जर्मनी की नई धार्मिक विविधता: बंद हो रहे चर्च, खुल रहे नए धार्मिक स्थल
जर्मनी में जहां बहुत से पुराने चर्च बंद हो रहे हैं, वहीं नए धार्मिक स्थल उनकी जगह ले रहे हैं.
जर्मनी में जहां बहुत से पुराने चर्च बंद हो रहे हैं, वहीं नए धार्मिक स्थल उनकी जगह ले रहे हैं. भारत और सीरिया से आए प्रवासी अपनी संस्कृति और आस्था के जरिए जर्मन शहरों के रूपरंग में बदलाव ला रहे हैं.दक्षिण जर्मनी के शहर एरलांगेन की आबादी लगभग 1,19,000 है. इस बहु सांस्कृतिक शहर में काफी दिलचस्प चीजें हो रही हैं. एक ओर यूनिवर्सिटी द्वारा दी गई जमीन पर सिनेगॉग (यहूदियों का प्रार्थना स्थल) के निर्माण की तैयारी हो रही है. दूसरी ओर शहर की दो मुख्य मस्जिदों के विस्तार की योजना बन रही है. इतना ही नहीं, शहर के बाहरी इलाके में एक संगठन ने हिंदुओं के लिए शिव‑विष्णु मंदिर बनाने के लिए जमीन भी खरीदी है.
सिल्विया क्लाइन, एरलांगेन के 'इंटीग्रेशन एंड डायवर्सिटी' विभाग की प्रमुख हैं. वह बताती हैं कि शहर में कई संस्कृतियों, भाषाओं और धर्म के लोग साथ‑साथ रहते हैं. हिंदू मंदिर की योजना के बारे में बताते हुए वह "हिंदू टेंपेल फ्रांकेन" नाम की संस्था का जिक्र करती हैं. इस संस्था ने लोगों के दान, अपने जमा पैसे और कर्ज की मदद से मंदिर निर्माण के लिए जमीन खरीदी है. मंदिर का निर्माण साल 2027 में शुरू होगा.
एरलांगेन में भारतीय छात्रों की बढ़ती संख्या
क्लाइन बताती हैं कि यूनिवर्सिटी में लगभग 2,000 भारतीय छात्र पढ़ते हैं. संस्था भी इस ओर इशारा करती है कि एरलांगेन में भारतीय मूल के लोग सबसे बड़ा गैर‑जर्मन समुदाय बनाते हैं. यह शहर स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे जर्मनी के बड़े शहरों में भी अब साफतौर पर धार्मिक विवधता नजर आने लगी है.
यहां पुराने चर्च आज भी मौजूद हैं, जैसे कैथलिक और प्रोटेस्टेंट चर्च. साथ ही, एक ग्रीक और एक रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च भी है. करीब तीन साल पहले एक कॉप्टिक चर्च ने शहर के ब्रुक इलाके में मौजूद एक पुराने कैथलिक चर्च को अपने हाथों में ले लिया. 'सेंट पीटर और पॉल' कहलाने वाला यह कैथलिक चर्च अब 'मैरी एंड द होली अपोस्टल्स' को समर्पित एक कॉप्टिक चर्च बन गया है.
कॉप्टिक चर्च के डीकन एडवर्ड मत्ता ने डीडब्ल्यू को बताया कि पहले इस चर्च से जुड़ा समुदाय काफी छोटा था. लेकिन अब कुल 60 परिवारों के करीब 200 लोग इससे जुड़े हैं और संख्या बढ़ती ही जा रही है. इसके अलावा 40 छात्र भी हैं, जो इस चर्च से जुड़े हुए हैं.
इसके उलट, जर्मनी के प्रमुख ईसाई चर्च अब सिकुड़ते जा रहे हैं. कुछ साल पहले तक आधे से ज्यादा जर्मन खुद को ईसाई मानते थे. आज करीब 3.66 करोड़ लोग ही कैथलिक या प्रोटेस्टेंट चर्च से जुड़े हैं. यह आंकड़ा देश की कुल आबादी का लगभग 44 फीसदी है. चर्च से जुड़े लोगों की संख्या तेजी से कम होने के कारण कई चर्च या तो बंद हो रहे हैं या दूसरे कामों में इस्तेमाल हो रहे हैं.
