नई दिल्ली: दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण फसल उत्सवों में से एक 'पोंगल' की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. तमिलनाडु (Tamil Nadu), आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh), कर्नाटक (Karnataka) और केरल (Kerala) जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में पोंगल (Pongal) को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है और इस उत्सव का जश्न चार दिनों तक चलता है. वर्ष 2026 में पोंगल का यह पावन पर्व 14 जनवरी से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा. पोंगल चार दिनों तक चलने वाला एक ऐसा त्योहार है जो तमिल संस्कृति और कृषि परंपराओं का एक खास प्रतीक है. यह त्योहार न केवल नई फसल के आगमन का प्रतीक है, बल्कि यह प्रकृति, सूर्य और पशुधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भी अवसर है. तमिल कैलेंडर के अनुसार, जब सूर्य 'थाई' महीने की शुरुआत में मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब मुख्य पोंगल यानी 'थाई पोंगल' मनाया जाता है. यह भी पढ़ें: January 2026 Vrat And Festivals: मकर संक्रांति, वसंत पंचमी और गणतंत्र दिवस सहित जनवरी में पड़ेंगे कई बड़े व्रत व त्योहार, देखें पूरी लिस्ट
पोंगल 2026: चार दिनों का विस्तृत कार्यक्रम
पोंगल का उत्सव कुल चार दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन का एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है:
- भोगी पोंगल (14 जनवरी 2026, बुधवार): यह उत्सव का पहला दिन है, जो देवराज इंद्र को समर्पित है. इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और पुरानी, अनुपयोगी वस्तुओं को जलाकर नई शुरुआत का संकल्प लेते हैं.
- थाई पोंगल / सूर्य पोंगल (15 जनवरी 2026, गुरुवार): यह पोंगल का सबसे मुख्य दिन है. इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है और नए चावल, दूध व गुड़ से 'पोंगल' नामक विशेष पकवान बनाया जाता है.
- मट्टू पोंगल (16 जनवरी 2026, शुक्रवार): तीसरा दिन कृषि में सहायक मवेशियों, विशेषकर गाय और बैलों को समर्पित है. उन्हें नहलाया जाता है, उनके सींगों को रंगा जाता है और उनकी पूजा की जाती है. इसी दिन प्रसिद्ध 'जल्लीकट्टू' जैसे खेलों का आयोजन भी होता है.
- कानुम पोंगल (17 जनवरी 2026, शनिवार): उत्सव के अंतिम दिन लोग अपने रिश्तेदारों और मित्रों से मिलते हैं. इसे पारिवारिक मेल-मिलाप और कन्या पूजा के दिन के रूप में भी मनाया जाता है.
शुभ मुहूर्त और संक्रांति का क्षण
ज्योतिष गणना के अनुसार, सूर्य का मकर राशि में प्रवेश (मकर संक्रांति) पोंगल के पर्व को और भी शुभ बनाता है.
- थाई पोंगल संक्रांति क्षण: 14 जनवरी 2026 को दोपहर 03:13 PM पर.
- पूजा का समय: थाई पोंगल (15 जनवरी) के दिन सूर्योदय के समय आंगन में पोंगल बनाना सबसे शुभ माना जाता है.
परंपराएं और 'पोंगल' पकवान का महत्व
'पोंगल' शब्द का अर्थ है "उबलना" या "छलकना"। परंपरा के अनुसार, नए मिट्टी के बर्तन में दूध और चावल को तब तक उबाला जाता है जब तक कि वह बर्तन से बाहर न गिरने लगे. दूध का बाहर गिरना घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य के आने का प्रतीक माना जाता है. जब दूध उबलता है, तब परिवार के सभी सदस्य 'पोंगालो पोंगल' का जयघोष करते हैं. यह भी पढ़ें: Lohri 2026 Date: देश में 13 जनवरी को मनेगा लोहड़ी का पर्व, जानें शुभ मुहूर्त और इसका पारंपरिक महत्व
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ
पोंगल का इतिहास लगभग 2000 वर्ष पुराना माना जाता है, जिसके प्रमाण चोल राजवंश के समय के शिलालेखों में मिलते हैं. यह पर्व उत्तर भारत की मकर संक्रांति और पंजाब की लोहड़ी के समानांतर मनाया जाता है, लेकिन इसकी पूजा पद्धति और सांस्कृतिक विविधता इसे अनूठा बनाती है. यह त्योहार सिखाता है कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति और मवेशियों पर निर्भर है, इसलिए उनका सम्मान अनिवार्य है.











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