बांग्लादेश में चुनाव से पहले पुराने राजनीतिक गठबंधन टूट रहे हैं और संवैधानिक बहस तेज हो रही हैं. इसके साथ ही वहां इस्लामी दलों का ऐसा गठबंधन सामने आया है, जो चुनावी तस्वीर को पूरी तरह बदल सकता है.बांग्लादेश में 12 फरवरी को मतदान होने हैं. यह हाल के इतिहास में हुए किसी भी चुनाव से अलग है. लंबे समय से दबदबा रखने वाली अवामी लीग (एएल) को चुनाव में हिस्सा लेने से रोक दिया गया है. इसलिए छात्रों के नेतृत्व वाली नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के सहयोग से मजबूत हुआ एक इस्लामिक गठबंधन प्रबल दावेदार के तौर पर उभरा है.
1971 में आजादी के बाद पहली बार, इस्लामिक ताकतें अपने सबसे मजबूत चुनावी प्रदर्शन के लिए तैयार दिख रही हैं. इससे मुस्लिम-बहुल बांग्लादेश के राजनीतिक भविष्य को लेकर उम्मीदें बदल रही हैं.
यह नाटकीय बदलाव जुलाई 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद हुआ है. उस विद्रोह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के लंबे और सख्त शासन का अंत कर दिया. अब अवामी लीग के वरिष्ठ नेताओं को विरोध-प्रदर्शनों के दौरान सैकड़ों पर हुई मौतों के मामले में मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है.
नवंबर में, बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने शेख हसीना को न्याय में बाधा डालने, हत्याओं का आदेश देने और दंडात्मक हिंसा को रोकने में विफल रहने का दोषी ठहराया. हसीना वर्तमान में भारत में निर्वासन की जिंदगी जी रही हैं. मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. ऐसे में देश के इतिहास में पहली बार होगा कि मतपत्र से पार्टी का प्रतिष्ठित चुनाव चिह्न 'नाव' नदारद रहेगा.
उभार पर इस्लामिक गठबंधन
राजनीति में आए इस खालीपन के बीच, जमात-ए-इस्लामी (जेआई) ने अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश शुरू कर दी है. 1971 की आजादी के युद्ध का विरोध करने की वजह से यह पार्टी लंबे समय तक हाशिए पर रही, लेकिन अब यह तमाम इस्लामी वोटों को एक साथ लाने में जुट गई है. हालांकि, एक अहम सहयोगी 'इस्लामी आंदोलन' ने सीटों के बंटवारे पर हुए विवाद के कारण आखिरी समय पर हाथ खींच लिए, फिर भी जमात के नेतृत्व में अब 11 पार्टियां एक साथ आ गई हैं.
इस्लामी पार्टियों के लिए चुनाव जीतना हमेशा एक बड़ी चुनौती रहा है, लेकिन हालिया सर्वे एक अप्रत्याशित और कांटे की टक्कर का इशारा कर रहे हैं. 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी' के मुताबिक, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी 'बीएनपी' के नेतृत्व वाला गठबंधन 44.1 फीसदी के साथ मामूली बढ़त पर है, जबकि जमात का गुट 43.9 फीसदी के साथ उसे कड़ी टक्कर दे रहा है. हालांकि, कई अन्य सर्वे में बीएनपी को सीटों के मामले में काफी आगे बताया जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषक अल्ताफ परवेज का मानना है कि देश की राजनीति 'सेंटर-लेफ्ट' से खिसककर 'सेंटर-राइट' की ओर चली गई है या शायद उससे भी आगे. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "लोगों ने यह मान लिया है कि चुनाव चाहे कोई भी जीते, अब से उन्हें एक ऐसे बांग्लादेश में रहना होगा जिसका झुकाव दक्षिणपंथ की तरफ होगा."
बीएनपी ने कभी अवामी लीग का मुकाबला करने के लिए जमात से हाथ मिलाया था, अब वह खुद उसी इस्लामी गठबंधन के खिलाफ चुनावी मैदान में है. दोनों के बीच यह मुकाबला खासकर उन करोड़ों युवा वोटरों को लुभाने के लिए है, जो 2024 के विद्रोह के बाद राजनीति में काफी सक्रिय हो गए हैं.
