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डी-डे: दूसरे विश्व युद्ध के दौरान महिलाएं कहां थीं, क्या कर रही थीं

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बालिग हुईं ब्रिटिश महिलाओं से अगर आप पूछें कि जंग के दौरान वो क्या कर रही थीं, तो अक्सर जवाब मिलेगा: बहुत कुछ.

डी-डे: दूसरे विश्व युद्ध के दौरान महिलाएं कहां थीं, क्या कर रही थीं
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बालिग हुईं ब्रिटिश महिलाओं से अगर आप पूछें कि जंग के दौरान वो क्या कर रही थीं, तो अक्सर जवाब मिलेगा: बहुत कुछ. ये महिलाएं यकीनन बहुत कुछ कर रही थीं.6 जून को डी-डे की 80वीं सालगिरह है. ठीक आठ दशक पहले 6 जून 1944 को मित्र देशों की सेनाएं उत्तर-पश्चिम फ्रांस के नॉरमांडी तट पर उतरीं और नाजी सेना पर हमला कर दिया. इस निर्णायक लड़ाई की राह पर आगे बढ़कर यूरोप को मुक्त कराया जा सका और जर्मनी में नाजी शासन को खत्म किया जा सका.

आमतौर पर सशस्त्र सेनाएं ऑपरेशन की शुरुआत को 'डे डे' कहा करती थीं. डी-डे इसी का छोटा रूप है. वैसे तो नॉरमांडी की लड़ाई का कोडनेम ऑपरेशन ओवरलॉर्ड था, लेकिन यह जंग इतनी निर्णायक और ऐतिहासिक बन गई कि इसके लिए आमतौर पर डी-डे ही प्रचलित हो गया.

जीत में लाखों महिलाओं का योगदान

डी-डे का इतिहास अक्सर बहादुरी से मोर्चे पर लड़ने वाले पुरुषों की कहानियों की मार्फत सुनाया जाता है. कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन के मुताबिक, इस दिन मित्र देशों के 4,400 से ज्यादा सैनिक मारे गए. 5,800 से ज्यादा सैनिक घायल या लापता हो गए.

लेकिन परदे के पीछे सेना की हजारों महिलाएं भी थीं, जिन्होंने नॉन-कॉम्बैट भूमिकाओं में बड़ा योगदान दिया. महिलाओं को मोर्चे पर जाकर लड़ने की मनाही थी, लेकिन उन्होंने कई तरीकों से मदद कर मित्र देशों की कामयाबी सुनिश्चित की.

महिलाएं कोडब्रेकर थीं. वे रेडार चलाती थीं. रेडियो ऑपरेटर थीं. मानचित्र बनाती थीं. जहाजों के नेविगेशन की जानकारी और दुश्मन जहाजों की लोकेशन बताती थीं. वे वेल्डिंग करती थीं, मैकेनिक थीं, फसलें उगाती थीं, कारखानों में मजदूरी करती थीं, नर्स बनकर मरहम-पट्टी करती थीं, दमकल विभाग की आंख-कान का जिम्मा उठाती थीं. हालांकि, इन महिलाओं की भूमिका और अहम योगदान की अक्सर अनदेखी होती आई है.

"डी-डे के रोज मैं बड़ी हो गई"

ऐसी ही एक महिला थीं 17 साल की मैरी स्कॉट. वह इंग्लैंड में मौजूद मित्र देशों के कमांडरों और नॉरमांडी तट पर लड़ रही फोर्सेज के बीच संदेश और जानकारियां भेजा करती थीं. विमिन्स रॉयल नेवल सर्विस में काम करने के अपने अनुभव के बारे में उन्होंने हाल ही में बताया, "आप युद्ध की सच्चाई महसूस करते हैं, समझते हैं कि इसमें क्या चीजें जुड़ी होती हैं. युद्ध कोई शब्द भर नहीं है. यह एक गतिविधि है, जो हजारों-लाखों लोगों पर असर डालती है."

