ईरान युद्ध से भारत‑चीन‑यूरोप पर तगड़ा असर, रूस को फायदा

ईरान युद्ध के चलते दुनिया के लिए ऊर्जा की आवाजाही का सबसे अहम रास्ता बंद हो गया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

ईरान युद्ध के चलते दुनिया के लिए ऊर्जा की आवाजाही का सबसे अहम रास्ता बंद हो गया है. चीन, यूरोप और भारत के सामने आपूर्ति की बड़ी चुनौती है. दुनिया में ऊर्जा की बढ़ी कीमतों का फायदा रूस उठा सकता है.ईरान के साथ अमेरिका-इस्राएल का युद्ध पूरी दुनिया पर भारी असर डाल रहा है. बाजार हिल गए हैं, ऊर्जा की आपूर्ति और कारोबार हर जगह प्रभावित हुआ है. तेल की कीमत चढ़ती जा रही है, जहाजों का मार्ग फंसा हुआ है, बाजार में उथल-पुथल है और ग्राहकों के लिए कीमतों का बढ़ना तय है. यूरोप एक तरफ ऊर्जा की कमी से डरा हुआ है, तो चीन सप्लाई चेन की स्थिरता को लेकर झुंझला रहा है.

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हमलों ने विस्तृत बाजार में तेज बिकवाली और उपभोक्ता कीमतों में भारी इजाफे की शुरुआत कर दी है. भूराजनीति से जुड़ी घटनाएं आमतौर पर तत्काल असर डालती हैं, लेकिन बाजार महीने भर में वापसी कर लेते हैं. हालांकि, होरमुज जैसे ऊर्जा आपूर्ति के रास्तों पर इस लड़ाई का असर होने से दुनिया में महंगाई बढ़ने का खतरा इस बार अभूतपूर्व है.

चीन के लिए चुनौती

ईरान युद्ध ने चीन के लिए बड़ी चुनौती पैदा की है. बीजिंग, तेहरान से ऊर्जा का बड़ा आयातक और उसका रणनीतिक साझीदार है. चीन दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक और ईरान से तेल का मुख्य खरीदार है.

पिछले साल ईरान में बिके तेल का 80 फीसदी से ज्यादा चीन ने खरीदा, औसतन 13.8 लाख बैरल प्रति दिन. यह चीन में तेल की कुल ऊर्जा सप्लाई का करीब 13 फीसदी है. ऐसे में ईरान युद्ध की वजह से सप्लाई में बाधा का उस पर सबसे बड़ा असर होगा.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के लिए पैसा रोकने की नीयत से लगाए गए पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने उसके तेल खरीदारों को सीमित कर दिया है. चीन, ईरान के जिस तेल को खरीदता है उसे भी कारोबारी मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों का लेबल लगाकर बेचते हैं. ये दोनों देश तेल की ढुलाई के बड़े हब हैं.

ईरान पर अमेरिकी हमले इस महीने डॉनल्ड ट्रंप की प्रस्तावित चीन यात्रा में देरी कर सकते हैं. बहुत से लोगों को उम्मीद है कि इस यात्रा का नतीजा टैरिफ पर किसी समझौते के रूप में सामने आ सकता है, जिससे वैश्विक कारोबार को कुछ राहत मिल सकती है. हालांकि अगर ईरान पर हमले चार हफ्तों तक जारी रहे, जिसका संकेत ट्रंप ने दिया है, तो फिर उनकी चीन यात्रा में देरी हो सकती है.

होरमुज जलडमरुमध्य का असर पूरे ग्लोब पर

ईरान की जंग ने दुनिया के सबसे अहम कारोबारी मार्ग को लाचार बना दिया है. होरमुज जलडमरुमध्य दुनियाभर में टैंकरों के जरिए तेल की ढुलाई का एक प्रमुख समुद्री मार्ग है. इसके जरिए खाड़ी के देशों से यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका तक तेल की ढुलाई होती है.

ओमान और ईरान के बीच मौजूद इस संकरे मार्ग से दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल गुजरता है. मलक्का के जलडमरुमध्य के बाद यह तेल की ढुलाई का सबसे बड़ा रास्ता है. ईरान युद्ध में इसके बाधित होने की वजह से तेल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है और व्यापक रूप से आर्थिक प्रभाव हुए हैं.

