Who is Jyoti Sunita Kullu? कौन हैं ज्योति सुनिता कुल्लू? 11 साल की उम्र में शुरू की हॉकी, बनीं सबके लिए प्रेरणा

9 सितंबर को ओडिशा के सुंदरगढ़ में जन्मीं इस खिलाड़ी ने अपने शानदार प्रदर्शन से भारतीय हॉकी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उन्होंने 1996 में दिल्ली में इंदिरा गांधी गोल्ड कप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण किया. उनके नेतृत्व, गति और गोल स्कोरिंग स्किल ने उन्हें भारतीय हॉकी में एक प्रेरणा बनाया.

ज्योति सुनिता कुल्लू

Who is Jyoti Sunita Kullu? ओडिशा के सुंदरगढ़ से आने वाली ज्योति सुनिता कुल्लू उन लड़कियों के लिए प्रेरणादायक हैं, जो अपना भविष्य हॉकी में देखती हैं. उन्होंने भारत के लिए खेलते हुए कई टूर्नामेंट में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए, स्वर्ण सहित कई पदक जीते. ज्योति सुनिता कुल्लू को साल 2007 में भारत की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस सम्मान को पाने के बाद उन्होंने इसे अपने लिए बड़ा सम्मान बताया था. 9 सितंबर को ओडिशा के सुंदरगढ़ में जन्मीं इस खिलाड़ी ने अपने शानदार प्रदर्शन से भारतीय हॉकी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उन्होंने 1996 में दिल्ली में इंदिरा गांधी गोल्ड कप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण किया. उनके नेतृत्व, गति और गोल स्कोरिंग स्किल ने उन्हें भारतीय हॉकी में एक प्रेरणा बनाया. 90 के दशक के वो विकेटकीपर, जिन्होंने स्थापित किए आक्रामक बल्लेबाजी में नए आयाम

2002 राष्ट्रमंडल खेल (मैनचेस्टर) में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता. ज्योति ने इस टूर्नामेंट में 4 गोल के साथ टॉप स्कोरर के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया, खासकर दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में दो गोल और न्यूजीलैंड के खिलाफ सेमीफाइनल में गोल करके टीम की जीत में प्रमुख भूमिका अदा की. 2002 राष्ट्रमंडल खेलों में न्यूजीलैंड के खिलाफ उनका एक गोल, जिसमें उन्होंने पांच डिफेंडरों को छकाकर गोलकीपर को हराया, आज भी यादगार है.

ज्योति का जन्म ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के बागबुरा गांव में हुआ था. शुरू में वह एथलेटिक्स में थीं, लेकिन अपने शिक्षक की सलाह पर 11 साल की उम्र में हॉकी खेलना शुरू किया. उन्होंने राउरकेला के पानपोश स्पोर्ट्स हॉस्टल में 5 साल तक प्रशिक्षण लिया और बाद में पंजाब के कपूरथला हॉकी अकादमी में शामिल हुईं.

ज्योति सुनिता कुल्लू ओडिशा और भारतीय महिला हॉकी में एक अग्रणी व्यक्तित्व हैं. उन्होंने पुरुष-प्रधान खेल में महिलाओं के लिए रास्ता बनाया और सुंदरगढ़ जैसे क्षेत्र से अन्य महिला खिलाड़ियों, जैसे दीप ग्रेस एक्का, के लिए प्रेरणा बनीं. उनकी उपलब्धियां और नेतृत्व ने भारतीय महिला हॉकी को वैश्विक मंच पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

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