अखबारों और मीडिया में कहा जाता है कि जर्मनी में लोग अब कम धार्मिक हो रहे हैं. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? जर्मनी के 'फेडरल ऑफिस फॉर माइग्रैशन एंड रेफ्यूजीस' के अनुसार, 2020 तक देश में 53 लाख से भी ज्यादा मुसलमान रह रहे थे. साल 2024 में प्रोटेस्टेंट चर्च द्वारा कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, जर्मनी में करीब 38 लाख ऑर्थोडॉक्स ईसाई हैं. इसके अलावा यहां यहूदी, बौद्ध, बहाई और हिंदू भी रहते हैं. हिंदुओं की संख्या बढ़ रही है. इन सभी समुदायों के आंकड़े सटीक नहीं, बल्कि अनुमान पर आधारित हैं.
शहरों में उभरते नए धार्मिक केंद्र
साफतौर पर देखा जा सकता है कि जर्मनी के शहरों की धार्मिक तस्वीर बदल रही है, ज्यादा विविध हो रही है. अब यहां पहले से कई ज्यादा धर्मों के लोग दिखाई दे रहे हैं और इसका प्रमाण हैं, नए बन रहे प्रार्थना स्थल. हालांकि, ऐसे धार्मिक स्थलों की सटीक संख्या बता पाना बहुत मुश्किल है.
साल 2024 की गर्मियों में, बौद्ध ननों ने बर्लिन‑मिट्टे में एक नया मठ खोला. अब तो जर्मनी में करीब 20 बौद्ध मठ हैं.
जून 2026 में जर्मनी का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर बर्लिन में खुलने जा रहा है. इसकी योजना 2004 में बनी थी और 2010 के आसपास मंदिर का निर्माण शुरू हुआ. मंदिर निर्माण परियोजना के प्रमुख विल्वनाथन कृष्णमूर्ति ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम एक बढ़ता हुआ समुदाय हैं." सरकारी आंकड़ों की मानें, तो पिछले 10 साल के दौरान बर्लिन में भारतीय नागरिकों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ते हुए लगभग 41,000 हो गई है.
मंदिर की अहमियत पर जोर देते हुए कृष्णमूर्ति कहते हैं, "एक धार्मिक केंद्र की काफी लंबे समय से जरूरत है, ताकि युवा एक जगह मिलजुल सकें." ऐसे केंद्रों के होने से भारत में रहने वाले उन माता‑पिता को भी राहत मिलती है, जिनके बच्चें घर से दूर रह रहे हैं.
गौर करने वाली बात यह है कि एरलांगेन स्थित मंदिर के बहुत से सदस्य इंजीनियर या प्रबंधक के रूप में काम कर रहे हैं. इनमें से कुछ सीमेंस में भी काम करते हैं. वहीं, बर्लिन में मंदिर से जुड़े ज्यादातर लोग अमेजन के लिए काम करते हैं. दोनों ही मंदिरों में, हालिया सालों में दान की राशि में बढ़ोतरी देखी गई है.
हिंदू मंदिरों का निर्माण अब आम बात होती जा रही है. अकेले फ्रैंकफर्ट आम माइन में ही छह से ज्यादा छोटे मंदिर हैं. कोलोन, हैम्बर्ग, म्यूनिख और बर्लिन में भी कई मंदिर हैं. ये भारतीय, तमिल और अफगान समुदाय समेत अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं.
तुर्की‑इस्लामिक धार्मिक संघ (डीआईटीआईबी) के मुताबिक, जर्मनी में कुल 862 मस्जिदें हैं. ये सभी मस्जिदें अंकारा स्थित तुर्की के धार्मिक मामलों के कार्यालय से जुड़ी हैं. जर्मनी में इस समुदाय की कुछ मस्जिदें ऐसी भी हैं, जिनका निर्माण कार्य अटका हुआ है. उदाहरण के तौर पर क्रेफेल्ड की प्रस्तावित मस्जिद, जो जर्मनी की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद बताई गई थी. इस मस्जिद का निर्माण कई साल से अधूरा है.
अहमदिया समुदाय की बात की जाए तो, पाकिस्तान में उनका उत्पीड़न होता है. यह समुदाय भी हर जर्मनी में कई नई मस्जिदें खोल रहा है. सबसे हालिया मस्जिद फरवरी में खुली थी, थुरिंजिया की राजधानी एरफुर्ट में. डीआईटीआईबी के विपरीत, अहमदिया समुदाय खुले विचारों पर जोर देता है और खुलकर बातचीत करने को तैयार है.
