अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है जर्मनी का सबसे पुराना दल एसपीडी
जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी कभी ‘बड़े जनाधार’ वाली पार्टी हुआ करती थी, जिसे जर्मनी के लगभग आधे मतदाताओं का समर्थन हासिल था.
जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी कभी ‘बड़े जनाधार’ वाली पार्टी हुआ करती थी, जिसे जर्मनी के लगभग आधे मतदाताओं का समर्थन हासिल था. आज यह पार्टी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है.सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी), जर्मनी की सबसे पुरानी और पहली राजनीतिक पार्टी है. हालांकि, यह साल उसके लिए काफी मुश्किलों भरा दिख रहा है. देश के 16 में से 5 राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, लेकिन पार्टी के भीतर आत्मविश्वास की कमी साफ झलक रही है. हाल के जनमत सर्वे के मुताबिक, एसपीडी उन दो राज्यों में सत्ता से बाहर हो सकती है जहां उसने दशकों तक सरकार चलाई. वहीं, दो अन्य राज्यों में पार्टी की लोकप्रियता 10 फीसदी से भी कम रह गई है.
यह समझने के लिए कि आखिर चूक कहां हुई, हमें पीछे मुड़कर देखना होगा. एसपीडी की स्थापना 1863 में एक पारंपरिक श्रमिक पार्टी के तौर पर हुई थी, जो इसे देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी बनाती है. उस दौर में, इसका उद्देश्य उन कारखाना मजदूरों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करना था, जिनका जीवन लंबी कार्य अवधि, कम मजदूरी, नौकरी की असुरक्षा, कार्यस्थल पर सुरक्षा का अभाव और आवास की किल्लत जैसी अनिश्चितताओं से भरा था.
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कारखानों में काम करने वाले मजदूर एसपीडी के पक्के वोटर बन गए. उन्हें पार्टी के उस वादे पर पूरा यकीन था जिसमें कहा गया था कि चाहे कोई किसी भी जाति या वर्ग का हो, सबको बराबर हक, अच्छी शिक्षा और तरक्की के एक जैसे मौके मिलेंगे.
आज के दौर में, वह पारंपरिक श्रमिक वर्ग अब अस्तित्व में नहीं है. अच्छी तनख्वाह पाने वाले औद्योगिक मजदूर लंबे समय से समाज के मध्यम वर्ग का हिस्सा बन चुके हैं.
एसपीडी का कम होता जनाधार
नवंबर 2025 में ‘फोर्सा' के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जर्मनी के केवल 9 फीसदी औद्योगिक मजदूरों और बेरोजगारों ने कहा कि वे एसपीडी को वोट देंगे. जो लोग खुद को सामाजिक रूप से पिछड़ा महसूस करते हैं, वे अब धुर दक्षिणपंथी लोकलुभावन पार्टी ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' (एएफडी) के प्रति सहानुभूति रखते हैं. फरवरी 2025 के आम चुनाव के बाद, ‘इन्फ्राटेस्ट-डिमैप' के एक पोल में पाया गया कि श्रमिक वर्ग के 38 फीसदी मतदाताओं ने एएफडी के पक्ष में मतदान किया था.
एसपीडी के कई पुराने मतदाताओं ने अब सोशलिस्ट ‘लेफ्ट पार्टी' का दामन थाम लिया है. इस पार्टी का गठन आंशिक रूप से चांसलर गेरहार्ड श्रोएडर के नेतृत्व वाली एसपीडी की सामाजिक कल्याण नीतियों के प्रति असंतोष के कारण हुआ था. श्रोएडर ने 1998 से 2005 तक ग्रीन्स के साथ गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था.
लेफ्ट पार्टी साल 2007 में दो गुटों के मिलने से बनी थी: पहली, ‘पार्टी ऑफ डेमोक्रेटिक सोशलिज्म' (पीडीएस), जो पूर्वी जर्मनी की पुरानी सत्ताधारी पार्टी का नया रूप थी. दूसरी, पश्चिमी जर्मनी के उन लोगों का समूह जो एसपीडी से अलग होकर ‘लेबर एंड सोशल जस्टिस' नाम से नई पार्टी बना चुके थे.
श्रोएडर और उनकी पार्टी एसपीडी, सेंटर-राइट क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) के चांसलर हेल्मुट कोल के 16 साल के शासन के बाद 1998 में सत्ता में आयी थी. उस समय एसपीडी ने लगभग 41 फीसदी वोट हासिल किए थे. यह जीत एक ऐसे अभियान के जरिए मिली जिसने न सिर्फ वामपंथी पार्टी के मतदाताओं, बल्कि मध्यम वर्ग के मतदाताओं को भी अपनी ओर आकर्षित किया था. बढ़ती बेरोजगारी और सुस्त अर्थव्यवस्था के बीच, श्रोएडर ने कल्याणकारी राज्य में बड़े बदलाव किए, जिसे ‘एजेंडा 2010' कहा गया. इसके तहत सरकारी सामाजिक लाभों में कटौती की गई, रोजगार सुरक्षा के नियमों में ढील दी गई और कम वेतन वाले क्षेत्र का विस्तार किया गया.
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कैसे खो दिए अपने आधे मतदाता
सीडीयू और क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) के रूढ़िवादी विपक्षी गुट ने इस एजेंडे का उत्साहपूर्वक स्वागत किया था, जिससे जर्मन अर्थव्यवस्था को काफी गति मिली. हालांकि, एसपीडी के भीतर इससे भारी विवाद पैदा हो गया. पार्टी के वामपंथी धड़े ने विद्रोह कर दिया और श्रोएडर की नीतियों का समर्थन करने से इनकार कर दिया.
