Bail Pola 2025 Wishes in Marathi: हिंदू संस्कृति में पशुओं के प्रति सम्मान और श्रद्धा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है. अनेक पर्वों और उत्सवों में पशुओं की पूजा एक अहम भूमिका निभाती है. विशेष रूप से किसानों के लिए बैल और गाय केवल पालतू जानवर नहीं, बल्कि परिवार का अभिन्न हिस्सा होते हैं. इसी भावना को दर्शाता है बैल पोला, जो भारत के प्रमुख कृषि राज्यों में बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. बैल पोला (Bail Pola 2025) विशेष रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में मनाया जाता है. यह त्योहार उन बैल और गायों के सम्मान में आयोजित किया जाता है, जो वर्ष भर किसानों के साथ खेतों में मेहनत करते हैं. भाद्रपद माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व पिठोरी अमावस्या, कुशाग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है. साल 2025 में बैल पोला का पर्व 23 अगस्त (शनिवार) को मनाया जाएगा. इस दिन किसान अपने खेतों में कार्य नहीं करते, बल्कि परिवार के साथ घर पर रहकर मवेशियों की पूजा करते हैं. यह भी पढ़ें: Pithori Amavasya 2025: 22 अगस्त को मनाई जायेगा पिठोरी अमावस्या का पर्व, जानें पितृ पूजा का खास मुहूर्त
बैलों और गायों को इस दिन नहलाया जाता है, उनकी रस्सियां खोली जाती हैं, और उनका श्रृंगार किया जाता है. बैलों के सींगों पर रंग, उनके गलों में घंटियां, पैरों में कड़े और गुब्बारे बांधकर उन्हें सजाया जाता है. इसके बाद, बैलों को गांव में भव्य शोभायात्रा के रूप में घुमाया जाता है, जिसे देखने के लिए लोग उत्साहपूर्वक एकत्र होते हैं. ऐसे में आप भी इन शानदार विशेज, वॉट्सऐप स्टिकर्स, जीआईएफ ग्रीटिंग्स, एचडी इमेजेस, वॉलपेपर्स को भेजकर हैप्पी बैल पोला कह सकते हैं.
1. कोसळती श्रावणधारा
धरणिमायही नटली
हिरवाईचा नेसून शालू
नववधूसम भासली
भाव-भक्तिने भरला आज मनाचा आरसा
पिठोरी अमावस्या
हिंदू संस्कृतीचा वारसा
पिठोरी आमावस्येच्या हार्दिक शुभेच्छा!

2. आला आला रे बैल पोळा
गाव झालं सारं गोळा
सर्जा राजाला घेऊनी सारे जाऊया राऊळा
बैलपोळा सणाच्या हार्दिक शुभेच्छा!

3. आज पुंज रे बैलाले फेडा
उपकाराचं देणं
बैला खरा तुझा सण
शेतक-या तुझं रीन
बैल पोळ्याच्या हार्दिक शुभेच्छा!

4. नको लावू फास बळीराजा
आपुल्या गळा
दे वचन आम्हास आज दिनी
बैल पोळा बैल पोळ्याच्या हार्दिक शुभेच्छा!

बैल पोला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यह एक संवेदनशील सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा है, जो इंसानों और पशुओं के बीच के स्नेह, सहयोग और सहअस्तित्व को उजागर करती है. यह पर्व हमें यह सिखाता है कि कर्मयोग में भागीदार हर जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु सम्मान का अधिकारी है.










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