दिल्ली में महिलाओं ने पब्लिक पार्क में बसाया ‘हैप्पी गार्डन’
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दिल्ली नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी में 18 नगर निगम वार्डों में 23 महिला-विशेष पार्क हैं. फिर भी वंचित वर्ग की महिलाओं की इन तक पहुंच सीमित है. असुरक्षित माहौल और खस्ताहाल होने के कारण उन्हें परेशानी होती है.दिल्ली के सुंदर नगरी की तंग गलियों और झुग्गियों से घिरे इस इलाके में खुली जगहें लगभग न के बराबर हैं. इलाके के एक महिला-विशेष पार्क को दिखाते हुए यहां रहने वाली 53 वर्षीया रुकसाना कहती हैं, "पहले इस पार्क में महिलाएं खुलकर टहल सकती थीं. वे दिन में यहां आकर बैठतीं, बातें करतीं और थोड़ा सुकून पाती थीं. लेकिन पिछले कुछ सालों में पुरुषों ने इसे नशे का अड्डा बना दिया है."

कभी यह पार्क हरा-भरा हुआ करता था. लेकिन समय के साथ इसकी हालत बिगड़ती चली गई. रुकसाना याद करती हैं, "यहां घास हुआ करती थी और बोरिंग का पानी भी उपलब्ध था. लेकिन एक दिन अचानक पानी आना बंद हो गया. तब से बोरिंग भी बंद पड़ी है. पेड़ों को पानी नहीं मिला और वे धीरे-धीरे सूख गए."

पार्क के प्रवेश पर करीब दस साल पहले लगाए गए शीशम और जामुन के पेड़ आज भी खड़े हैं. बीते दशकों में आबादी बढ़ती गई. लोगों ने यहां कूड़ा फेंकना शुरू कर दिया और यह जगह बदहाल होती चली गई. अब रुकसाना इसे बदलना चाहती हैं. उन्होंने मोहल्ले की दस महिलाओं के साथ एक समूह बनाया है.

समूह की महिलाओं ने अपने लिए एक छोटा-सा ठिकाना बनाया है, जिसे वे प्यार से ‘हैप्पी गार्डन' बुलाती हैं. रुकसाना का कहना है कि यह केवल पार्क नहीं, बल्कि घर जैसा है जहां महिलाएं थोड़ी देर के लिए अपने रोजमर्रा के संघर्षों से बाहर निकलकर सांस ले पाती हैं.

महिलाओं के लिए 'हैप्पी गार्डन' कितना अहम है'?

सुंदर नगरी में हाशिए पर रहने वाले समुदायों की बड़ी आबादी रहती है. इलाके के अधिकांश लोग फैक्ट्रियों, दिहाड़ी मजदूरी और अन्य अस्थाई कामों से अपनी आजीविका चलाते हैं. यहां भरी बस्तियां और पतली गलियां हैं. महिलाओं की शिकायत है कि खासकर गर्मियों के दिनों में उनके पास बाहर बैठने और थोड़ी देर आराम करने के लिए कोई जगह नहीं है.

मेहराज रियाज अपनी तीन बेटियों के साथ 20 गज के एक कमरे वाली झुग्गी में रहती हैं. वह गाड़ियों की सजावट का सामान बनाकर महीने में पांच से दस हजार रुपये कमाती हैं. मेहराज कहती हैं, "मैं खाना बनाती हूं तो धुआं कमरे में ही भर जाता है. जिससे अक्सर खांसी होने लगती है. पार्क ठीक हो, तो फिर मैं टहलने के लिए जा सकती हूं."

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हाल ही में ग्रीनपीस, कोहास (सीओएचएएस) और यूथ फॉर क्लाइमेट जस्टिस ने दिल्ली में सर्वे किया. बस्ती के लोगों के पास अपने घर के अलावा आराम करने या समय बिताने के लिए कोई अतिरिक्त जगह नहीं है. ग्रीनपीस ट्रस्ट के साथ जुड़ी दिपाली टोंक कहती हैं कि महिलाएं घर पर सीमित रहकर अकेलापन और अलगाव महसूस करने लगती हैं. सुंदर नगरी की महिलाओं का एक साथ आना उम्मीद और एकजुटता का प्रतीक है.