10 वर्षों के भीतर, एसपीडी ने अपने लगभग आधे मतदाताओं को खो दिया. ये लोग लेफ्ट पार्टी, ग्रीन्स और यहां तक कि सीडीयू की ओर चले गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तत्कालीन चांसलर अंगेला मैर्केल ने अपनी रूढ़िवादी पार्टी को धीरे-धीरे लेफ्ट की ओर झुका दिया था. उनके रूढ़िवादी आलोचकों ने इसे ‘सीडीयू का सामाजिक लोकतंत्रीकरण' करार दिया.
मतदाताओं के लिए सीडीयू/सीएसयू और एसपीडी की नीतियों के बीच अंतर करना लगातार कठिन होता गया. विशेष रूप से इसलिए क्योंकि 2005 से 2021 की अधिकांश अवधि के दौरान इन दोनों ने एक गठबंधन में साथ मिलकर सरकार चलाई. इस दौरान, एसपीडी को कई राजनीतिक समझौते करने पड़े और वह अपनी कई लेफ्ट-विंग सोशल और टैक्स पॉलिसी को लागू करने में असमर्थ रही.
2021 के आम चुनाव से पहले, एसपीडी को महज 16 फीसदी वोट मिल रहे थे, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान रूढ़िवादी गठबंधन की बड़ी गलतियों के चलते, एसपीडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे 25.7 फीसदी वोट मिले. इसके बाद, मैर्केल की सरकार में वित्त मंत्री और वाइस चांसलर रहे ओलाफ शॉल्त्स जर्मनी के नए चांसलर बने. पार्टी को उम्मीद थी कि वह आखिरकार कामयाबी की राह पर वापस आ गई है, लेकिन हुआ इसका उल्टा.
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शॉल्त्स के नेतृत्व वाले तीन दलों के गठबंधन में ‘ग्रीन्स' और नव-उदारवादी ‘फ्री डेमोक्रेट्स' (एफडीपी) के बीच भारी आंतरिक कलह बनी रही, जिससे कामकाज में बाधा आई. सिर्फ तीन साल सत्ता में रहने के बाद यह सरकार समय से पहले ही गिर गई, जिससे एसपीडी की साख को और अधिक नुकसान पहुंचा. 2025 के चुनावों में, पार्टी केवल 16 फीसदी वोट ही हासिल कर पाई. इसे देखते हुए, फोर्सा संस्थान के प्रमुख मानफ्रेड गुलनर ने कहा कि यह एसपीडी के लिए ‘अस्तित्व पर संकट' जैसा है.
एसपीडी की नीतियां लेफ्ट की तरफ शिफ्ट होना बना समस्या
2025 में, एसपीडी एक बार फिर सरकार का हिस्सा बनी है, लेकिन इस बार चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स की सीडीयू/सीएसयू की सरकार में एक छोटे साझेदार के रूप में. इसके साथ ही पार्टी के सामने पुरानी समस्याएं फिर से खड़ी हो गई हैं. उसे एक बार फिर यह जोखिम सता रहा है कि वह गठबंधन में अपनी खास पहचान खो सकती है.
एसपीडी ने 2027 के लिए एक नए नीतिगत मंच पर काम शुरू कर दिया है. पार्टी नई योजनाएं बना रही है, जिसमें वामपंथी सामाजिक नीतियों को प्रमुखता दी जाएगी. इसमें पूरा जोर मजदूरों और गरीबों के हक वाली नीतियों पर होगा. पर सवाल यह है कि लोग इस पर भरोसा कैसे करें? जब वे फ्रीडरिष मैर्त्स के साथ सरकार में हैं, तो वे अपनी ऐसी मर्जी उन पर नहीं थोप सकते.
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मैर्त्स के नेतृत्व में, सीडीयू एक बार फिर काफी अधिक रूढ़िवादी हो गई है. खाली सरकारी खजाने और बेहद कमजोर अर्थव्यवस्था को देखते हुए, सामाजिक खर्चों में कटौती की पूरी संभावना है. सीडीयू/सीएसयू कल्याणकारी राज्य, पेंशन प्रणाली, स्वास्थ्य सेवा और बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में एक बड़े सुधार की योजना बना रही है.
एसपीडी का भी मानना है कि इनमें से कई प्रस्ताव आवश्यक हैं, लेकिन उसने एक अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की मांग की है. सामाजिक समानता के पक्ष में चलाए गए इस अभियान से पार्टी को जनमत सर्वेक्षणों में मामूली बढ़त मिली है. आगामी राज्य चुनावों के कारण संघीय सरकार वर्तमान में किसी भी खुले विवाद से बचने की कोशिश कर रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि घरेलू नीति के मामले में सरकार लगातार पंगु होती जा रही है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मार्च में दक्षिण-पश्चिमी राज्य ‘बाडेन वुर्टेमबर्ग' और पश्चिमी राज्य ‘राइनलैंड पैलेटिनेट' में होने वाले चुनावों में सीडीयू और एसपीडी दोनों को नुकसान होगा. राइनलैंड पैलेटिनेट में 1991 से एसपीडी की सरकार है. अगर पार्टी वहां की सत्ता से बाहर होती है, तो राष्ट्रीय स्तर पर सीडीयू/सीएसयू से दूरी बनाने के लिए पार्टी के भीतर दबाव बढ़ना तय है.