करीब बीस महीनों की राजनीतिक उथल-पुथल और हिंसा के बाद आखिर बांग्लादेश ने स्थिर सरकार के लिए संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) पर ही भरोसा जताया है. इन नतीजों से भारत ने भी कुछ राहत की सांस ली है.12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले देश में बीएनपी और जमात के नेतृत्व वाले दोनों गठबंधनों के बीच बराबर की टक्कर की बात कही जा रही थी. अंतरिम सरकार की ओर से पाबंदी लगने के कारण अवामी लीग इस बार मैदान में नहीं थी. लेकिन लोगों ने जमात जैसी कट्टरपंथी ताकत की बजाय पहले भी स्थिर सरकार दे चुकी बीएनपी को ही चुना.
इस तथ्य के बावजूद कि उसकी सबसे प्रमुख नेता रहीं खालिदा जिया का बीते दिसंबर में निधन हो गया था और उनके पुत्र तारिक रहमान 17 साल तक निर्वासन में लंदन रहने के बाद 25 दिसंबर को ही ढाका लौटे थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बीएनपी को उसकी जीत की बधाई देते हुए दोनों देशों के बीच संबंधों की मजबूती की उम्मीद जताई है.
जमात-ए-इस्लामी के उभार के बावजूद बीएनपी को मिली जीत
लेकिन आखिर जमात-ए-इस्लामी के मजबूती से उभरने और जुलाई, 2024 के आंदोलन के जरिए शेख हसीना सरकार का तख्तापलट करने वाले युवाओं की ओर से बनी नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) से गठजोड़ के बावजूद लोगों ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) पर ही भरोसा क्यों जताया है? वह भी तब जब उसके प्रमुख तारक रहमान कोई 17 साल बाद बीते दिसंबर यानी चुनाव से महज डेढ़ महीने पहले ही स्वदेश लौटे थे.
इस सवाल का जवाब कोई मुश्किल नहीं है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोगों ने जमात जैसी कट्टरपंथी ताकत की बजाय आजमाई हुई राजनीतिक पार्टी पर ही भरोसा जताया है.
ढाका के एक कालेज में प्रोफेसर रहे खलील रहमान डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीएनपी का राजनीतिक इतिहास और विरासत समृद्ध रही है. लेकिन जमात या एनसीपी के पास न तो ऐसा कोई इतिहास है और न ही सरकार चलाने का अनुभव. बीते डेढ़ साल से ज्यादा समय से राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा से जूझ रहे लोगों ने स्थायित्व के लिए बीएनपी पर ही भरोसा जताया है. वह पहले भी देश में स्थिर सरकार दे चुकी है."
ढाका में एक सरकारी संस्थान में काम करने वाले रतन दास (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, "जमात और एनसीपी की रैलियों में भीड़ जुटना अलग है. लेकिन मतदान के समय लोगों ने बीएनपी को ही चुना है. अवामी लीग की गैर-मौजूदगी में लोगों के पास यही एकमात्र विकल्प था." वो बताते हैं कि अवामी लीग के वोटरों के एक हिस्से ने भी बीएनपी का समर्थन किया है.
विश्लेषकों का कहना है कि लोग जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन कर 'आसमान से गिर कर खजूर से लटकने' वाली हालत नहीं पैदा करना चाहते थे. यही वजह है कि जमात और एनसीपी को लोगों ने विपक्ष के तौर पर तो पसंद किया लेकिन सत्ता सौंपने से परहेज किया. इस बार बीएनपी और कभी उसकी सहयोगी रही जमात के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच ही सीधा मुकाबला था. अवामी लीग की खाली जगह को भरने के बावजूद लोगों ने जमात गठबंधन का समर्थन नहीं किया.
बीएनपी के साथ भारत के रिश्ते और तारिक रहमान का रवैया
बीएनपी के साथ अतीत में भारत के रिश्ते वैसे मधुर नहीं रहे हैं जैसे शेख हसीना सरकार के कार्यकाल में थे. लेकिन इसके बावजूद जमात जैसी कट्टरपंथी ताकतों के मुकाबले बीएनपी के सत्ता में आने पर भारत ने राहत की सांस ली है. केंद्र को उम्मीद है कि खालिदा जिया के नहीं रहने की स्थिति में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले तारिक रहमान का नजरिया पहले के मुकाबले बदलेगा.
वैसे, तारिक रहमान भी चुनाव से पहले पड़ोसियों से बेहतर संबंध की वकालत करते रहे हैं. हालांकि डॉनल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' की तर्ज पर उन्होंने भी 'बांग्लादेश फर्स्ट' की नीति पर चलने की बात कही है. इसके साथ ही विभिन्न मामलों में फांसी की सजा पाने वाली शेख हसीना का प्रत्यर्पण भी बीएनपी का प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा है.
क्या भारत-विरोध के मुद्दे पर लड़ा जाएगा बांग्लादेश चुनाव?
लेकिन राजनीतिक विश्लषकों का कहना है कि कोई भी नई सरकार महज किसी एक मांग पर अड़ कर पड़ोसी देशों से संबंध और बिगाड़ने का खतरा मोल नहीं लेगी. खासकर जब वह देश बेहद संवेदनशील राजनीतिक दौर से गुजर रहा हो और बीते डेढ़ साल से ज्यादा वक्त तक वो हिंसा और अस्थिरता की चपेट में रहा हो.
