष तरीके से हो रहे हैं. साल 2022 के हंगरी चुनाव की निगरानी के लिए इसने जो टीम भेजी, उसने माना कि देश में निष्पक्ष चुनाव नहीं हुआ.
रिपोर्ट में लिखा गया, "सिंगल मैनडेट निवार्चन क्षेत्रों में मतों का वितरण, वोटों की समानता के सिद्धांत को अहम चुनौती देता है." वोटों की समानता का सिद्धांत कहता है कि एक मतदाता के पास एक मत का अधिकार है, और हर वोटर के वोट का मोल एक बराबर है.
रिपोर्ट में यह ध्यान भी दिलाया गया कि कानून के उलट, संसद ने निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में जरूरी संशोधन नहीं किया, ताकि ऐसी कॉन्स्टिट्यूएंसियां जहां जनसंख्या और आकार वगैरह के मामले में तय सीमा से भी ज्यादा अंतर है उसे पाटा जा सके. यानी वही बात, अपने समर्थन वाले इलाकों में ओरबान की पार्टी कम वोट पाकर जीत जाएगी और विपक्ष को अपने इलाकों में ज्यादा वोट चाहिए होंगे. इन वोटों से पार्टी लिस्ट में भी वोट बढ़ेगा और नतीजा, वही खिलाड़ी जीतता रहेगा.
"कैसे जीत जाते हैं विक्टर ओरबान"
किम लेन शेपाला, प्रिंसटन यूनवर्सिटी में समाजशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय मामलों की प्रोफेसर हैं. हंगरी के संवैधानिक कानूनों पर उनका लंबा काम रहा है. साल 2022 में उन्होंने 'जर्नल ऑफ डेमोक्रैसी' में एक विस्तृत लेख लिखा: कैसे जीतते हैं विक्टर ओरबान?इसमें वह बताती हैं कि पार्टी लिस्ट के वोटों की गिनती में बड़ी खामी है. 2014 के चुनाव से पहले यह होता था कि निर्वाचन क्षेत्रों में हारने वाले उम्मीदवारों को जो वोट मिले, उन्हें पार्टी लिस्ट के वोटों में जोड़ दिया जाता था.
ताकि, संसदीय सीटों के बंटवारे में एक खास पार्टी को फायदा हो. मसलन, एक निर्वाचन क्षेत्र में X पार्टी के उम्मीदवार को 400 वोट और Y पार्टी के प्रत्याशी को 200 मत मिले. यहां 'लॉस्ट' या गुम गए वोटों की संख्या होगी 200, जो कि Y पार्टी के हारने वाले उम्मीदवार को मिले थे. इन वोटों को पार्टी लिस्ट में उस उम्मीदवार के दल को दे दिया जाता था. इसे 'पराजित को दी गई सांत्वना' (लूजर कंपनसेशन) भी कहा जाता है.
ओरबान ने इस सिस्टम में भी बदलाव किया और हारने वाले के साथ विजेता उम्मीदवार के भी वोट उसकी पार्टी को स्थांतरित करने की व्यवस्था बना दी गई. इसमें यह होता है कि एक निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को जितने न्यूनतम वोट चाहिए उसके अलावा जो वोट बचते हैं उन्हें सरप्लस माना जाता है. फिर चाहे वो वोट विजेता उम्मीदवार के खाते के क्यों ना हो.
यानी पहले दिए गए X और Y के उदाहरण से समझें, तो Y पार्टी के हारे हुए प्रत्याशी को मिले 200 वोट उसकी पार्टी लिस्ट में जोड़ दिए जाएंगे. साथ-ही-साथ, यह भी माना जाएगा कि 400 वोट पाने वाले X को तो जीतने के लिए Y से केवल एक ही ज्यादा यानी 201 वोट चाहिए थे. मतलब उसके पास 199 वोट ज्यादा हैं. इन 'अतिरिक्त' वोटों को एक्स की पार्टी के सरप्लस वोट में डाल दिया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, विजेता को दी जाने वाली यह अभूतपूर्व सांत्वना चुनावी व्यवस्था को और असंगत बनाकर फिडेस जैसी बड़ी पार्टियों की मदद करती है.
