ममता बनर्जी के इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद आगे क्या?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

पश्चिम बंगाल चुनाव में करारी हार के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया है. यह देश में अपनी तरह की पहली घटना है. वैसे, पहले भी कुछ मुख्यमंत्री अलग हालात में इस्तीफा नहीं देने पर अड़े रहे हैं.इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनावी नतीजों में बीजेपी को दो सौ से ज्यादा सीटें मिलीं जबकि पंद्रह साल से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस तिहाई के आंकड़े से भी दूर रह गई. उसके अगले दिन अपनी प्रेस कांफ्रेंस में ममता बनर्जी ने कहा, मैं अपने पद से इस्तीफा नहीं दूंगी. मै हारी नहीं हूं, हराई गई हूं. इसलिए लोकभवन जाकर इस्तीफा देने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता.

देश के किसी राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के चुनाव हारने की स्थिति में मुख्यमंत्री समेत पूरे मंत्रिमंडल के इस्तीफा देने की परंपरा रही है. उसके बाद राज्यपाल नई सरकार के शपथ ग्रहण तक उसे केयरटेकर यानी कामचलाऊ मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभाने का अनुरोध करते हैं. लेकिन यहां ममता बनर्जी के इस्तीफे से इंकार ने एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है. आजादी के बाद बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक इतिहास में इसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती. अब ममता के इस एलान से आम लोगों और खुद तृणमूल कांग्रेस में असमंजस बढ़ गया है.

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वैसे, देश में कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब गिरफ्तार होने या आपराधिक आरोप का सामना करने वाले मुख्यमंत्री तक इस्तीफा देने से इंकार कर चुके हैं. ऐसा पहला मामला वर्ष 1997 में बिहार में सामने आया था. उस समय चारा घोटाले में दोषी साबित होने के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने शुरुआत में इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था. हालांकि बाद में उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी.

ऐसे दो मामले वर्ष 2024 में भी सामने आए थे. पहले मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गिरफ्तारी के बावजूद लंबे समय तक इस्तीफा नहीं दिया था. वो जेल में भी मुख्यमंत्री बने रहे. इस मुद्दे पर विवाद लगातार तेज होने और केजरीवाल व उनकी पार्टी की छीछालेदर होने के बाद उन्होंने अपना इस्तीफा दिया.

उसी साल झारखंड में भी यही कहानी दोहराई गई. ईडी का शिकंजा कसने के कारण इस्तीफे का दबाव बढ़ने के बावजूद वो इस्तीफा टालते रहे. आखिर गिरफ्तारी से कुछ देर पहले उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

लेकिन इस लिहाज से पश्चिम बंगाल का यह मामला देश में अभूतपूर्व है कि चुनाव हारने के बाद कोई मुख्यमंत्री इसे साजिश बताते हुए इस्तीफा देने से इंकार कर दे.

क्या कहता है संविधान?

संविधान की धारा 164 में साफ कहा गया है कि अगर चुनाव हारने के बावजूद कोई मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देता तो राज्यपाल उसे बर्खास्त कर सकते हैं. संविधान की धारा 356 के तहत ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने का भी प्रावधान है.

लेकिन संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि सात मई को बंगाल विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है. उसके साथ ही मुख्यमंत्री समेत पूरे मंत्रिमंडल का कार्यकाल स्वतः खत्म हो जाएगा. अगर आठ मई को नई सरकार शपथ ले लेती तो कोई संकट नहीं पैदा होता. लेकिन अब सरकार ने नौ मई को शपथ ग्रहण का फैसला किया है. ऐसे में एक दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करने की बजाय राज्यपाल कामकाज अपने हाथों में ले सकते हैं.

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कोलकाता हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट दिलीप कुमार गुप्ता डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ममता के औपचारिक रूप से इस्तीफा देने या नहीं देने से कोई अंतर नहीं पड़ता. राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सरकार बनाने का न्योता देने का संवैधानिक अधिकार है."

एक विधि विशेषज्ञ सुरेंद्र नाथ गांगुली डीडब्ल्यू से कहते हैं, "अगर मुख्यमंत्री या उनका मंत्रिमंडल इस्तीफा नहीं देता तो विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने या नई सरकार के शपथ लेते ही उसका कार्यकाल खत्म हो जाता है.' उनका कहना था कि राज्यपाल के पास पुराने मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करने का भी संवैधानिक अधिकार है. लेकिन बंगाल में इसकी संभावना कम ही है. नौ मई को नई सरकार सत्ता संभाल लेगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि सात मई को विधानसभा का कार्यकाल खत्म होते ही राज्यपाल नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं. इसके बाद इस्तीफा देने या नहीं देने का कोई औचित्य या जरूरत नहीं रह जाती.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि साजिश के तहत उनको हराया गया है और कम से कम सौ सीटें लूटी गई हैं. ऐसा कह कर वो भविष्य की राजनीति की जमीन तैयार कर रही हैं.

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राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "ममता ने साफ कर दिया है कि वो अब कथित चुनावी धांधली के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगी. उसी रणनीति के तहत उन्होंने इस्तीफा नहीं देने का एलान करते हुए साजिश के तहत तृणमूल कांग्रेस को हराने के आरोप लगाए हैं."

कोलकाता के एक कालेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डा. सुविमल चटर्जी भी इससे सहमत हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "ममता जानती हैं कि उनके इस्तीफा देने या नहीं देने से चुनावी नतीजों या नई सरकार के गठन की प्रक्रिया पर कई फर्क नहीं पड़ेगा. दरअसल, वो भविष्य की रणनीति के तहत एक नैरेटिव बनाने का प्रयास कर रही हैं."

बीजेपी ने क्या कहा?

तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने ममता के बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन बीजेपी नेता उनकी टिप्पणी की आलोचना करते हुए इसे संवैधानिक और पारंपरिक मूल्यों के खिलाफ बता रहे हैं. पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "इससे साफ है कि संविधान पर ममता बनर्जी का भरोसा नहीं है. वो लोगों के जनादेश का भी अपमान कर रही हैं."

कोलकाता की भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को हराने वाले बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी ने इस मुद्दे पर यहां पत्रकारों से कहा, "मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता. इस बारे में संविधान के प्रावधान स्पष्ट हैं. राज्यपाल और केंद्र सरकार उसी की अनुरूप सरकार के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगे." शुभेंदु का कहना था कि ममता बनर्जी अब पश्चिम बंगाल की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुकी है. ऐसे में उनकी ऐसी टिप्पणी अब मायने नहीं रखती.