बहुत कम लोगों को ऐसी नई भाषा बनाने का मौका मिलता है जिसे दुनिया के करोड़ों लोग सुनें. डीडब्ल्यू ने लिंग्विस्ट पॉल फ्रॉमर से बात की और जाना कि उन्होंने विश्वप्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म ‘अवतार’ के एलियंस की भाषा कैसे रची थी.जेम्स कैमरन से अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए भाषा विज्ञानी यानी लिंग्विस्ट पॉल फ्रॉमर कहते हैं, "यह मेरी जिंदगी की बहुत ही खास घटना थी.” हॉलीवुड के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक कैमरन को अपनी साइंस-फिक्शन फिल्म के लिए एक ऐसी भाषा चाहिए थी जिसे खास तौर पर गढ़ा गया हो. इसी खोज में उन्होंने ‘यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया' के लिंग्विस्टिक्स डिपार्टमेंट से ईमेल के जरिए संपर्क किया.
जब फ्रॉमर ने इस काम के लिए आवेदन किया, तो उन्होंने बेहतर तरीके से यह दिखाया कि वे इस बड़ी चुनौती को स्वीकार करने के लिए कितने उत्सुक और उत्साहित थे. 2005 में 90 मिनट की अपनी पहली बातचीत के आखिर में कैमरन ने फ्रॉमर को अपनी टीम में शामिल करते हुए कहा, "आपका हमारी टीम में स्वागत है.” यह उनकी साझेदारी की शुरुआत थी.
फ्रॉमर ने डीडब्ल्यू को बताया, "तब से मेरी जिंदगी सच में पहले जैसी नहीं रही.” उन्होंने यह बात इस सुपरहिट फिल्म सीरीज की तीसरी फिल्म, ‘अवतार: फायर एंड ऐश' की रिलीज से पहले कही. यह फिल्म उस पहली मुलाकात के ठीक 20 साल बाद आ रही है.
एक अनोखी भाषा तैयार की गई
फ्रॉमर कहते हैं, "भाषा के लिए कैमरन की शर्त यह थी कि वह ‘अच्छी' लगे. बेशक, यह व्यक्तिगत पसंद की बात है.” साथ ही, यह इतना आसान होना चाहिए था कि कलाकार इसे सीख सकें, क्योंकि शुरू से ही यह तय था कि किरदारों की आवाज में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.
फ्रॉमर आगे बताते हैं, "इसके पीछे की धारणा यह थी कि ना'वी प्रजाति के बोलने का शारीरिक तंत्र बिल्कुल इंसानों के जैसा ही है. इसी वजह से वे उन सभी आवाजों को निकालने में सक्षम हैं जिन्हें एक मनुष्य अपनी भाषा में बोलता है.”
हालांकि, ना'वी भाषा में ऐसी कई चीजें हैं जिसकी तुलना दूसरी भाषाओं से की जा सकती है, लेकिन इसे सीधे तौर पर किसी एक भाषा से नहीं जोड़ा जा सकता. फ्रॉमर कहते हैं, "मैं इसे थोड़ा हटकर और अनोखा बनाना चाहता था.”
खास अंदाज और पहचान वाली भाषा
भाषा विकसित करने की प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए फ्रॉमर ने भाषा विज्ञान में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग ‘मॉड्यूल' का जिक्र किया. उन्होंने इन मॉड्यूल्स को उन बुनियादी हिस्सों की तरह इस्तेमाल किया, जिनकी मदद से ना'वी भाषा का ढांचा तैयार किया गया.
वह समझाते हैं, "सबसे पहले किसी भी भाषा के मूल में उसकी ‘फोनेटिक्स' और ‘फोनोलॉजी' होती है, यानी उसकी ‘ध्वनियां और ध्वनि प्रणाली'.
फ्रॉमर बताते हैं कि भाषा में जिन ध्वनियों को छोड़ दिया गया या इस्तेमाल नहीं किया गया, वे उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि शामिल की गई ध्वनियां. यही चीज भाषा को उसकी अपनी खास पहचान और अंदाज देती है.
उदाहरण के लिए, उन्होंने इसमें ‘इजेक्टिव साउंड' को शामिल किया, जो बोलते समय हल्के धमाके जैसी आवाज पैदा करती हैं. ये ऐसी 'पॉपिंग' आवाजें हैं जो अफ्रीका के कुछ हिस्सों, एशिया और मूल अमेरिकी भाषाओं में सुनाई देती हैं. उन्होंने व्यंजनों को ऐसे नए तरीकों से जोड़ा जो आमतौर पर नहीं देखे जाते. उन्होंने वही आवाजें इस्तेमाल की जिनसे हम वाकिफ हैं, लेकिन उन्हें ऐसे क्रम में रखा जो बिल्कुल नया और अनोखा लगे.
