World's First Human Spinal Cord Implant: इजराइल एक ऐसा मेडिकल चमत्कार करने की तैयारी में है जिसका सपना दुनिया भर के लाखों लोग देख रहे हैं. वैज्ञानिक पहली बार किसी इंसान की रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) का इम्प्लांट करने जा रहे हैं. यह एक ऐसी सफलता हो सकती है जिससे लकवा या पैरालाइसिस के शिकार मरीज फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे और चल पाएंगे.
तेल अवीव यूनिवर्सिटी ने घोषणा की है कि यह ऐतिहासिक सर्जरी अगले कुछ महीनों में इजराइल में ही की जाएगी. सबसे खास बात यह है कि इस इम्प्लांट को बनाने के लिए मरीज की अपनी ही कोशिकाओं (सेल्स) का इस्तेमाल किया जाएगा.
आखिर यह इतनी बड़ी बात क्यों है?
दुनिया भर में करोड़ों लोग रीढ़ की हड्डी में चोट लगने की वजह से पैरालाइज्ड हैं. यह चोटें ज्यादातर सड़क हादसों, ऊंचाई से गिरने या किसी हमले की वजह से लगती हैं.
हमारी रीढ़ की हड्डी एक बिजली के तार की तरह है, जो दिमाग से शरीर के सभी हिस्सों तक सिग्नल भेजती है. जब किसी चोट की वजह से यह 'तार' कट जाता है, तो कनेक्शन टूट जाता है. सिग्नल आगे नहीं जा पाता और चोट के नीचे का हिस्सा काम करना बंद कर देता है, जिसे हम लकवा या पैरालाइसिस कहते हैं.
अब तक इसका कोई पक्का इलाज नहीं था. शरीर के ज्यादातर अंग अपनी मरम्मत खुद कर लेते हैं, लेकिन रीढ़ की हड्डी खुद को ठीक नहीं कर पाती.
नई तकनीक कैसे काम करेगी?
इस नई तकनीक को तेल अवीव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टैल डीविर और उनकी टीम ने विकसित किया है. यह प्रक्रिया बहुत ही अनोखी है और इसे कुछ आसान स्टेप्स में समझा जा सकता है:
- सैंपल लेना: सबसे पहले, मरीज के शरीर से खून और फैट (चर्बी) का सैंपल लिया जाता है.
- स्टेम सेल बनाना: खून की कोशिकाओं को लैब में स्टेम सेल जैसी कोशिकाओं में बदला जाता है. ये ऐसी जादुई कोशिकाएं होती हैं जो शरीर का कोई भी हिस्सा बन सकती हैं.
- ढांचा तैयार करना: मरीज के फैट टिश्यू से एक खास तरह का जेल (हाइड्रोजेल) बनाया जाता है, जो एक ढांचे का काम करता है.
- नया टिश्यू बनाना: फिर इन स्टेम सेल्स को इस जेल के ढांचे पर विकसित करके एक नया स्पाइनल कॉर्ड टिश्यू तैयार किया जाता है, जो बिल्कुल असली जैसा होता है.
- इम्प्लांट करना: आखिर में, इस लैब में बने टिश्यू को सर्जरी के जरिए मरीज की रीढ़ की हड्डी में उस जगह लगा दिया जाता है, जहां चोट लगी थी. यह टूटा हुआ कनेक्शन फिर से जोड़ देता है.
जानवरों पर हुए ट्रायल में इसके शानदार नतीजे मिले हैं. जिन चूहों को यह इम्प्लांट लगाया गया, वे फिर से सामान्य रूप से चलने-फिरने लगे थे.
अब इंसानों पर होगी पहली कोशिश
इजराइल के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस तकनीक के इंसानों पर ट्रायल के लिए मंजूरी दे दी है. शुरुआत में इसे 8 मरीजों पर आजमाया जाएगा.
इस तकनीक को दुनिया तक पहुंचाने वाली कंपनी 'मैट्रिसेल्फ' के सीईओ गिल हकीम ने कहा, "यह सिर्फ एक वैज्ञानिक सफलता नहीं है, बल्कि यह उन मरीजों के लिए उम्मीद की किरण है, जिनकी बीमारी को अब तक लाइलाज माना जाता था. अगर यह सफल रहा, तो यह स्पाइनल कॉर्ड की चोट के इलाज का तरीका हमेशा के लिए बदल देगा."
प्रोफेसर डीविर ने कहा, "हमारा लक्ष्य पैरालाइज्ड मरीजों को उनकी व्हीलचेयर से उठाना है. जानवरों पर ट्रायल बहुत सफल रहे और हमें उम्मीद है कि इंसानों पर भी उतने ही अच्छे नतीजे मिलेंगे." यह वाकई में विज्ञान की दुनिया का एक बहुत बड़ा कदम है, जो लाखों लोगों की जिंदगी बदल सकता है.












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