जो वोटर असमंजस की स्थिति में हैं उन्हें अंतिम समय में अपने पक्ष में गोलबंद करने के लिए बीएनपी के नेताओं ने जमात-ए-इस्लामी को 'आजादी विरोधी' साबित करने की कोशिशें तेज कर दी हैं. वे बार-बार लोगों को 1971 के युद्ध की याद दिला रहे हैं, जब जमात ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था.
एनसीपी का अप्रत्याशित गठबंधन और अंदरूनी फूट
इस चुनाव में सबसे ज्यादा हैरानी एनसीपी की रणनीति को देखकरहो रही है. यह पार्टी 2024 के छात्रों के नेतृत्व वाले विद्रोह की मुख्य ताकत थी. एक साल पहले तक, एनसीपी के नेता इस बात पर अड़े थे कि उनकी पार्टी बिना किसी गठबंधन के पूरे देश में अकेले चुनाव लड़ेगी.
फरवरी 2025 में, एनसीपी के संयोजक नाहिद इस्लाम ने एक भारतीय मीडिया चैनल से कहा, "मतदाता जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व पर भरोसा नहीं करेंगे." लेकिन आज हालात बदल चुके हैं और उनकी अपनी पार्टी उसी जमात के साथ गठबंधन में है. उस वक्त उन्होंने कहा था, "लोग जमात की पुरानी गलतियों को याद करते हैं." उन्होंने तर्क दिया था कि इस्लामी राजनीति का "बांग्लादेश में कोई भविष्य नहीं है." हालांकि, एक साल से भी कम समय बाद जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने के पार्टी के फैसले ने उसके समर्थकों को चौंका दिया.
जनवरी 2026 में डीडब्ल्यू को दिए एक इंटरव्यू में नाहिद इस्लाम ने जोर देकर कहा कि इस्लामी पार्टियों के साथ उनका गठबंधन "वैचारिक नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से चुनावी" है. उन्होंने कहा कि एनसीपी के लिए मात्र एक साल के भीतर पूरे देश में अपनी मजबूत पकड़ बना पाना अवास्तविक साबित हुआ.
नाहिद के मुताबिक, यह गठबंधन "चुनाव के बाद होने वाले सुधारों पर असर डालने का एक मौका" है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सुधारों और भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दों पर जमात-ए-इस्लामी, बीएनपी के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर और उनके करीब नजर आती है. हालांकि, इस वैचारिक बदलाव ने एनसीपी के भीतर गहरे मतभेद पैदा कर दिए हैं. कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ने की धमकी दी है, तो कुछ ने खुलेआम इस गठबंधन का विरोध शुरू कर दिया है.
उन्हीं में से एक, वरिष्ठ संयुक्त संयोजक सामन्था शर्मिन ने डीडब्ल्यू को बताया कि बहुत से मतदाता एनसीपी को पारंपरिक राजनीति के विकल्प के रूप में देखते थे. लेकिन अब वे इस बात को लेकर आशंकित हैं और सवाल पूछ रहे हैं कि क्या उन्हें अब भी इस पार्टी को वोट देना चाहिए. शर्मिन ने आगे कहा कि वह जमात को भरोसेमंद सहयोगी नहीं मानती. उन्होंने 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान को समर्थन करने के उसके इतिहास का जिक्र किया.
धर्मनिरपेक्षता को लेकर फिर से छिड़ी बहस
इस चुनाव ने बांग्लादेश की संवैधानिक पहचान पर लंबे समय से चल रही बहस को भी फिर से शुरू कर दिया है. 1972 में लिखे गए देश के पहले संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को एक मौलिक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया था. बाद में सैन्य शासकों ने इसका स्वरूप बदल दिया. सबसे पहले, 1979 में बीएनपी के संस्थापक जियाउर्रहमान के शासनकाल में, प्रस्तावना में "बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम" जोड़ा गया और फिर 1988 में, तत्कालीन राष्ट्रपति हुसैन मोहम्मद इरशाद ने इस्लाम को राजकीय धर्म घोषित कर दिया.