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क्रिस्टोफर रूल, क्रिस्टोल एनर्जी में वैश्विक सलाहकार हैं. होरमुज की भूमिका को रेखांकित करते हुए वह बताते हैं, "यहां करीब 1.9 करोड़ बैरल तेल की बात है, जो होरमुज से हर दिन गुजरता है, इसका केवल आठ या नौ फीसदी जमीन पर बिछी पाइपलाइनों के जरिए सऊदी अरब और यूएई से गुजरता है और जहाजों में नहीं ढोया जाता. सबसे बड़ा खतरा यह है कि इंश्योरेंस कंपनियां और जहाज मालिक होरमुज का इस्तेमाल करने से इनकार कर रहे हैं, या फिर यह माइन बन गई है और जहाजों को ध्वस्त कर इस पतले और छिछले रास्ते को बंद किया जा रहा है."

कुछ समय के लिए जहाजों की लेन को कसा जा रहा है और "युद्ध के जोखिम" के लिए बीमा को रद्द किया जा रहा है, या फिर उसकी फीस 50 फीसदी तक बढ़ाई जा रही है. माल ढुलाई करने वाली बड़ी कंपनियां तेल के जहाजों को चलाते रहने के लिए हाथ पांव मार रही हैं.

दिग्गज लॉजिस्टिक कंपनी मेअर्स्क ने सुरक्षा कारणों से स्वेज नहर और होरमुज डलडमरुमध्य से गुजरना बंद कर दिया है. वह जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर 'केप ऑफ गुड होप' की ओर से ले जा रहा है. इसकी वजह से यात्रा का मार्ग हजारों किलोमीटर बढ़ गया है और सफर बहुत महंगा है.

जर्मन शिपिंग कंपनी हापाग-लॉयड ने भी यही रास्ता अपनाया है.

दो करोड़ बैरल तेल और लिक्विड नेचुरल गैस की प्रतिदिन ढुलाई के साथ ही होरमुज दुनिया की करीब एक तिहाई रासायनिक खाद के कारोबार को भी संभालता है. दूसरे प्रमुख कच्चे सामानों में पेट्रोकेमिकल और सल्फर के साथ ही चूना पत्थर और सीमेंट जैसी निर्माण सामग्रियां भी हैं. होरमुज पर बहुत दामोमदार है. सऊदी अरब और यूएई के पाइपलाइन का विस्तार हो जाए, तो भी वह होरमुज से गुजरने वाली मात्रा के 30 से 40 फीसदी तक ही पहुंच पाएंगे.

रूस को होगा फायदा?

रूस ने ईरान पर हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का "उल्लंघन" बताकर इसकी निंदा की है. हालांकि, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ईरान युद्ध से जरूर खुश होंगे क्योंकि तेल और गैस के एक प्रमुख निर्यातक के रूप में रूस को इस युद्ध के कारण ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का फायदा मिलेगा.

यह युद्ध भारत और चीन को भारी छूट पर मिलने वाला रूसी तेल खरीदने के लिए विवश करेगा. अगर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रही, तो रूस को हर महीने 4.8 अरब डॉलर की कमाई होगी. यूक्रेन के साथ युद्ध में जुटे पुतिन को इसका बड़ा फायदा होगा.

तेल के ग्राहकों के लिए ईरान, रूस का प्रतिद्वंद्वी है. ऐसे में अगर ईरानी निर्यात में कोई बाधा आती है, तो रूस का बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा हो जाएगा. पुतिन को इसमें कोई संदेह नहीं कि यह युद्ध अमेरिकी संपत्तियों को उलझाए रखेगा और संसाधनों को यूक्रेन से हटाकर मध्यपूर्व ले जाएगा.

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भारत की स्थिति संवेदनशील

भारत, रूसी कच्चे तेल से दूर जा रहा था लेकिन अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण यह फिलहाल रुक सकता है. भारत को कच्चे तेल की सप्लाई का लगभग आधा हिस्सा होरमुज जलडमरुमध्य से होकर पहुंचता है. ऐसे में भारत में तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और उसे दोबारा रूस के पास जाना पड़ रहा है.