एरफुर्ट में अहमदिया समुदाय के प्रवक्ता सुलेमान मलिक ने बताया दिसंबर 2025 में नॉर्डहॉर्न में भी एक नई मस्जिद का उद्घाटन हुआ. इसके अलावा उत्तर जर्मनी के हुसुम में भी एक मस्जिद का निर्माण कार्य जारी है. हालांकि, हर परियोजना का मतलब एक नया निर्माण कार्य नहीं होता. कुछ मामलों में पुरानी चर्च की इमारत को ही इस्तेमाल कर लिया जाता है.
मस्जिद और सिनेगॉग: नए निर्माण जारी
सुलेमान मलिक गर्व से बताते हैं कि जिस इमारत को बार-बार निशाना बनाया गया, वहां अब वह रोजाना स्कूल के बच्चों और बुजुर्गों को घुमाने ले जाते हैं. सब इसे काफी दिलचस्पी के साथ देखते भी हैं.
एरलांगेन की स्वतंत्र पीस मस्जिद भी उन मस्जिदों में शामिल है, जिससे जुड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है. इस मस्जिद का विस्तार भी किया जा रहा है. यहां आने वाले लोगों को अलग‑अलग मुस्लिम संस्कृतियों से आए नमाजी मिलते हैं. गौर करने वाली बात यह भी है मस्जिद में उपदेश भी जर्मन भाषा में दिए जाते हैं.
यहूदी समुदाय की ओर से भी काफी निर्माण कार्य हो रहे हैं. साल 2023 में पूर्वी जर्मनी के माग्देबुर्ग शहर और 2024 में पोट्सडाम में नए सिनेगॉग का उद्घाटन हुआ. अब जर्मनी के हर राज्य की राजधानी में एक यहूदी प्रार्थना स्थल मौजूद है. आने वाले समय में कुछ और नई इमारतों का निर्माण भी योजना में शमिल है.
एरलांगेन में एक बहुप्रतीक्षित सिनेगॉग बनाने की योजना भी तेजी से आगे बढ़ रही है. बर्लिन में चाबाद समुदाय भी अपने सिनेगॉग का जल्द विस्तार करना चाहता है. म्यूनिख समेत कई शहरों में यहूदी समुदाय कई साल से नए धार्मिक केंद्र बनाने की तैयारी कर रहे हैं.
इसी दौरान एक और निर्माण परियोजना आकार ले रही है, जो जर्मनी में यहूदी जीवन का एक मजबूत प्रतीक मानी जा रही है. . इस अकादमी परिसर में एक ऐतिहासिक, संरक्षित विला और एक नई आधुनिक इमारत शामिल हैं, जिसका डिजाइन बाउहाउस शैली से प्रेरित है. साल 2021 में इस परियोजना की लागत लगभग 34.5 मिलियन यूरो आंकी गई थी.
जर्मनी में ऑर्थोडॉक्स चर्चों की संख्या भी बढ़ रही है. पहले ज्यादातर मामलों में खाली पड़े चर्च या पुरानी मॉनेस्ट्रियों का इस्तेमाल किया जा रहा था, जैसे एरलांगेन में कॉप्टिक समुदाय ने किया. लेकिन, अब नए चर्च भी बनाए जा रहे हैं. जून 2024 में जर्मन राज्य हेस्से के बुट्जबाख में सेंट पीटर और पॉल चर्च खोला गया. यह यूरोप में एंटिऑकियन ऑर्थोडॉक्स चर्च का पहला नया धार्मिक स्थल है. इस चर्च के बहुतायत सदस्य सीरियाई पृष्ठभूमि के ईसाई हैं.
जर्मनी में सीरियाई, ग्रीक, रूसी, रोमानियाई और सर्बियाई ऑर्थोडॉक्स समुदाय अपने धार्मिक कार्यों के लिए चर्च की खाली इमारतों को अपना रहे हैं. हालांकि जब वे नए सिरे से इमारत बनाने निकलते हैं, तब उन्हें पता चलता है कि जर्मनी के निर्माण कानून कितने पेचीदा हैं.
जर्मनी के 'विल्सहोफेन आन डेय दोनाऊ' शहर में रोमानियाई चर्च एक नया प्रार्थना स्थल बनाना चाहता है. फादर मारीउस जिदवैयां ने डीडब्ल्यू को बताया कि निर्माण कार्य की अर्जी तीन साल से दफ्तर में अटकी पड़ी है. परिषद के करीब 300 परिवार अब भी अर्जी के जवाब का इंतजार कर रहे हैं. फादर जिदवैयांइस बताते हैं कि मंजूरी मिलने में हो रही देरी के कारण समुदाय के लोगों में काफी निराशा भी है.