2024 के विद्रोह के बाद, सबसे पहले पूरे संविधान को दोबारा लिखने की मांग हुई थी, लेकिन बाद में केवल कुछ सीमित सुधारों पर सहमति बनी. संवैधानिक सुधार आयोग ने सिफारिश की है कि इस्लाम को देश का 'राजकीय धर्म' बनाए रखा जाए, लेकिन 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द को संविधान से हटा दिया जाए.
कतर के सरकारी मीडिया संस्थान अल जजीरा को दिए एक इंटरव्यू में, बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता बांग्लादेश के लिए सही नहीं था, "क्योंकि यहां की बड़ी आबादी मुस्लिम है. अगर हम उनके अधिकारों को सुनिश्चित कर सकें, तो फिर कोई समस्या नहीं है."
वहीं दूसरी ओर, भले ही अवामी लीग लंबे समय तक धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने का दावा करती रही, लेकिन उसने कभी भी संविधान में इस्लाम को मिले विशेष दर्जे को खत्म नहीं किया. तनाव अब भी बरकरार है. प्रस्तावित संवैधानिक सुधारों में 'धर्मनिरपेक्षता' को हटाए जाने के विरोध में चार वामपंथी दलों ने पिछले साल जुलाई की एक महत्वपूर्ण बैठक का बहिष्कार किया था.
विद्रोह के मुख्य आयोजक और अंतरिम सरकार के पूर्व सलाहकार महफूज आलम ने डीडब्ल्यू को बताया, "धर्मनिरपेक्षों और इस्लामवादियों के बीच के मतभेद अब खुले टकराव में बदल चुके हैं और अब बातचीत के लिए कोई जगह नहीं बची है. कोई भी देश इस तरह नहीं चल सकता."
राजनीतिक विश्लेषक परवेज ने चेतावनी दी है कि अल्पसंख्यक, चाहे वे धार्मिक हों, लैंगिक हों या वैचारिक, वे अब और भी ज्यादा हाशिए पर जा सकते हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि अगली संसद को अमीरों का क्लब बन जाने का खतरा है. इसमें मजदूरों, किसानों, महिलाओं या अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व बहुत कम या बिल्कुल नहीं होगा.
महिलाओं का प्रतिनिधित्व ऐतिहासिक रूप से सबसे कम
1991 के बाद से, बांग्लादेश का नेतृत्व लगभग तीन दशकों तक महिला प्रधानमंत्रियों ने किया. इनमें बीएनपी की पूर्व अध्यक्ष खालिदा जिया और शेख हसीना शामिल रहीं. लेकिन आने वाला चुनाव दशकों में पहली बार ऐसा होगा, जहां किसी भी मुख्य दल की कमान किसी महिला के हाथ में नहीं है.
हसीना 2024 से निर्वासित तौर पर भारत में रह रही हैं और दिसंबर 2025 में खालिदा जिया का निधन हो गया. इसके बाद से राजनीति में महिलाओं की मौजूदगी बहुत कम हो गई है. राजनीतिक दल संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए 'नेशनल कंसेंसस कमीशन' के साथ किसी समझौते पर पहुंचने में भी विफल रहे हैं.
हालांकि, सभी दलों ने 'जुलाई चार्टर' का समर्थन किया था, जिसमें 5 फीसदी सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारने का वादा किया गया था, लेकिन किसी ने भी इस लक्ष्य को पूरा नहीं किया. बीएनपी ने सिर्फ 3.5 फीसदी निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं को मैदान में उतारा है, जबकि जमात-ए-इस्लामी ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया.
राष्ट्रीय चुनावों के साथ-साथ संवैधानिक सुधार प्रस्तावों पर एक देशव्यापी जनमत संग्रह भी होने जा रहा है. इसमें मतदाताओं को सुधारों के पक्ष में 'हां' या विरोध में 'नहीं' का चुनाव करना होगा. जमात के महासचिव मिया गुलाम परवार ने कहा कि पार्टी के पास "इच्छुक या योग्य महिला उम्मीदवारों" की कमी थी. उन्होंने नीतिगत बहस और अनसुलझे मुद्दों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं को भविष्य के चुनावों में मौका दिया जाएगा.