दिल्ली में भले ही कई पार्क मौजूद हैं. लेकिन इनमें सबका प्रवेश कर पाना मुश्किल है. सुंदर नगरी की निवासी सुनीता मेश्राम अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं, "नजदीक में दूसरा पार्क डीडीए फ्लैट्स के पास है. वहां हरियाली है और सुंदर भी है. लेकिन वे झुग्गी-बस्ती की महिलाओं को रोकते हैं. सिर्फ नजरों से ही ऐसा जताया जाता है कि हमें अंदर नहीं जाना चाहिए. जबकि पार्क एक सार्वजनिक जगह हैर उस पर हर किसी का हक होता है."

इसी वजह से इलाके की महिलाओं ने रुकसाना पर भरोसा किया और मिलकर इस साल जनवरी से इस पार्क को फिर से संवारने की शुरुआत की. उनका कहना है कि पार्क को ठीक कराने के लिए वे कई बार विधायक और कॉउंसलर से मिलीं, लेकिन उन्हें सुनने को मिला कि फंड की कमी है.

महिलाओं समूह ने खुद की पहल

पार्क को सुधारने के लिए सबसे पहले यहां से असामाजिक तत्वों को हटाना जरूरी था. रुकसाना ने बताया, "हम नहीं चाहते कि यहां आदमी बैठकर नशा करें और जुआ खेलें. वे अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते थे. यहां तक कि कई बार महिलाओं पर हमला करने की कोशिश हुई है. हमने स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत लिखकर दी. पुलिस ने इन लोगों को पार्क से हटाने में हमारी मदद की है."

आशा रानी का घर पार्क के ठीक सामने है. वह बताती हैं, "जो पुरुष यहां आते थे, वे पार्क के कोनों में पेशाब कर देते थे. इसी वजह से मुझे हमेशा घर का दरवाजा बंद रखना पड़ता था."

आशा रानी ने उसी कोने को संवारने की ठानी. उन्होंने घर में पड़ी पुरानी प्लास्टिक की बोतलों में बीज बो दिए, ताकि जगह साफ और उपयोगी बन सके. आशा पौधे दिखाते हुए कहती हैं, "मैंने यहां घिया, कड़ी पत्ता, मशरूम और धनिया उगाया है. देखा-देखी कई और महिलाएं अपने घरों से सब्जियों के बीज लाकर यहां लगाने लगीं. मुझे बहुत अच्छा लगता है जब सुबह पक्षी आकर इन पौधों पर बैठते हैं."

महिलाओं को पहले तो फुर्सत नहीं, वो मिल जाए तो जगह नहीं!

कुछ समय पहले तक पार्क की हालत इतनी खराब थी कि औरतें एक-दूसरे के घरों की छत पर बैठने लगीं. इनके रोजमर्रा में शाम के लगभग छह बजे का समय ऐसा होता था जब मोहल्ले की महिलाएं थोड़ी देर के लिए मिल पाती थीं. वे घर, बच्चों, देश-दुनिया और स्वास्थ्य की बात करती हैं. अब पार्क फिर से उनके जाने लायक है. यहां वे कुछ देर के लिए ही सही, अपने दुपट्टे उतारकर आराम से बैठ सकती हैं, लड़कियां खुलकर कॉल पर बात कर सकती हैं.

इन महिलाओं को शुरुआत में अपने ही घर में विरोध झेलना पड़ा. सुनीता बताती हैं, "महिलाएं यहां आने में बहुत असहज और असुरक्षित महसूस करती थीं. पार्क को अच्छा बनाने के लिए काम शुरू किया, तो आदमी हमें रोकना चाहते थे. वे अपने घर की महिलाओं को मीटिंग में आने नहीं देते. ऐसी पितृसत्तात्मक सोच दिखाती है कि महिलाओं के लिए फुर्सत का समय कोई अधिकार नहीं, बल्कि गैरजरूरी काम माना जाता है."