डी-डे को याद करते हुए उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि उस दिन मैं बस एक अल्हड़ सी 17 साल की लड़की नहीं रही, बड़ी हो गई. ईमानदारी से कहूं, तो मुझे लगता है कि मैं डी-डे के रोज बड़ी हो गई." युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों की सेनाओं में 11 लाख से ज्यादा महिलाएं शामिल थीं. इनमें 6,40,000 महिलाएं ब्रिटेन में थीं, जहां नाजी सेनाओं के हमले का बड़ा खतरा था.

आगे चलकर ब्रिटेन की महारानी बनीं प्रिंस एलिजाबेथ ने भी ब्रिटिश सेना की महिला शाखा 'ऑक्जिलियरी टेरिटोरियल सर्विस' में मैकेनिक और चालक का प्रशिक्षण लिया. महिलाओं की भर्तियों के लिए जारी किए गए पोस्टर सामान्य, लेकिन प्रभावी थे. इनपर लिखा जाता था कि सेना में शामिल होने और मदद करने वाली भूमिकाएं संभाल कर महिलाएं, पुरुषों को मोर्चे पर दायित्व पूरा करने के लिए पूरा समय दे सकती हैं.

अर्थव्यवस्था को भी संभाला

तकनीकी तौर पर महिलाओं को कॉम्बैट में शामिल नहीं होने दिया गया, लेकिन सैन्य सेवा से जुड़ीं 800 से ज्यादा ब्रिटिश महिलाएं युद्ध के दौरान मारी गईं. जो सेना में शामिल नहीं हुईं, उन महिलाओं के लिए भी युद्ध में योगदान देने के कई मौके थे. पुरुष मोर्चे पर लड़ने गए थे, ऐसे में अर्थव्यवस्था को चलाए रखने की जिम्मेदारी महिलाओं ने संभाली.

लाखों की संख्या में महिलाओं ने युद्ध का सामान बनाने वाले कारखानों में काम किया. खेती की. लंदन की अंधेरी सड़कों पर मोटरसाइकिल चलाकर वो दमकल विभाग को बमबारी से हुए ताजा नुकसानों के बारे में अपडेट दिया करती थीं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कुल मिलाकर करीब 70 लाख ब्रिटिश महिलाओं ने किसी ना किसी तरह अपने देश की मदद की.

जापान में दूसरे विश्व युद्ध का इतिहास

लंदन के सेंट्रल वॉर मेमोरियल में एक प्रतिमा लगाकर उन महिलाओं के योगदान और त्याग को सम्मानित किया गया. इस कांस्य प्रतिमा पर 17 अलग-अलग यूनिफॉर्म लगे हैं. ये सभी यूनिफॉर्म उन भूमिकाओं को रेखांकित करते हैं, जिन्हें युद्ध के दौरान महिलाओं ने संभाला और युद्ध के बाद पुरुषों के लौटने पर इनका त्याग कर दिया. इनमें ऑक्जिलियरी टेरिटोरियल सर्विस, विमिन्स ऑक्जिलियरी एयर फोर्स और विमिन्स रॉयल नेवल सर्विस की वर्दियों के अलावा पुलिस यूनिफॉर्म, नर्स के कपड़े और वेल्डिंग करते समय लगाया जाने वाला मास्क शामिल है.

महिलाओं को साथ जोड़ने का मित्र देशों का फैसला एक अहम सामरिक निर्णय साबित हुआ. नाजी जर्मनी में स्थितियां अलग थीं. वहां प्रशासन कामगारों से जबरदस्ती श्रम करवाने पर अधिक निर्भर था. नॉत्रे डैम यूनिवर्सिटी में इतिहासकार इयान जॉनसन बताते हैं, "ये सहयोगी भूमिकाएं वो बढ़त बनाने में अहम रहीं, जिनसे मित्र देशों को जीतने में मदद मिली."

एसएम/सीके (एपी)

(The above story first appeared on LatestLY on Jun 06, 2024 07:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).