सोनम वांगचुक का आमरण अनशन जारी; प्रदर्शनकारियों की न तो सरकार सुन रही है और न ही विपक्ष, आखिर क्यों?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक और छात्र नेताओं की तबीयत बिगड़ रही है.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक और छात्र नेताओं की तबीयत बिगड़ रही है. सरकार ने बातचीत की कोई पेशकश नहीं की है. विपक्ष, खासकर कांग्रेस भी इस आंदोलन का हिस्सा नहीं बनी. आखिर क्या है इसकी वजह?दिल्ली के जंतर-मंतर पर बीते कई हफ्तों से सरकार की शिक्षा नीति और पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं. एक ओर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के मंच से सोनम वांगचुक, तो दूसरी ओर उसी जंतर-मंतर पर वामपंथी छात्र संगठनों के कई छात्र भी आमरण अनशन पर बैठे हैं. वहीं देश भर में कांग्रेस पार्टी के छात्र और युवा संगठन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर ‘छात्रों की गूंज' नाम से प्रदर्शन कर रहे हैं. यानी मुद्दे एक हैं, लेकिन रास्ते अलग हैं.
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक और अन्य लोग 28 जून से ही आमरण अनशन पर हैं. भीषण गर्मी और बीच-बीच में हो रही बरसात की वजह से मौसम में हो रही उमस के बीच गुरुवार को उनकी भूख हड़ताल 19वें दिन में प्रवेश कर गई है. इस बीच, सोनम वांगचुक और अन्य छात्रों से भूख हड़ताल खत्म करने की भी अपील की जा रही है. इन सबके बावजूद, अब तक सरकार का कोई नुमाइंदा अनशनकारियों से बात तक करने नहीं पहुंचा. वहीं, जंतर-मंतर पर आकर प्रत्यक्ष समर्थन न देने को लेकर विपक्षी पार्टियों पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.
यहां तक कि दो दिन पहले सोनम वांगचुक ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे विपक्षी नेताओं से अपने युवा-नेतृत्व वाले आंदोलन में शामिल होने का आग्रह भी किया और कहा कि यदि बड़े नेता जनहित के मुद्दों पर आगे नहीं आते हैं, तो जनता इसे पसंद नहीं करेगी और इसे उनकी संकीर्ण सोच माना जाएगा.
कांग्रेस पार्टी का रुख
कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी इन मुद्दों को पूरा समर्थन दे रही है, यहां तक कि पार्टी खुद भी देश भर में आंदोलन कर रही है, ऐसे में इन सवालों का कोई मतलब नहीं है.
क्या सीजेपी की देखादेखी युवाओं के मुद्दे उठा रही है कांग्रेस
डीडब्ल्यू से बातचीत में सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, "सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत हम सभी के लिए चिंता का विषय है. कांग्रेस उनके साथ खड़ी है और हर उस नागरिक के साथ है जो इन मुद्दों पर संघर्ष कर रहा है. अपने नेता राहुल गांधी के निर्देश पर देश भर में पार्टी का युवा और छात्र सड़कों पर उतरा है. शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहा है. तो असली सवाल तो सरकार से पूछने का है, कांग्रेस पार्टी या राहुल गांधी से सवाल पूछने का क्या मतलब है?”
दरअसल, नीट परीक्षा में पेपर लीक के बाद से ही कांग्रेस पार्टी लगातार इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन कर रही है और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रही है. पार्टी संसद में भी सरकार को घेरने की तैयारी कर रही है और पूरा इंडिया गठबंधन भी इस मामले में एक साथ है. चूंकि जंतर-मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारी भी सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग उठा रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये सभी एक मंच पर क्यों नहीं हैं?
दूसरी बात यह भी है कि कॉकरोच जनता पार्टी खुद को राजनीतिक पार्टी और इस आंदोलन को राजनीतिक आंदोलन भले ही न बता रही हो लेकिन आंदोलन के पीछे आम आदमी पार्टी की भूमिका को देखा जा रहा है. यही नहीं, ये आशंकाएं भी जताई गईं कि पेपर लीक को लेकर देश भर में सरकार के खिलाफ जो माहौल बना, उसे कमजोर करने के लिए सरकार ने ही इस आंदोलन को परोक्ष रूप से प्रायोजित किया है ताकि विरोध की आवाजें यदि दब न सकें तो बंट जरूर जाएं. कॉकरोच जनता पार्टी को सरकार विरोधी प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर पर जगह देना, इसके इन आशंकाओं के पीछे सबसे मजबूत तर्क के रूप में पेश किया जा रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार झा कहते हैं, "अब तक हमने देखा है कि आंदोलन से नेता निकलता है, लेकिन यदि नेता पहले पैदा हो जाए और फिर वही नेता आंदोलन शुरू कर दे, तो ये अपने आप में संदिग्ध है. राहुल गांधी धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लेने की स्थिति में तो हैं नहीं. लेकिन यदि वो इस मुद्दे पर खामोश हों, तब तो विपक्ष के नेता के तौर पर उनकी आलोचना होनी चाहिए. पर ऐसा है नहीं. दरअसल, इस तरह के नैरेटिव उस फासीवादी संस्कृति का हिस्सा हैं जिनमें यह सवाल पूछा जाता है कि विपक्ष क्या कर रहा है. जबकि सवाल सरकार से होना चाहिए कि कोई मंत्री, कोई बड़ा नेता वहां क्यों नहीं जा रहा है.