आखिर इतनी खास क्यों है ‘अवतार: द वे ऑफ वॉटर’
इसके बाद, फ्रॉमर ने भाषा की मॉर्फोलॉजी तय की, यानी शब्द कैसे बनते हैं. वह कहते हैं, "इसमें काफी रचनात्मकता की जरूरत पड़ती है.” हालांकि उन्होंने दुनिया की दूसरी भाषाओं से ही प्रेरणा ली थी, लेकिन कुछ अन्य चीजें शामिल की और उन्हें ज्यादा जटिल, बेहतर और अनोखे तरीके से इस्तेमाल किया.”
उदाहरण के तौर पर, समय बताने के लिए इस भाषा में क्रिया के पांच अलग-अलग रूप दिए गए हैं. इनमें न सिर्फ वर्तमान, भूत और भविष्य शामिल हैं, बल्कि भूतकाल और भविष्य काल को भी दो-दो हिस्सों में बांटा गया है. एक वह जो अभी हाल ही में हुआ या होने वाला है, और दूसरा वह जो बहुत पहले हुआ या बहुत बाद में होगा.
कैसी थी शब्दों को गढ़ने की प्रक्रिया
ना'वी भाषा में वाक्यों के भीतर शब्दों का क्रम बहुत लचीला है. इसमें शब्दों का अर्थ उनके स्थान से नहीं, बल्कि उनके रूपों या विभक्तियों से बदलता है, जिसके लिए छह अलग-अलग कारक बनाए गए हैं. इसकी तुलना में, जर्मन भाषा में चार कारक होते हैं: नॉमिनेटिव (कर्ता), अक्युसेटिव (कर्म), डेटिव (संप्रदान) और जेनिटिव (संबंध).
दिमाग के लिए एक नई भाषा सीखना कितना मुश्किल?
इसके बाद, बारी आती है पूरी शब्दावली तैयार करने की यानी शब्दों को गढ़ने की. फ्रॉमर कहते हैं, "यह एक तरह से पूरी प्रक्रिया का सबसे कलात्मक और रचनात्मक हिस्सा है.” नए शब्द ऐसे होने चाहिए थे जो ना'वी भाषा के नियमों के दायरे में रहें. फ्रॉमर नए शब्दों को खोजने के लिए अलग-अलग ध्वनियों के साथ प्रयोग करते थे. वे यह देखते थे कि ये शब्द बोलने में कितने सहज लग रहे हैं.
हर शब्द पर सोच-विचार किया गया
अवतार सीरीज की हर फिल्म में जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, ना'वी के अलग-अलग समुदायों या कबीलों की पहचान दिखाने के लिए नए शब्द और बोलने के खास तरीके विकसित किए जाते हैं. इस तरह इस भाषा के शब्दों का खजाना बढ़ता जा रहा है. फ्रॉमर का अनुमान है कि अब ना'वी भाषा में 3,000 से भी ज्यादा शब्द हो चुके हैं. उनका कहना है कि अब इस भाषा के पास इतने शब्द हैं कि इनके जरिए इंसान के जीवन के अनुभवों को आसानी से व्यक्त किया जा सकता है, चाहे वह आपसी रिश्तों की बात हो या दिन-भर की सामान्य गतिविधियां.
इस भाषा में तकनीकी या वैज्ञानिक क्षेत्रों के लिए शब्द नहीं हैं, लेकिन फ्रॉमर कहते हैं, "भले ही अभी इसमें बहुत ज्यादा बारीकियां न हों, फिर भी आप अपनी बात दूसरों तक पहुंचा सकते हैं.”
अगर हम तुलना करें, तो ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में अलग-अलग तरीके के छह लाख शब्द हैं. आमतौर पर, एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति जिसकी पहली भाषा अंग्रेजी है, वह अपने जीवन में करीब 40,000 शब्दों का इस्तेमाल करना या उन्हें समझना जानता है.
2009 में अवतार सीरीज की पहली फिल्म आने के इतने सालों बाद आज एआई तकनीक बहुत विकसित हो गई है. हालांकि, ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' शायद फ्रॉमर के नियमों का पालन करते हुए अनगिनत नए ना'वी शब्द तैयार कर सकते हैं. लेकिन भाषा वैज्ञानिक फ्रॉमर कहते हैं कि वे ‘धीमी गति से चलना पसंद करेंगे और हर शब्द को सोच-समझकर बनाना चाहेंगे, ताकि हर नए शब्द में वही अहसास और गरिमा हो जो वे चाहते हैं.'
