मुंबई: शिवसेना (यूबीटी) की पार्षद सबा हारून खान ने हिजाब को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने हिजाब को मुस्लिम महिलाओं की गरिमा और पहचान से जोड़ते हुए इसे एक सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकार बताया है. सबा खान ने तर्क दिया कि सिर ढकने की परंपरा केवल इस्लाम तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की विभिन्न संस्कृतियों में भी रची-बसी है.
उत्तर भारतीय परंपराओं से की तुलना
सबा हारून खान ने अपने बयान में उत्तर भारत की परंपराओं का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा, "हिजाब हमारी गरिमा है. आप देख सकते हैं कि उत्तर भारतीय महिलाएं भी दुपट्टे से अपना आधा चेहरा ढकती हैं. इसी तरह, यह हमारी गरिमा है जो दिखाती है कि हम मुस्लिम हैं." उन्होंने जोर देकर कहा कि शालीनता के लिए सिर ढकना एक व्यापक सामाजिक व्यवहार है. यह भी पढ़े: Imtiaz Jaleel On Hijab: ‘मुस्लिम महिला के हिजाब को छूने की हिम्मत की तो काट दूंगा हाथ’, इम्तियाज जलील का नीतीश कुमार पर तीखा हमला
#WATCH | Mumbai | Shiv Sena (UBT) corporator Saba Haroon Khan says, "Hijaab is our dignity, you can see North Indians covering half of their face with dupatta as well... Similarly, this is our dignity showing we are Muslims. Not only us, but people of other castes cover their… pic.twitter.com/Fi5LTDnB9k
— ANI (@ANI) January 21, 2026
अन्य समुदायों का दिया उदाहरण
पार्षद ने आगे कहा कि केवल मुस्लिम महिलाएं ही नहीं, बल्कि अन्य जातियों और धर्मों के लोग भी अपने सिर को ढकते हैं. उनके अनुसार, हिजाब पहनना किसी भी तरह से प्रगति के रास्ते में बाधा नहीं है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत और धार्मिक चुनाव है जिसे सम्मान मिलना चाहिए.
राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ
सबा खान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में हिजाब और ड्रेस कोड को लेकर कानूनी और सामाजिक बहस जारी है. शिवसेना (UBT) की सदस्य होने के नाते, उनका यह रुख पार्टी के भीतर और बाहर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं पैदा कर सकता है, क्योंकि उनकी पार्टी अक्सर मराठी और हिंदू सांस्कृतिक पहचान की बात करती रही है.
हिजाब का मुद्दा
हिजाब का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक बड़ा राजनीतिक विषय रहा है. जहां एक पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा मानता है, वहीं दूसरा पक्ष शिक्षण संस्थानों में एक समान ड्रेस कोड लागू करने की वकालत करता है. सबा हारून खान के इस बयान ने इस बहस को एक बार फिर सांस्कृतिक विविधता के नजरिए से देखने की ओर मोड़ा है.













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