बीएनपी के नेताओं का भी कहना है कि द्विपक्षीय संबंध शेख हसीना के मुद्दे से ऊपर उठ कर आगे बढ़ने चाहिए और किसी एक राजनीतिक दल से बंधे नहीं होने चाहिए.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही बीएनपी पहले सत्ता में रहने के दौरान भारत से रिश्ते मधुर नहीं रहे हों, लेकिन पार्टी के नेता तारिक रहमान के हालिया बयान और 2026 के चुनाव घोषणापत्र से पार्टी की रवैए में व्यवहारिक बदलाव के संकेत मिले हैं.
बांग्लादेश को लेकर भारत की सबसे बड़ी चिंताएं क्या हैं
बीएनपी ने भारत के साथ संबंधों की बेहतरी के साथ ही सीमावर्ती इलाके में झड़पों और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के हाथों कथित हत्याओं और घुसपैठ जैसे संवेदनशील मुद्दों के समाधान पर जोर दिया है.
अगस्त, 2024 में हसीना सरकार के पतन के बाद देश में अल्पसंख्यकों पर बड़े पैमाने पर होने वाले अत्याचारों, हमलों और हत्याओं पर दोनों देशों में तनातनी रही है. अब बीएनपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मुहैया कराने का भरोसा दिया है.
भारत के लिए सुरक्षा की सबसे बड़ी चिंता पूर्वोत्तर इलाका है. हसीना सरकार के कार्यकाल में इलाके के उग्रवादियों को बांग्लादेश की जमीन के इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी. लेकिन खालिदा जिया की सरकार के कार्यकाल में पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों के लिए बांग्लादेश एक सुरक्षित शरणस्थली बन गया था.
अंतरिम सरकार समेत जमात जैसी कट्टरपंथी ताकतों ने पूर्वोत्तर भारत में दिलचस्पी लेते हुए कई बयान दिए हैं. अब बीएनपी सरकार से भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा के मामले में आपसी सहयोग मजबूत करने की उम्मीद होगी.
क्या बीएनपी सरकार संभाल पाएगी भारत, चीन और पाकिस्तान के साथ रिश्ते
दोनों देशों के आपसी कारोबार के लिए भी बांग्लादेश में बीएनपी का सत्ता में होना भारत के लिए फायदेमंद हो सकता है. बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी रहा है. लेकिन वहां हुए आंदोलन के बाद यह कारोबार रिकार्ड निचले स्तर पर है.
बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान ने अपने हालिया बयानों में कहा है कि पार्टी बांग्लादेश की स्वतंत्रता और संप्रभुता की दृढ़तापूर्वक रक्षा करते हुए सामूहिक प्रगति के लिए पड़ोसियों के साथ संबंध मजबूत करेगी. उन्होंने चुनाव से ठीक पहले अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि पड़ोसियों के साथ संबंध 'समानता, सहयोग और मित्रता' पर आधारित होंगे.
पार्टी ने भारत के साथ तीस्ता और पद्मा नदियों के पानी के बंटवारे जैसे दशकों पुराने कई मुद्दों के समाधान की दिशा में ठोस पहल का भी भरोसा दिया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बांग्लादेश में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती अहमियत भारत के लिए विशेष चिंता का कारण है. अब नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद सरकार इन संबंधों में किसी बदलाव पर नजदीकी निगाह रख रही है.
जमात के सत्ता में आने की स्थिति में भारत को सीमा पार से घुसपैठ समेत विभिन्न मोर्चों पर और ज्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ सकता था. लेकिन बीएनपी के चुनावी घोषणापत्र और तारिक रहमान के बयानों ने दोनों देशों के संबंधों में आई गिरावट को दूर कर इसे मजबूत करने की उम्मीद जगाई है.
दिल्ली में विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "फिलहाल इस मुद्दे पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी. हम 'इंतजार करो और देखो' की नीति पर आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन बीएनपी के सत्ता में आने के कारण संबंधों में बेहतरी की उम्मीद तो बढ़ी है."
बांग्लादेश: ‘पुतुल’ से बेगम जिया तक का उतार-चढ़ाव भरा सफर
विश्लेषकों का अनुमान है कि बीएनपी सरकार भारत, चीन और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को संतुलित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ा सकती है. देश में जमात के सत्ता में आने पर सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को बड़ा खतरा पैदा हो सकता था. हालांकि विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरने के कारण यह आशंका कुछ हद तक बनी रहेगी.
बीते पांच दशकों से बांग्लादेश के राजनीतिक उतार-चढ़ाव को करीब से देखने वाले और 1971 का मुक्ति युद्ध कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक तापस मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहते हैं, "दोनों देशों के आपसी संबंध जिस स्तर तक पहुंच गए हैं वहां से उनकी बेहतरी में समय जरूर लगेगा. लेकिन यह मुश्किल नहीं है. आपसी संबंधों की बेहतरी दोनों देशों के हित में है. खासकर चीन और पाकिस्तान की बढ़ती अहमियत के कारण भारत के लिए अपने सुरक्षा हितों को ध्यान में रखना जरूरी है."













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