सरकार से अधूरा वादा पूरा करने की अपील करती महिलाएं

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 40 प्रतिशत महिलाओं ने सार्वजनिक जगहों पर खुद को असुरक्षित महसूस करने की बात कही. साल 2023 में आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली एमसीडी ने दिल्ली के 250 वार्डों में 'पिंक पार्क' चिन्हित करने का प्रस्ताव रखा था. इन पार्कों में शौचालय, सीसीटीवी कैमरा और जिम जैसी सुविधाएं देने का वादा किया गया था. दिल्ली में सरकार बदल गई और उनकी यह योजना बड़े पैमाने पर लागू नहीं हो पाई.महिलाओं के साथ अपराध की राजधानी भी है दिल्ली

अब दिल्ली में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार है. कुछ ही समय पहले दिल्ली नगर निगम ने रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) के साथ मिलकर इन पार्कों को सुधारने के लिए दो करोड़ रुपये आवंटित करने की योजना बनाई है. एमसीडी के नेता सदन प्रवेश वाही ने माना कि मौजूदा पार्कों की हालत खराब है. रोजमर्रा की देखरेख और मरम्मत के काम के लिए यह फंड तय किया गया है.

लेकिन फिलहाल तो महिलाओं ने ही अपने हैप्पी गार्डन को साफ रखने के लिए आपस में ड्यूटी बांटी हुई है. रोज सुबह दो महिलाएं झाड़ू लगाती हैं. जबकि दो महिलाएं अपने घर से पानी लाकर पौधों में डालती हैं. रुकसाना कहती हैं, "हम चाहते हैं कि अपने काम के बाद यहां आकर थोड़ा आराम करें और सुरक्षित माहौल में टहल सकें. सड़कों पर फोन छिनने और छेड़छाड़ का डर बना रहता है."

यहां की ज्यादातर महिलाएं फैक्ट्रियों में काम करती हैं और अक्सर उनके बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में अब पार्क में गेट लगा दिया गया है और समूह की महिलाएं नियमित चक्कर लगाकर पार्क की निगरानी करती हैं.

सार्वजनिक जगहों में महिलाओं की सुरक्षा बुनियादी आजादी का मामला

सेफ्टीपिन एक गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) है, जो शहरों को महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित और समावेशी बनाने पर काम करती है. उनका एक मोबाइल ऐप भी है जिस पर महिलाएं पार्क का ऑडिट कर सकती हैं. इस तरह अधिकारियों से जवाबदेही मांगना संभव हो पाता है.

डायरेक्टर ऑफ प्रोग्राम्स सोनाली व्यास उदाहरण के साथ समझाती हैं, "चांदनी चौक में महिलाओं के लिए एक खास पार्क बनाया गया. लेकिन यह अक्सर बंद रहता है. वहां जाने के लिए सुबह और शाम का समय तय है. ये नियम असली उद्देश्य को ही खत्म कर देते हैं. अगर महिलाएं पार्क में नहीं जाएंगी, तो यह पुरुषों के वर्चस्व की जगह बन जाती है."

उनका मानना है कि वंचित तबकों की महिलाओं का पार्कों में प्रवेश बंद करना या उसके लिए आवाज उठाना छोड़ देना उनकी आवाजाही और स्वतंत्रता को प्रभावित करता है. इसलिए उनके लिए आराम और मनोरंजन के सार्वजनिक स्थान उपलब्ध कराना बहुत जरूरी है.

सोनाली आगे कहती हैं, "समस्या यह भी है कि सार्वजनिक स्थानों की योजना बनाते समय महिलाओं को अक्सर यूजर के रूप में नहीं देखा जाता. कई बार सुविधाओं को 'मेहरबानी' की तरह पेश किया जाता है. जैसे दिल्ली की बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा है. समाज के कुछ वर्ग इसका विरोध करते हैं. लेकिन ऐसे कदम महिलाओं की सार्वजनिक स्थानों में भागीदारी बढ़ाने के लिए जरूरी हैं."