जर्मनी: 10 साल बाद भी बेरोजगार क्यों हैं शरणार्थी महिलाएं?

2015 में जर्मनी ने सीरिया और अफगानिस्तान जैसे देशों से आए हजारों लोगों को शरण दी थी.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

2015 में जर्मनी ने सीरिया और अफगानिस्तान जैसे देशों से आए हजारों लोगों को शरण दी थी. लेकिन 10 साल बाद भी उनमें से कई महिलाएं बेरोजगार हैं. क्या हैं उनकी चुनौतियां और कैसे होगा समाधान?दोन्या* 2016 में जर्मनी आई थी. वह अफगानिस्तान में मिडवाइफ का काम करती थी, लेकिन पति के लापता होने और जान से मारने की धमकियां मिलने के बाद वह अपने 19 साल के बेटे के साथ वहां से भाग आई. वो बताती हैं, "जर्मनी में मेरी पहली रात ऐसी थी, जब मैं सालों बाद चैन की नींद सोई थी. मैं वह रात कभी नहीं भूल सकती.”

जर्मनी में उन्हें शरण और सुरक्षा तो मिली लेकिन उनके मन में अपने बेटे और खुद की सुरक्षा को लेकर हमेशा खौफ बना रहता है. इस तरह के ट्रॉमा से इंसान जल्दी उभर नहीं पाता, और यही उनके नौकरी पाने के रास्ते में भी अड़चन पैदा करता है.

फिर भी दोन्या ने हार नहीं मानी. जर्मन भाषा और आठ महीने का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, वह पिछले दो साल से बुजुर्गों की देखभाल का काम कर रही हैं. 53 साल की दोन्या बताती हैं कि यह काम उन्हें उतना दिलचस्प तो नहीं करता, लेकिन फिर भी वह दोबारा नौकरी खोजने का झमेला मोल नहीं लेना चाहती.

उन्हें 'वर्क फॉर रिफ्यूजी' नामक प्रोजेक्ट से भी काफी मदद मिली, जिसे जीआईजेड और कुछ अन्य संस्थाएं मिलकर चलाती हैं और बर्लिन सीनेट इसे फंड करती है. यह उन कई सार्वजनिक और गैर-लाभकारी योजनाओं में से एक है, जो शरणार्थियों की चुनौतियां कम करने और नौकरी पाने में आने वाली रुकावटों को दूर करने में मदद करते हैं.

तीन गुना मुश्किलें झेलती हैं महिला शरणार्थी

2016 से शुरू हुई एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा या संघर्ष से भागकर जर्मनी आने वाले करीब 68 फीसदी लोग लगभग आठ साल बाद नौकरी पाने में सफल रहे हैं. इस शोध से यह भी पता चलता है कि नौकरियों में महिलाओं की दर पुरुषों की तुलना में काफी कम है. अब, आठ साल बाद भी लगभग दो-तिहाई महिला शरणार्थी बेरोजगार हैं, जबकि पुरुषों में यह दर केवल 15 फीसदी है.

आईएबी की शोधकर्ता माय एहाब बताती हैं, "महिला शरणार्थियों को तिगुना मुश्किल का सामना करना पड़ता है क्योंकि पहले तो वे महिला हैं, ऊपर से प्रवासी और शरणार्थी भी.”

जर्मनी आने वाले पुरुष शरणार्थी अक्सर अकेले आते हैं, जबकि ज्यादातर महिलाएं छोटे बच्चों के साथ आती हैं. एहाब ने डीडब्ल्यू को बताया, "इस वजह से उन्हें जर्मन भाषा के कोर्स या सरकारी सेवाओं का लाभ लेने में ज्यादा मुश्किल होती है.” डे-केयर सेंटरों में कर्मचारियों की कमी के कारण डे-केयरों में भी जगह पाना आसान नहीं होता है. 2022 में रूस के हमले के बाद भी बच्चों के साथ जर्मनी आई कई यूक्रेनी महिलाओं को भी ऐसी ही समस्या झेलनी पड़ रही है.

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2015 और 2016 में जर्मनी आए लगभग 12 लाख शरणार्थियों में ज्यादातर पुरुष थे, जो सीरिया, अफगानिस्तान और इराक से आए थे. जबकि शरण लेने वाले यूक्रेनियों में तकरीबन तीन-चौथाई महिलाएं थीं.

एहाब के अनुसार कुछ महिला शरणार्थियों ने तो अपने देश में कभी काम ही नहीं किया था, या शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कुछ ऐसे क्षेत्रों में काम किया था, जहां जर्मनी में काम करने के लिए अच्छी भाषा आना और कड़ी शर्तें हैं.

एहाब बताती हैं कि पुरुष कई ऐसे काम कर सकते हैं, जिनमें जर्मन भाषा की उतनी जरूरत नहीं होती जैसे निर्माण कार्य या सर्विस सेक्टर. जिस वजह से उनके लिए काम करना यह काफी हद तक आसान हो जाता है.

भाषा और डिग्री की मान्यता बढ़ाती है मुश्किल

जर्मनी में विदेशी डिग्री को मान्यता दिलाना काफी मुश्किल होता है. दोन्या के पास यह साबित करने के लिए कोई कागज नहीं था कि उन्होंने 12 साल तक स्कूली पढ़ाई की और कई साल मेडिकल ट्रेनिंग भी ली थी.

जर्मनी में अधिकतर पेशेवर लोग सरकारी मान्यता वाले संस्थानों से ट्रेनिंग लेते हैं, जबकि कई देशों में लोग काम के दौरान ही सीखते हैं. लेकिन जर्मनी में सिर्फ अनुभव काम नहीं आता, अगर आपके पास उसका कोई आधिकारिक प्रमाण न हो. यही वजह है कि कई शरणार्थियों को सब कुछ शुरुआत से सीखना पड़ता है.