ना'वी भाषा को पसंद करने वाले लोग ‘लेक्सिकल एक्सपेंशन प्रोजेक्ट' नाम के एक प्लेटफॉर्म के जरिए नए शब्दों का सुझाव भी दे सकते हैं. हालांकि, कौन सा शब्द डिक्शनरी में शामिल होगा, इसका पूरा नियंत्रण फ्रॉमर के पास है. वह कहते हैं, "मैं ही अभी भी अकेला गेटकीपर हूं.”
भाषा के इर्द गिर्द बनती नई कम्युनिटी
‘स्टार ट्रेक' या जे.आर.आर. टोल्किन की ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स' जैसी फिल्मों के चाहने वाले अक्सर इन कहानियों की गहराइयों में डूबने के लिए उनकी खास भाषाएं सीखते हैं. क्लिंगन और एल्विश इसके बेहतरीन उदाहरण हैं. इन भाषाओं को प्राकृतिक रूप से विकसित होने के बजाय खास तौर पर बनाया गया है, इसलिए इन्हें ‘कंस्ट्रक्टेड लैंग्वेज' या संक्षेप में ‘कॉनलैंग्स' कहा जाता है.
इसी तरह, अब दुनिया भर में ना'वी भाषा सीखने वालों का एक समुदाय बन गया है. जो लोग इस भाषा में रुचि रखते हैं, उनके लिए अब एक छपी हुई डिक्शनरी और इंटरनेट पर ढेरों संसाधन मौजूद हैं.
फ्रॉमर बताते हैं, "मैं यह नहीं कहूंगा कि ऐसे लोगों की संख्या हजारों में है, लेकिन काफी संख्या में ऐसे लोग हैं. ना'वी में सबसे ज्यादा दिलचस्पी रखने वाले लोगों में अमेरिका और जर्मनी के लोग शामिल हैं.”
इन प्रशंसकों को एक काल्पनिक भाषा सीखने के लिए इतनी कड़ी मेहनत और समय देने की प्रेरणा कहां से मिली? इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए कनाडाई लिंग्विस्टिक एंथ्रोपोलॉजिस्ट क्रिस्टीन श्रेयर ने ना'वी भाषा सीखने वाले इस वैश्विक समुदाय का गहराई से अध्ययन किया.
उन्होंने पाया कि उनमें से कुछ लोग फिल्म के दीवाने हैं. वे शायद यह भी चाहते हैं कि वे फिल्म के काल्पनिक ग्रह पंडोरा जा सकें. वहां बोली जाने वाली भाषा सीखना उस दुनिया से जुड़ने का उनका तरीका है.
कुछ लोग ना'वी के भाषाई पहलू से प्रेरित होते हैं. चूंकि यह भाषा दुनिया की प्रचलित भाषाओं से बिल्कुल अलग और एकदम नई है, इसलिए इसे सीखना उनके लिए एक अनोखा और रोमांचक अनुभव होता है.
प्रेरित करने वाला एक और बड़ा पहलू यह है कि चूंकि यह भाषा नई है और इसे सीखने वाले लोग अभी कम हैं. इसलिए, इसमें महारत हासिल करना और विशेषज्ञों में शामिल होना काफी आसान है. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसका इस्तेमाल अपनी रचनात्मकता दिखाने के लिए करना चाहते हैं.
ना'वी भाषा सीखना अब केवल एक शौक नहीं रह गया है. अन्य विशेष रुचियों की तरह, इसने लोगों को एक ऐसा मंच दिया है जहां वे एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं और समान पसंद वाले लोगों से मिल सकते हैं. इस प्रोजेक्ट के जरिए जो भी गहरे संबंध और मित्रता विकसित हुई है, फ्रॉमर उन सभी के लिए आभार व्यक्त करते हैं.
ना'वी भाषा के एक मशहूर वाक्य को ही ले लीजिए, जिसे इस समुदाय के लोग एक-दूसरे से कहते हैं: "ओएल नगाती कामेई”. इसका शाब्दिक अर्थ "मैं तुम्हें देख रहा हूं” है, लेकिन इसका असली और गहरा भाव यह है कि "मैं तुम्हें बेहतर तरीके से समझता हूं.”













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