चैट जीपीटी जैसे जेन एआई के ज्यादा इस्तेमाल से दिमाग कमजोर होने का डर
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

ईमेल लिखने से लेकर, कंप्यूटर कोड, अनुवाद या फिर यात्रा की योजना बनाने में जेनरेटिव एआई चैटबॉट का जम कर इस्तेमाल होने लगा है. जितनी आसानी से वे हमारी मदद करते हैं उतनी ही आसानी से हमारे दिमाग को मंद कर सकते हैं.चैट जीपीटी या क्लाउड जैसे जेनरेटिव एआई सामान्य भाषा में दिए प्रॉम्प्ट पर ऐसे जवाब देने में सक्षम हैं जिनका जिनका इस्तेमाल हम और आप कर सकते हैं. इनका असर स्कूल और यूनीवर्सिटी, काम की जगहों, दफ्तरों और अदालत ही नहीं बल्कि निजी जिंदगी में भी महसूस हो रहा है.

हाल ही में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि संज्ञानात्मक (जिनमें दिमाग का उपयोग होता है) कामों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंससे कराने के नुकसानदेह नतीजे हो सकते हैं. वैज्ञानिकों ने ध्यान दिलाया है कि खासतौर से याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और आलोचनात्मक सोच पर बड़ा खतरा है.

खुद से कोशिश करने की क्षमता घटी

1,222 लोगों पर हुए एक अमेरिकी-ब्रिटिश अध्ययन में पता चला है कि एआई टूल के इस्तेमाल से अंकगणित के सवालों को हल करना या फिर रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन के अभ्यास में थोड़े समय के लिए भागीदार का प्रदर्शन बेहतर होता है, हालांकि लंबे समय में नतीजे गिरने लगते हैं और साथ ही टूल के मौजूद नहीं रहने पर खुद से कोशिश करने की इच्छा भी घट जाती है.

रिसर्चरों ने कहा है, "ये नतीजे खासतौर से चिंताजनक हैं क्योंकि किसी कौशल को सीखने के लिए जिद या दृढ़ता की जरूरत बेहद बुनियादी है और यह लंबे समय तक सीखने के सबसे मजबूत संकेतकों में से एक है."

कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के डॉक्टोरल छात्र ग्रेस लियु इस रिसर्च रिपोर्ट के प्रमुख लेखक हैं. उनका कहना कि हर तरह के सवालों का तेजी से जवाब देने की एआई क्षमता यूजरों के "सीखने के अवसर को कम कर देती है."

लियु ने यह भी कहा, "एआई का टूल किसी खास तरह की गतिविधि के लिए डिजाइन नहीं किया गया है. इसे हर तरह के बुद्धिमत्ता से जुड़े, तार्किक और संज्ञानात्मक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जो इसे खासतौर से चिंताजनक बनाती है."

अलग अलग तरह की समस्याओं के लिए यह तकनीकी रूप से ढल जाने में सक्षम है. यही खूबी इसे कंप्युटर से मिलने वाली सहायता से अलग करती है. उदाहरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर यूजर को समीकरणों को हल करने में मदद दे सकते हैं लेकिन हल करने का तरीका और तार्किक प्रक्रिया इंसानी दिमाग में ही होती है. एआई में यह बात नहीं है.

मेहनत बचाने की प्रवृत्ति

2025 में एमआईटी की एक स्टडी के नतीजे में बताया गया कि जो छात्र जेनरेटिव एआई का इस्तेमाल लेख लिखने के लिए कर रहे हैं उनकी आलोचनात्मक सोच की क्षमता घट रही है. एक और रिसर्च ने भी इसी तरह की जानकारी दी थी और जो कुछ हो रहा है उसे "संज्ञानात्मक बोझ हटाना" या "संज्ञानात्मक समर्पण" कहा था. कुल मिला कर वह स्थिति जिसमें दिमाग काम करना बंद या कम कर देता है.

फ्रांस की सरकारी रिसर्च संस्थान सीएनआरएस इंस्टीट्यूशन के योआन श्वालेर का कहना है, "इंसानों में ऊर्जा बचाने की मजबूत प्रवृत्ति होती है." उन्होंने समझाया, "रोजमर्रा के काम में हम अकसर वैसी रणनीति अपनाते हैं जो उस काम को जल्दी से पूरा करा दे, गहरे अध्ययन और उससे मिली जानकारियों को प्रोसेस करने में ज्यादा समय लगाए बिना यह काम करे क्योंकि संज्ञानात्मक रूप से यह कठिन होगा."

जेनरेटिव एआई इस प्रवृति को मजबूत कर सकता है. उन्होंने कहा, "अगर ऐसी गतिविधियां आप कभी नहीं करेंगे तो दिमाग जो ऊर्जा बचा कर काम करता है, वो उन संपर्कों को बनाए रखने के प्रयास नहीं करेगा जिनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है."

उत्साहजनक आभास

आलोचकों के दबाव में जेनरेटिव एआई डेवलपर कथित "सोक्रैटिक" फंक्शन यानी प्रश्नों के माध्यम से सीखने की व्यवस्था कर रहे हैं जिनका लक्ष्य खासतौर से छात्र हैं.

इस मोड में चैटबॉट सरलता से सीधे जवाब नहीं देते बल्कि संकेत या सूत्र देते हैं और ऐसे सवाल पूछते हैं जो यूजर के सोचने को बढ़ावा देता है. इसके उदाहरणों में ओपेन एआई का चैटजीपीटी का "स्टडी मोड" और गूगल जेमिनाइ का "गाइडेड लर्निंग" शामिल है. अमेरिकी सॉफ्टवेयर दिग्गज माइक्रोसॉफ्ट ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि उसने अपने कोपायलट मॉडलों में गलती के जोखिम के लिए चेतावनी को शामिल किया है. एआई अपनी ओर से यूजर को दी गई जानकारी को परखने की याद दिलाते हैं. यह सब इसलिए किया गया है ताकि यूजर सक्रिय रहें और जवाबों की आलोचनात्मक समीक्षा करते रहें.

माइक्रोसॉफ्ट का कहना है, "संज्ञानात्मक बोझ को अत्यधिक हटाने का जोखिम वास्तविक है, खासतौर से अगर एआई का इस्तेमाल उन कामों को स्वचालित करने के लिए होने लगे जो कौशल के विकास के लिए जरूरी हैं." माइक्रोसॉफ्ट ने यह भी कहा है कि यूजरों को टूल का इस्तेमाल सही तरीके से करने के लिए ट्रेनिंग देनी होगी.

रिसर्चर इस बात पर सहमत हैं कि बड़े पैमाने पर लंबे समय के लिए अध्ययन नहीं हुए हैं जो बता सकें कि नई तकनीक का इंसान के दिमाग पर क्या असर हो रहा है. श्वालेर का कहना है कि जब तक यह उपलब्ध नहीं हो जाता, "यह हम पर है कि हम एआई का इस्तेमाल चतुराई से करें. हम इस तकनीकी क्रांति के हिसाब से भी खुद को ढाल लेंगे जैसा कि हमने पहले किया है."