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हालांकि, दोन्या पढ़ी-लिखी थीं, लेकिन अफगानिस्तान से आई सभी महिलाओं के साथ ऐसा नहीं है. वहां महिलाओं की शिक्षा तालिबान के आने से पहले से भी हमेशा ही सवालों के घेरे में रही है. डोन्या के पति, जो कि इंग्लिश टीचर थे. वह एक गांव में लड़कियों और महिलाओं को पढ़ाते थे, जिसके बाद वह लापता हो गए.

जर्मनी के इंटीग्रेशन कोर्स में आम तौर पर 600 घंटे तक जर्मन भाषा पढ़नी होती हैं, चाहे व्यक्ति की पढ़ाई का स्तर कुछ भी हो. बर्लिन में जीआईजेड/ सोसाइटी फॉर इंटरकल्चरल कोएक्जिस्टेंस में काम करने वाली अफसान अफराज इस तरीके की आलोचना करती हैं. वह खुद 2014 में ईरान से अपने पति (एक पूर्व राजनीतिक कैदी) के साथ जर्मनी आई थी. उन्होंने बताया, "मुझे 600 घंटे जर्मन सीखनी पड़ी जबकि मैंने पढ़ाई की हुई थी और मुझे अंग्रेजी भी आती थी. फिर भी मैं उसी कक्षा में थी, जिसमें 55 साल की एक महिला थी, जिसने कभी कलम तक नहीं पकड़ी थी.”

अफराज कई सालों से दोन्या को मानसिक तौर पर मदद दे रही हैं और उनके बारे में कहती हैं कि "अफगानिस्तान में किसी महिला के लिए, दोन्या जितना बढ़ पाना आसान नहीं है.”

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वर्क फॉर रिफ्यूजी प्रोजेक्ट "पहले नौकरी” के सिद्धांत पर काम करता है. इस प्रोजेक्ट की जॉब काउंसलर, इना गिसा खुद एक यूक्रेनी शरणार्थी हैं. उन्होंने जर्मनी में पहला काम एक रेस्टोरेंट में किया था, जब वह जर्मन में बस गिनती पांच तक और "मेरा नाम…” बोल पाती थी. अंग्रेजी आने की वजह से उन्हें यह नौकरी मिल गई.

गिसा का कहना है कि उनके हिसाब से भाषा सीखने और नए लोगों से जुड़ने का सबसे तेज और अच्छा तरीका है, सीधे काम पर लग जाना.

काउंसलिंग और जॉब फेयर से मिल सकती है मदद

बर्लिन आधारित वर्क फॉर रिफ्यूजी प्रोजेक्ट शरणार्थियों को मुफ्त में काउंसलिंग, सीवी वर्कशॉप और नौकरी दिलाने में मदद करता है. यह प्रोजेक्ट महिलाओं के लिए बने खास कार्यक्रमों से भी लोगों को जोड़ता है और बड़े पैमाने पर जॉब फेयर भी आयोजित करता है, जैसे टेगेल में बने शरणार्थी आवास में.

टेंट डॉएचलांड नाम का एनजीओ भी जॉब फेयर आयोजित करता है. जिसके पास 80 कंपनियों का नेटवर्क है, जो शरणार्थियों को नौकरी, ट्रेनिंग और मेंटरशिप के जरिए रोजगार से जोड़ता है. इनमें कुछ प्रोग्राम तो खासतौर पर महिलाओं के लिए ही बनाए गए हैं.

जर्मनी: सिर्फ योग्यता नहीं, सामाजिक हैसियत से तय होती सफलता

2015 में शुरू किया गया रे-डी स्कूल ऑफ डिजिटल इंटीग्रेशन डिजिटल स्किल्स की ट्रेनिंग देता है. 2016 में बर्लिन में लॉन्च हुए इस स्कूल में स्थानीय लोग, प्रवासी और शरणार्थी, खासकर टेक में दिलचस्पी रखने वाले यहां पढ़ाई के साथ-साथ टेक लीडर्स और पूर्व छात्रों के नेटवर्क से भी जुड़ने का मौका पाते हैं.

इसी तरह के मेल जोल के मौके ने सीरिया से 2022 में ह्यूमैनिटेरियन वीजा पर आई 30 वर्षीय हाला यूनिस का करियर फिर से शुरू करने में मदद की थी. पहले वह टीचर थी, और अब जालांडो नामक ऑनलाइन फैशन प्लेटफार्म में कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजर हैं. हाला कहती हैं, "यह जगह विदेश से आने वाले लोगों, शरणार्थियों और एक जैसी मुश्किलों से जूझ रहे लोगों के लिए एक समुदाय जैसा था. इससे एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और समर्थन बढ़ता है और आप खुद को अकेला महसूस नहीं करते हैं.”

कुछ स्थानीय प्रोजेक्ट और संगठन उन महिलाओं द्वारा भी चलाए जाते हैं, जो खुद भी शरणार्थी रह चुकी हैं, जैसे अफसान अफराज और इना गिसा. उनके अपने अनुभव उन्हें महिलाओं की परेशानियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद करते हैं.

खुद दोन्या भी अब अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं. अफराज बताती हैं, "दोन्या समर्थ हैं और दूसरी महिलाओं की मदद कर रही हैं. यह बहुत जरूरी है कि हम सब एक इंसानियत के नाते एक-दूसरे की मदद करें.”

*गोपनीयता के लिए नाम बदले गए है

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