Durga Bhabhi's 118th Birth Anniversary: आज है दुर्गा भाभी की 118वीं जयंती, जानें इनके अदम्य साहस एवं शक्ति के बारे में
दुर्गा भाभी की 118वीं जयंती, (फोटो क्रेडिट्स: फेसबुक )

अदम्य साहस एवं शक्ति का प्रतीक 'दुर्गा भाभी' जिनके बिना भगत सिंह, आजाद जैसे क्रांतिकारियों की कहानी अधूरी होगी! जानें कौन है दु्र्गा भाभी! भारत को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति दिलाने में महिलाओं की सक्रिय भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता. लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल,मैडम भीकाजी कामा, एनी बेसेंट, कस्तूरबा गांधी, सरोजनी नायडू, कमला नेहरू... ऐसे सैकड़ों नाम हैं, लेकिन कुछ अचर्चित शख्सियतें भी हैं, जिनके नाम मात्र से भी अंग्रेजों की रूहें कांप जाती थीं. इन्हीं में एक थीं दुर्गा भाभी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु आदि की गौरवगाथा दुर्गा भाभी के बिना अधूरी होगी. समृद्ध घराने में जन्म लेने और समृद्धि घराने की बहु बनने के बावजूद दुर्गा भाभी आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. आइये जानें, आखिर कौन थीं दुर्गा भाभी और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी क्या भूमिका रही है...यह भी पढ़ें: Jawaharlal Nehru Jayanti 2019: देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 130वीं जयंती, बाल दिवस पर पढ़ें उनके ये प्रेरणादायक विचार

दुर्गा भाभी मूलतः इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के एक गुजराती परिवार की इकलौती संतान थीं. इनका जन्म 7 अक्टूबर 1902 को ग्राम शहजादपुर (अब कौशाम्बी) में पं. बांके बिहारी के घर पर हुआ था. पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे, बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन में थानेदार और दादाजी पं. शिव शंकर शहजादपुर में जमींदार थे. दादाजी दुर्गा को बहुत प्यार करते थे और उनकी हर मांग पलक झपकते पूरी करते थे. दुर्गा काफी छोटी थीं, जब उनके पिता अपनी मौसी के साथ घरबार छोड़कर संन्यासी बन गये थे. प्रारंभिक शिक्षा के दरम्यान 10 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह भगवती चरण वोहरा के साथ हो गया. दुर्गा के ससुर शिवचरण रेलवे में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत थे. अंग्रेज सरकार ने उन्हें 'राय साहब' का खिताब दिया था. हर सुख-सुविधा से सम्पन्न होने के बावजूद भगवती चरण वोहरा को अंग्रेजी हुकूमत बर्दाश्त नहीं हो रहा था. वह भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाना चाहते थे. छुटपन में ही उन्होंने गुपचुप तरीके से वे एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गये. 1920 में पिता की मृत्यु के बाद वे खुलकर क्रांतिकारियों में शामिल हो गये. उनके इस कार्य में पत्नी दुर्गा भाभी का भी पूर्ण समर्थन था.

जब भगत सिंह की पत्नी बनना पड़ा

19 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने पुलिस अधीक्षक जॉन सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी. पुलिस उनके पीछे पड़ी तो भगत सिंह ने लाहौर से निकलने के लिए दुर्गा भाभी से मदद मांगी. दुर्गा भाभी तुरंत तैयार हो गयीं. भगत सिंह ने अपने बाल कटवाकर अंग्रेजी कपड़े पहने और दुर्गा भाभी को पत्नी एवं उनके तीन साल के बेटे को साथ लेकर लाहौर से लखनऊ जानेवाली ट्रेन में बैठ गये. इसी ट्रेन में चंद्रशेखर आजाद औरतों को तीर्थ स्थान ले जानेवाले साधु के वेष में बैठे थे. राजगुरु बीच में उतरकर बनारस (वाराणसी) के लिए निकल गये. दुर्गा भाभी सभी साथियों के साथ लखनऊ में ट्रेन बदलकर कलकत्ता (कोलकाता) पहुंच गयीं. कोलकाता में जब पति भगवती ने पत्नी को इस रूप में देखा तो पहले पहचान नहीं पाये, मगर सच्चाई पता चलने पर उन्हें गर्व हुआ कि उनकी पत्नी सारे क्रांतिकारियों को बचाने में अहम भूमिका निभाई.