भारत के सामने सप्लाई चेन में बाधा की दिक्कतें भी हैं. उपभोक्ताओं में डर और खाड़ी के देशों से लाखों भारतीय प्रवासियों के जरिए भेजे जाने वाले पैसों की राह में बाधाएं हैं. यह भारत के मौजूदा घाटे और ईंधन की महंगाई को और बढ़ा सकता है. मध्यपूर्व के देशों के लिए भारत बासमती चावल का एक प्रमुख निर्यातक भी है, तो जाहिर है कि कारोबार पर असर होगा.

यूरोप के लिए एक और ऊर्जा संकट

यूरोप में ऊर्जा आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं पर इस तरह के समुद्री जाम का क्या असर होगा? जर्मनी समेत यूरोप ने भले ही रूसी गैस का विकल्प खोज लिया है, लेकिन अब लिक्विड नेचुरल गैस पर उसकी निर्भरता ने उसे मध्य एशिया के जाम के लिहाज से नाजुक बना रखा है. उदाहरण के लिए, कतर यूरोप के कुल एलनएनजी आयात का 15 फीसदी मुहैया कराता है. होरमुज कतर का अकेला मार्ग है इसलिए इसके पूरी तरह बंद होने पर यह पूरा हिस्सा बाजार से बाहर हो जाएगा.

यूरोप में गैस के भंडार का स्तर काफी नीचे है. इस महीने जर्मन गैस का भंडार उसकी क्षमता के महज 20 फीसदी के स्तर पर है. वसंत के मौसम में इसे भरा जाता है, लेकिन इसका स्तर ऐतिहासिक रूप से नीचे होने के कारण वह अतिरिक्त दबाव झेलने की हालत में नहीं है.

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कुछ विश्लेषक अनुमान लगा रहे हैं कि अगर बाधाएं बनी रहीं, तो यूरोपीय गैस की कीमतें 130 फीसदी तक बढ़ सकती हैं. अगर ऐसा हुआ, तो यह 2022 में यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद बाजार के लिए सबसे बड़ा झटका होगा. जैसा कि ऊर्जा विश्लेषक जेस राल्सटन बताते हैं, "जब यूक्रेन में युद्ध की बात हो तो हमने देखा कि कई महीनों तक गैस की ऊंची कीमतें बनी रहीं और उस संकट का हमारे बिलों पर बड़ा असर हुआ."

मौजूदा संदर्भ में वह आगाह करते हुए कहते हैं, "अगर यह संकट एक या दो दिन के लिए हुआ तो हमारे बिलों पर ज्यादा असर नहीं होगा. लेकिन, अगर यह लंबे समय तक टिका रहा तो हमारे ऊर्जा बिलों पर, पेट्रोल की कीमतों पर और महंगाई पर बड़ा असर डालेगा. यह अर्थव्यवस्था के सभी हिस्सों पर व्यापक असर डालेगा."

तेल की ऊंची कीमतें

होरमुज जलडमरुमध्य में तनाव का असर आम ग्राहकों तक कुछ दिनों या दो हफ्तों में पहुंच जाएगा. कच्चे तेल को ग्राहकों की टंकी तक पहुंचने में भले 30 से 60 दिन लगे, लेकिन इसकी कीमतें उसकी तुलना में बहुत जल्दी उछाल मारने लगती हैं.

खुले बाजार में गैस स्टेशन कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के साथ ही भाव बढ़ा देते हैं, ताकि अगली खेप के भुगतान के लिए उनके पास पर्याप्त नगदी रहे. पहले दो हफ्ते में ही खुदरा बाजार पर इसका असर दिखने लगता है. उदाहरण के लिए 2022 में यूक्रेन पर हमले के दौरान ड्राइवरों को एक हफ्ते के भीतर ही कीमतों में भारी इजाफा दिखने लगा, जबकि तेल की कीमत शुरुआती दिनों में महज 20 फीसदी ही बढ़ी थी.

मौजूदा संकट एक तरह से तनाव का परीक्षण है. यह ढांचागत कमजोरी सामने ला सकता कि कैसे दुनिया ऊर्जा को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती है और कैसे यह कुछेक भौगोलिक जाम के बिंदुओं पर निर्भर है. साल 1973 के ऑयल इंबार्गो या साल 2022 में यूक्रेन पर हमले की तरह यह संकट वैश्विक ऊर्जा में संतोष के युग के लिए मौत की घंटी साबित होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि होरमुज का मार्ग कितने समय तक बाधित रहता है.

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