जमात नेता शफीकुर रहमान के एक इंटरव्यू के बाद विवाद बढ़ गया. उन्होंने कहा कि कोई महिला पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकती क्योंकि "अल्लाह ने सबको अपनी अलग पहचान दी है. मर्दों और औरतों में कुछ फर्क होते हैं. अल्लाह ने जो बनाया है, हम उसे बदल नहीं सकते."
इससे नाराज 11 महिला संगठनों ने जमात पर औरतों से नफरत करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई. डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पार्टी की मोशेरेफा मिशु ने कहा कि जमात को अपने लगातार महिला-विरोधी, पुरुष प्रधान और अपमानजनक बयानों को बंद करना चाहिए और सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए.
ढाका यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर समीना लुत्फा ने चेतावनी दी कि ऐसे बयानों पर ध्यान न देने से महिलाओं के खिलाफ लगातार अपमान आम बात हो जाएगी. हाल ही में अंतरिम सरकार के सलाहकार पद से इस्तीफा देने वाले महफूज आलम ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों पर इस्लामवादियों का रुख पूरी तरह उलझा हुआ है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "कोई कहता है कि महिलाएं नेतृत्व नहीं कर सकतीं, तो कोई कहता है कि वे कर सकती हैं. कोई कहता है कि महिलाएं सांसद तो बन सकती हैं लेकिन प्रधानमंत्री नहीं. ये विरोधाभास भविष्य में नीतियां लागू करने में बड़ी बाधा बन सकते हैं.”
भ्रष्टाचार रोकने को लेकर चुनौतियां
भ्रष्टाचार हमेशा से मतदाताओं के लिए एक बड़ा मुद्दा रहा है. यह इस बार के चुनावी प्रचार और भाषणों में सबसे ज्यादा छाया रहा. जमात ने बीएनपी पर राजनीतिक फायदे के लिए धर्म का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. वहीं, बीएनपी ने 2001 से 2006 की अपनी ही गठबंधन सरकार में जमात की भूमिका को याद दिलाया है. उस दौरान ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक में बांग्लादेश को लगातार पांच वर्षों तक दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश बताया गया था.
जमात अब खुद को उस भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड से अलग बताता है, जबकि हकीकत यह है कि उस सरकार में जमात के दो सदस्य मंत्री के रूप में शामिल थे. 2024 के विद्रोह के बाद बनी अंतरिम सरकार ने सुधार के लिए 11 आयोगों का गठन किया, जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी सुधार आयोग भी शामिल है. हालांकि, इसके अध्यक्ष और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश के कार्यकारी निदेशक इफ्तिखारुज्जमान ने डीडब्ल्यू को बताया कि ज्यादातर सिफारिशों को आखिरकार लागू नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि आयोग ने शुरुआत में सरकार को भ्रष्टाचार विरोधी आयोग की स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए मना लिया था, "लेकिन नौकरशाही के दबाव के बाद मुख्य सिफारिशों को हटा दिया गया."
हाल तक अंतरिम सरकार के सलाहकार रहने के बावजूद, महफूज आलम ने सुधारों को रोकने के लिए सरकार के भीतर मौजूद "पुराने लोगों" को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने अंतरिम प्रशासन के सुधार प्रयासों को 10 में से 4 से अधिक अंक नहीं दिए. अवामी लीग को सत्ता से हटाने में मदद करने वाले छात्र नेताओं को एक महीने के भीतर ही अंतरिम सरकार से बाहर कर दिया गया. आलम ने इसे एक "गुप्त षड्यंत्र" करार दिया. उन्होंने तर्क दिया कि नौकरशाहों और राजनीतिक रसूखदारों ने उस सुधार के एजेंडे को पटरी से उतार दिया, जिसका छात्र समर्थन कर रहे थे.
चुनाव करीब आने के साथ इस बात पर संदेह बना हुआ है कि क्या कोई भी पार्टी सुधारों को आगे बढ़ाएगी. इफ्तिखारुज्जमान ने चेतावनी दी कि इन सुधारों को लागू करना बहुत कठिन होगा. जबकि, आलम ने कहा कि वे अब भी इसे लेकर संदेह में हैं.












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