पति की असामयिक मृत्यु के बाद भी सक्रिय रहीं:

मार्च 1926 में भगवती चरण व सरदार भगत सिंह ने रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर 'नौजवान भारत' नामक संगठन की स्थापना की. सैकड़ों नौजवानों ने इस संगठन में शामिल होकर देश को आजादी दिलाने के लिए प्राणों का बलिदान करने की शपथ ली और अपने रक्त से शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किया. 28 मई 1930 को लाहौर में रावी तट पर अपने क्रांतिकारी साथियों के लिए बम बनाते समय अचानक एक बम फटा, जिसमें भगवती चरण वोहरा शहीद हो गए. पति की इस तरह से हुई मृत्यु से दुर्गा भाभी टूट सी गयीं थीं, लेकिन शीघ्र ही उन्होंने खुद को संभाला और पार्टी गतिविधियों में पुनः सक्रिय हो गयीं.

जरूरत पड़ने पर गोली चलाने से नहीं डरती थीं:

दुर्गा भाभी ने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर और कानपुर में ली थी. क्रांतिकारियों का दुश्मन बन चुके गवर्नर हैली को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी उन्होंने ली. तय समय पर उन्होंने हैली पर गोली तो चलाई मगर निशाना चूक जाने से हैली के साथ चल रहा सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया. इसके बाद दुर्गा भाभी ने मुंबई पुलिस कमिश्नर को अपनी गोली का निशाना बनाया और वहां से फरार हो गयीं. पुलिस ने मुंबई में दुर्गा भाभी और उनके एक क्रांतिकारी साथी यशपाल को उनके फ्लैट से गिरफ्तार कर लिया. लेकिन शीघ्र ही वे वहां से फरार होने में सफल रहीं.

क्रांतिकारियों के लिए पिस्तौल मुहैया कराती थीं दुर्गा भाभी:

दुर्गा भाभी को एक बार उनके पिता और ससुर ने 45 हजार रुपये दिये थे. इन रुपयों को उन्होंने अपने क्रांतिक्रारी साथियों के लिए हथियार खरीदने में खर्च कर दिये. वे क्रांतिकारियों के लिए पिस्तौल का बंदोबस्त करती थीं. बताते हैं कि इलाहाबाद में चंद्रशेखर आजाद को दुर्गा भाभी ने ही पिस्तौल मुहैया करवाया था. 27 फरवरी 1931 में इलाहाबाद स्थित कंपनी बाग में जिस पिस्तौल से चंद्रशेखर आजाद ने स्वयं को गोली मारी थी, वह उन्हीं के द्वारा दी गई पिस्तौल थी, उस समय दु्र्गा भाभी उनके साथ ही थीं. दुर्गा भाभी क्रांतिकारियों का हौसला बढ़ाने का भी कार्य करती थीं. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जब केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने जा रहे थे, तब दुर्गा भाभी ने अपनी उंगली काट कर उस रक्त से दोनों का तिलक करके विदा किया था, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई.

क्रांतिकारियों की शहादत के बाद अकेली पड़ गईं थी दुर्गा भाभी:

चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे सक्रिय साथियों को खोने के बाद दुर्गा भाभी अकेली पड़ गईं. अपने 5 वर्षीय पुत्र शचींद्र को शिक्षा दिलाने के लिए वे पुलिस से छिपते हुए दिल्ली गई, लेकिन यहां भी पुलिस उनके पीछे पड़ी रही. अंततः दिल्ली से वे लाहौर चली गई, जहां पर उन्हें गिरफ्तार कर तीन वर्ष के लिए नजरबंद कर दिया गया. लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद 1935 में उन्होंने गाजियाबाद के प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी कर ली. इसी समय उन्हें कांग्रेस में शामिल किया गया, मगर कांग्रेस के कामकाज के तरीकों से उकता कर 1937 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. 1939 में दुर्गा भाभी ने मद्रास (आज चेन्नई) मारियोन मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया. 1940 में लखनऊ आकर अपने निजी मकान में मात्र पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला. आज वही स्कूल लखनऊ का नामचीन मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है. 14 अक्टूबर 1999 को 97 साल की उम्र में दुर्गा भाभी का निधन गाजियाबाद में हो गया.