समर्थन मांगने पर ही सवाल
संजय कुमार झा कहते हैं कि सत्याग्रह देश में पहली बार तो हो नहीं रहा है. पहले भी हुआ है लेकिन विपक्षी दलों से समर्थन की अपील करने का कोई औचित्य नहीं है. उनके मुताबिक, "गांधी कभी इस बात को लेकर नहीं रोए कि कौन उनका समर्थन कर रहा है, कौन नहीं कर रहा है. इस आंदोलन की नीयत और प्रक्रिया पर सवाल शुरू से है. विपक्ष तो इन मुद्दों पर पहले से ही आंदोलन कर रहा था, तो ऐसे में आपको उसे मजबूत करना चाहिए था.”
संजय कुमार झा इसके पीछे सोनम वांगचुक की बीजेपी समर्थित पृष्ठभूमि को भी वजह बताते हैं. वो कहते हैं, "सोनम वांगचुक शुरू से बीजेपी समर्थक रहे हैं. मंत्रियों को शुभकामनाएं देते रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में वहां की भावनाओं के खिलाफ बीजेपी को समर्थन देते रहे हैं. तो ऐसे में विपक्ष को भी ये लग रहा होगा कि कहीं उसके आंदोलन को उलझाने या भ्रम पैदा करने की बीजेपी की कोशिश तो नहीं है.”
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दरअसल, इन्हीं मुद्दों पर और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर उसी जंतर-मंतर पर कुछ वामपंथी संगठनों के छात्र भी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और धरने पर बैठे हैं. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा समेत पांच छात्र भी 28 जून से ही आमरण अनशन पर भी हैं लेकिन उनकी चर्चा कम होती है. यहां तक कि सीजेपी के कार्यकर्ताओं के साथ प्रदर्शन के मुद्दे पर विवाद भी हुआ था.
जंतर मंतर पर आइसा की एक कार्यकर्ता रक्षिका ने पिछले हफ्ते डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "ये लोग तो पहले हम लोगों को बैठने ही नहीं दे रहे थे लेकिन बाद में इन्हें पीछे हटना पड़ा. हमारे प्रदर्शन के बाद युवाओं और छात्रों की भागीदारी भी बढ़ी है. लेकिन मुद्दा ये नहीं है. असली मुद्दा ये है कि हम सब सरकार की शिक्षा नीति, पेपर लीक, धांधली जैसी चीजों के खिलाफ हैं और इस विरोध में हम सबके साथ हैं.”
जंतर-मंतर पर ही कई और भूख हड़ताल
डीडब्ल्यू से बातचीत में पिछले 19 दिन से भूख हड़ताल पर बैठीं आइसा अध्यक्ष नेहा बोरी कहती हैं, "हमारे एक साथी को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है. भूख हड़ताल को 18 दिन हो गए हैं और हमारे वाइटल्स लगातार गिर रहे हैं. इसके बावजूद, न तो हम अपनी हिम्मत से डिगे हैं और न ही अपनी मांगों से. यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हो जाता.”
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लेकिन सरकार की ओर से अब तक इन प्रदर्शनों और आमरण अनशन को खत्म कराने की अब तक कोई कोशिश नहीं की गई है. ये बड़ा सवाल है कि आखिर सरकार इतने संवेदनशील मामले में इतनी निष्क्रिय क्यों है? सरकार की प्रतिक्रिया भी नहीं आई और बीजेपी के नेता और प्रवक्ता इस मुद्दे पर कोई बात भी नहीं करते. बीजेपी के कई प्रवक्ताओं से उनकी पार्टी की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
संजय कुमार झा इसकी वजह बताते हैं, "इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मौजूदा सरकार का मूल चरित्र ही डेमोक्रेटिक नहीं है और हर मुद्दे पर वो ये संदेश देना भी चाहते हैं. वो यही संदेश देना चाहते हैं कि हम जो कहें, आप वही करिए. यानी वन-वे ट्रैफिक. ऐसे में यदि वो दबाव में आने लगेंगे तो उनका एजेंडा फेल हो जाएगा.”
फिलहाल जंतर-मंतर पर सरकार की चुप्पी जितने सवाल खड़े कर रही है, उतने ही सवाल विपक्ष की रणनीति पर भी उठ रहे हैं. ऐसे में यह आंदोलन सिर्फ शिक्षा नीति या पेपर लीक का नहीं, बल्कि मौजूदा विपक्षी राजनीति की सीमाओं और प्राथमिकताओं का भी आईना बन गया है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 16, 2026 07:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