प्लूरैलिटी वोट लाने से भी हुआ फायदा
चुनावी नियमों में एक और बदलाव हंगरी के लिए अहम साबित हुआ. मतदान के बाद विजेता चुनने के दो प्रचलित तरीके हैं. 'फर्स्ट पास्ट दी वोट' (या, प्लूरैलिटी वोट) में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत जाता है. भले ही जितने वैध वोट डाले गए, उनका आधा हिस्सा भी उसे ना मिला हो. और विपक्षी उम्मीदवारों को मिले वोट मिलाकर उसे मिले मतों से ज्यादा होते हों.
मान लेते हैं कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में तीन उम्मीदवार खड़े हुए और वोट डले कुल 100. एक प्रत्याशी को मिले 45 वोट, दूसरे को 35 और तीसरे को 20. चूंकि प्लूरैलिटी में सबसे ज्यादा वोट पाना काफी है, तो 45 वोटों के साथ पहला प्रत्याशी जीत गया. जबकि, उसे तो उस निर्वाचन क्षेत्र के न्यूनतम 50 फीसदी लोगों ने भी नहीं चुना. वहीं, हारे हुए दोनों उम्मीदवारों को मिलाकर 100 में 55 वोट हार गए. हालांकि, प्लूरैलिटी वोट बहुधा प्रयुक्त व्यवस्था है.
दूसरा तरीका है, मेजॉरिटी वोट. इसमें दरकार होती है कि विजेता उम्मीदवार, कुल वोटों का 50 फीसदी से ज्यादा हासिल करे. मान लीजिए अगर कुल मत डले 200, तो जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को कम-से-कम 101 वोट चाहिए. अगर किसी को भी न्यूनतम इतने वोट ना मिले, तो टॉप दो प्रत्याशियों में फिर से रनऑफ मुकाबला होगा और विजेता चुना जाएगा.
हंगरी में साल 2011 से पहले की व्यवस्था में 'मेजॉरिटी वोट' के तहत दो चरण के मतदान की गुंजाइश थी. रनऑफ हटाने पर जीतना अपेक्षाकृत आसान हो गया. दूसरे राउंड को खत्म करने का एक बड़ा कारगर असर ओरबान को मिलने वाली चुनौती पर हुआ. विशेषज्ञों के मुताबिक, इस व्यवस्था में चुनाव से पहले विपक्षी दलों के साथ मिलकर साझा उम्मीदवार उतारने की सूरत में ओरबान को गंभीर चुनौती मिल सकती थी. उनके अलग-अलग लड़ने पर नहीं. इसीलिए अब तक के चुनावों में कई पार्टियों के साथ मिलकर एक गठबंधन में आने से भी विपक्ष को फायदा नहीं पहुंचा है. इसके अलावा छोटी पार्टियों को मदद, नई पार्टी बनाने पर आर्थिक प्रोत्साहन देने जैसी व्यवस्था भी अपना असर दिखाती रही है.
जैसा कि किम लेन शेपाला अपनी रिपोर्ट में ध्यान दिलाती हैं कि ओरबान की नई चुनावी व्यवस्था में विपक्षी दलों का संगठित होना मुश्किल है. मसलन, 2013 के इलेक्शन कानून में राष्ट्रीय पार्टी लिस्ट में नाम देने के लिए जरूरी है कि इच्छुक दलों को 'इंडिविजुअल कॉन्स्टिट्यूएंसी' में एक न्यूनतम निर्धारित संख्या में उम्मीदवार उतारने होंगे. संसद की 106 सीटें सिंगल मेंबर कॉन्स्टिट्यूएंसी से आती हैं और 93 पार्टी लिस्ट से. तो अगर छोटे दल अपनी अलग पार्टी लिस्ट चाहें, तो उन्हें दूसरी श्रेणी में एक-दूसरे से मुकाबला करना होगा. वोट बटेंगे और दूसरी तरफ, 'फर्स्ट पास्ट दी वोट' की व्यवस्था में ओरबान के उम्मीदवारों को फायदा होगा.
ओरबान का डिजाइनर चुनावी तंत्र, कई और नई-नई युक्तियों से उनकी फिडेस पार्टी को फायदा पहुंचाता है. यही वजह है कि हंगरी के चुनाव स्वतंत्र माने जाते हैं, लेकिन निष्पक्ष नहीं. यही स्वछंद व्यवस्था चुनाव-दर-चुनाव ना केवल ओरबान को जीत दिलाती आई है, बल्कि अपारदर्शी तरीके से बार-बार फेरबदल करने की सहूलियत के सहारे 2010 से अब तक के कार्यकाल के बहुतायत हिस्से में वह दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा भी हासिल करते आए हैं.